हिंदी दिवस पर मेरी प्रिय कविता

Image caption रामधारी सिंह 'दिनकर' ने कुरुक्षेत्र, संस्कृति के चार अध्याय जैसी रचनाएं की थीं.

मैंने बहुत सी कविताएं पढ़ी हैं और बहुत सी पसंद भी हैं, लेकिन अगर मुझे किसी एक कविता का नाम लेना पड़े तो कहूंगा कि कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविता ‘रश्मिरथी’ मुझे बहुत प्रिय है. ये एक लंबा-चौड़ा महाकाव्य है.

उसकी एक सतर मैंने ‘गुलाल’ फ़िल्म में इस्तेमाल की है क्योंकि वो मुझे बेहद पसंद थी.

‘रश्मिरथी’ कर्ण की ज़िंदगी पर लिखी गई थी. उसमें एक प्रसंग है कि कृष्ण भगवान को जब दुर्योधन हस्तिनापुर में बातचीत के लिए बुलाते हैं ज़मीन के बंटवारे के विषय में. वो कृष्ण को बांधने की कोशिश करते हैं. पंक्तियां कुछ इस तरह हैं –

हरि ने भीषण हुंकार किया, अपना स्वरूप-विस्तार किया, डगमग-डगमग दिग्गज डोले, भगवान् कुपित होकर बोले- ‘जंजीर बढ़ा कर साध मुझे, हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे।

यह देख, गगन मुझमें लय है, यह देख, पवन मुझमें लय है, मुझमें विलीन झंकार सकल, मुझमें लय है संसार सकल। अमरत्व फूलता है मुझमें, संहार झूलता है मुझमें।

बाँधने मुझे तो आया है, जंजीर बड़ी क्या लाया है? यदि मुझे बाँधना चाहे मन, पहले तो बाँध अनन्त गगन। सूने को साध न सकता है, वह मुझे बाँध कब सकता है?

Image caption दिनकर जी ने 1954 में 'रश्मिरथी' की रचना की थी.

एक तो कर्ण मेरे बड़े प्रिय चरित्र हैं और दूसरे इसे मैं अपनी फ़िल्म में इस्तेमाल कर चुका था. फिल्म ‘गुलाल’ मेरी ज़िंदगी का एक महत्वपूर्ण आयाम है.

और सबसे अहम बात ये कि जिस तरह ये कविता लिखी गई है, इसमें हिंदी के शब्द हैं और उन्हीं शब्दों से अभिव्यक्ति को एक औदात्य प्रदान किया गया है.

लोगबाग कहते हैं कि हिन्दी बहुत ही सहमी सिकुड़ी हुई भाषा है, लेकिन ये कविता बताती है कि हिंदी कितनी ज़बर्दस्त कितनी तीखी भाषा है. ये उर्दू जैसी ही समृद्ध भाषा है. बशर्ते कि किसी को इसका ज्ञान हो और उसे भाषा का सही इस्तेमाल करना भी आता हो.

आधे-अधूरे ज्ञान वाले जब हिंदी का इस्तेमाल करते हैं तो बात नहीं बन पाती.

इस कविता में जो लय है, जो छंद है, जो ताल है वो बहुत सुंदर है. इसे आप किसी ऐसे व्यक्ति को सुनाएंगे जिसे हिंदी नहीं आती है तो वो भी इसका पूरा आनंद उठा सकता है.

दिनकर जी की एक और श्रेष्ठ रचना ‘कुरुक्षेत्र’ भी है लेकिन मुझे ‘रश्मिरथी’ बहुत प्रिय है. मैं तो लोगों से अपील करूंगा कि वो इस किताब को ख़रीदें. मेरे हिसाब से ये इकलौती ऐसी कविता है जिसका पाठ किया जा सकता है. इसीलिए ये कविता मुझे बेहद पसंद है.

(प्रस्तुति : अमरेश द्विवेदी)

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