हिंदी दिवस पर मेरी प्रिय कविता

Image caption सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' ने 'सरोज स्मृति' अपनी पुत्री सरोज को स्मरण करते हुए लिखी थी जिनका 18 वर्ष की आयु में निधन हो गया था.

मुझे हिंदी के तमाम रचनाकार जैसे प्रेमचंद, मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी वर्मा, अज्ञेय प्रिय हैं. लेकिन अगर पसंदीदा कविता की बात की जाए तो मैं सबसे पहले पंडित सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की कविता 'सरोज स्मृति' का उल्लेख करना चाहूंगा.

'सरोज स्मृति' एक ऐसी मार्मिक शोकगाथा है जिसके भीतर गहरी पीड़ा के साथ संघर्ष भी है.

निराला इस कविता को पिता के रूप में भी रचते हैं और एक कवि के रूप में भी.

इस बात की सहज ही कल्पना की जा सकती है कि अपनी दिवंगत पुत्री के सामने इतनी तकलीफ़देह आत्मालोचना जो कि एक सामाजिक आलोचना भी है.

जब निराला कहते हैं -

धन्ये, मैं पिता निरर्थक था,कुछ भी तेरे हित न कर सका!जाना तो अर्थागमोपाय,पर रहा सदा संकुचित-कायलखकर अनर्थ आर्थिक पथ परहारता रहा मैं स्वार्थ-समर।शुचिते, पहनाकर चीनांशुकरख सका न तुझे अत: दधिमुख।क्षीण का न छीना कभी अन्न,मैं लख न सका वे दृग विपन्न;अपने आँसुओं अत: बिम्बितदेखे हैं अपने ही मुख-चित।

हम इस कविता को पढ़ते हुए पराजय, ग्लानि और वात्सल्य के कैसे निर्जन मोड़ तक हम जाते हैं.

मैंने जितनी बार भी इस कविता को पढ़ने की कोशिश की, हमेशा इसके नए अर्थ सामने आए.

ये एक ऐसी शोकगाथा है जो भारत की लाखों बेटियों की जीवनगाथा में विस्तार पा जाती है, जहां ठंडी क्रूरता और क्षय से भरी एक कठोर सामंती समाज संरचना आज भी मौजूद है.

समकालीन मानव समाज में निश्चय ही बड़े पैमाने पर सकारात्मक परिवर्तन हुए हैं.

स्त्रियों के भीतर प्रतिरोध और आत्मसम्मान की चेतना जगी है. शिक्षा, लोकतांत्रिक सोच और वैज्ञानिक आंदोलनों ने विडंबनाओँ और दुर्घटनाओं को कड़ी चुनौती दी है.

फिर भी कोई न कोई सरोज प्रतिदिन हमारे सामने धीरे-धीरे खत्म होती है और हम उसे बचा नहीं पाते.

Image caption निराला जी ने राम की शक्ति पूजा, कुकुरमुत्ता, बादल राग और तुलसीदास जैसी लंबी कविताएं रचीं.

'सरोज स्मृति' एक गहरे सामाजिक दायित्वबोध से हमें झकझोरती है.

आखिर हम अपनी बेटियों के साथ कितनी दूर तक चल पाते हैं.

'सरोज स्मृति' एक ऐसी कविता है जिसके बारे में सोचते हुए हम एक गहरे मौन के भीतर से गुज़रते हैं.

इस कविता को मैंने आज से क़रीब 45 वर्ष पहले पहली बार पढ़ा था. तब से आज तक कई-कई बार पढ़ चुका हूं. लेकिन हर पुनर्पाठ के बाद इस कविता के नए-नए अर्थ खुलते हैं, नई पीड़ा महसूस होती है.

इस कविता के भीतर सिर्फ़ पराजय और अकेलेपन का बोध ही नहीं है, बल्कि पिता और पुत्री के बीच एक बेहद जीवनमय संबंध अपने अन्यतम लालित्य और तरुणाई के नैसर्गिक संगीत से भी भरा है.

कविता के भीतर बार-बार सरोज का आभामय मुखमंडल ही जीवंत हो उठता है. मृत्यु तो बहुत पीछे छूट जाती है.

महाकवि निराला सरोज के शैशव को स्नेह और ऊष्मा के भीतर ले आते हैं, पिता की छाया में भी और मां की छाया भी वो खुद ही रचते हैं क्योंकि मां तो बहुत पहले ही दिवंगत हो चुकी हैं.

भारत और विश्व की किसी भी भाषा में 'सरोज स्मृति' जैसी कविता पिता और पुत्री के प्रेम पथ का एक ऐसा पाथेय है, ऐसा संबल जो सदियों तक साहित्य रचना और संसार को प्रेरित करता रहेगा.

निराला ने कविता में कहा भी है -

मैं कवि हूँ, पाया है प्रकाशमैंने कुछ, अहरह रह निर्भरज्योतिस्तरणा के चरणों पर।

सरोज का देहावसान होता है लेकिन सरोज का जीवन और उसकी उपस्थिति इस कविता में मौजूद है. यह काव्य मूल्य ही इस रचना को अमरता से भरता है.

निराला के साथ लिख रहे हिंदी के रचनाकार तो उनसे प्रभावित रहे ही, उनके बाद की रचनाकारों की चार पीढ़ियां भी 'सरोज स्मृति' के अनुभव और मनुष्य को मानवी बनानेवाली उसकी व्यथा से राह पाती रहीं.

निराला भारत में लोकतांत्रिक नागरिकता के एक बड़े चिंतक कवि हैं. उन्होंने दुख को भी एक मानवीय प्रतिरोध में बदल दिया.

'सरोज स्मृति' को पढ़ते हुए पाठक मुक्ति की ओर जाता है, एक ऐसे मानव समाज की ओर जहां विषमताएं और विभीषिका का अस्तित्व न हो, जहां विडंबनाएं न हों और मनुष्य मनुष्य के लिए मृत्यु का कारण न बने.

(प्रस्तुति : अमरेश द्विवेदी)

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