फैसला मोदी नहीं, आडवाणी के बारे में होना है?

  • 13 सितंबर 2013

भारतीय जनता पार्टी क्या अपने सबसे बड़े कद के नेता को हाशिए पर डालने की हिम्मत रखती है? पार्टी में मतभेदों के सार्वजनिक होने के बाद अपनी फजीहत और कांग्रेस के व्यंग्य-बाणों से खुद को बचाने की क्या कोई योजना उसके पास है? और क्या इस फजीहत का असर चार राज्यों के विधान सभा चुनाव पर नहीं पड़ेगा?

लालकृष्ण आडवाणी को पार्टी के कम से कम तीन-चार बड़े नेताओं का समर्थन हासिल है. पर यह भी लगता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के फैसले की कद्र करते हुए शायद इनमें से कोई भी नेता अंतिम क्षण तक आडवाणी जी का साथ नहीं देगा.

हो सकता है कि अंततः आडवाणी भी इसे कबूल कर लें, पर क्या वे मोदी के नाम का प्रस्ताव करेंगे? या इस फैसले के बाबत होने वाली प्रेस कांफ्रेस में साथ में खड़े होंगे? या फिर से पार्टी के सारे पदों से इस्तीफा देंगे?

जून में जब गोवा में हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में नरेन्द्र मोदी को चुनाव अभियान समिति का प्रमुख बनाया गया था तब उन्होंने पार्टी के सारे पदों से इस्तीफा दे दिया था. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के अध्यक्ष मोहन भागवत के सीधे हस्तक्षेप के बाद उन्होंने अपने हाथ खींचे थे.

उन्हें भरोसा दिलाया गया था कि प्रधान मंत्री पद का फैसला करते वक्त आपको शामिल किया जाएगा और इसीलिए इस हफ्ते पार्टी के तमाम नेता उन्हें लगातार मनाने की कोशिश करते रहे हैं. क्या अब उन्हें मनाने की कोशिश बंद कर दी जाएगी?

आज देश को दो बड़े फैसलों का इंतजार है. पहला है 16 दिसम्बर के दिल्ली गैंग रेप के अपराधियों को सजा का और दूसरा है आडवाणी का. एक मायने में यह मोदी से ज्यादा आडवाणी के बारे में फैसला है. मोदी को प्रधान मंत्री पद का प्रत्याशी बनाने का मतलब है आडवाणी का महत्व हमेशा के लिए खत्म हो जाना.

आज ‘फ्राइडे द थर्टीन्थ’ यानी शुक्रवार और 13 तारीख़ है- पश्चिमी रवायत के अनुसार अशुभ संख्या, जो भारतीय संस्कृति में रची-बसी भाजपा, आडवाणी और मोदी के लिए महत्वपूर्ण नहीं है. केवल भारतीय मीडिया के लिए रोचक मसाला है.

क्या संसदीय बोर्ड के बाहर होगा फैसला?

कह नहीं सकते कि आज फैसला होगा या नहीं. आज संसदीय बोर्ड की बैठक होगी भी या नहीं. और होगी तो आज ही फैसला सार्वजनिक किया जाएगा या नहीं. सम्भव यह भी है कि संसदीय बोर्ड की बैठक बुलाए बगैर घोषणा कर दी जाए. आडवाणी ने सन 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी के नाम की घोषणा कर दी थी और संसदीय बोर्ड ने फैसला बाद में किया. इस अर्थ में पार्टी में परम्परा है और राजनाथ सिंह इसके लिए अधिकृत हैं.

भाजपा संसदीय बोर्ड में अरुण जेटली, वेंकैया नाय़डू, राम लाल, थावर चंद गहलोत और राजनाथ सिंह मोदी के पक्ष में हैं. लालकृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज और मुरली मनोहर जोशी इस वक्त प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी की घोषणा करने के पक्ष में नहीं हैं.

सम्भव है सुषमा और जोशी बहुमत की राय को पार्टी के हित में स्वीकार कर लें. नितिन गडकरी और अनंत कुमार संघ के निर्देश के खिलाफ नहीं जाएंगे. ग्यारहवें सदस्य अटल बिहारी वाजपेयी हैं जो लंबे अरसे से बीमार पड़े हैं.

फैसला इन दस को करना है. वोट के आधार पर फैसला कभी भी हो सकता है, पर पार्टी सर्वानुमति चाहेगी. ऐसे फैसले निर्विवाद होने चाहिए. इसका मतलब है कि संसदीय बोर्ड की बैठक तभी होगी जब आडवाणी जी मान जाएंगे. क्या वास्तव में ऐसा सम्भव है वे विरोध न करें?

एक बार वे इस्तीफा देकर वापस ले चुके हैं, क्या वे दोबारा नहीं दे सकते? मीडिया रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने राजनाथ सिंह से कहा है कि गोवा की बैठक में मैं गया नहीं, पर संसदीय बोर्ड की बैठक में मैं जाऊँगा और विरोध दर्ज कराऊँगा. राजनाथ सिंह और बीजेपी के लिए यह परीक्षा की घड़ी है.

अगले पाँच या छह दिन में तमाम बातें तय हो जानी चाहिए. 14 को राजनाथ सिंह को मुम्बई जाना है, 15 को मोदी की रेवाड़ी में रैली है. इसके बाद 16 का दिन मिलता है. इसके दो दिन बाद पितृ पक्ष शुरू है. भाजपा ‘फ्राइडे द थर्टींथ’ की अनदेखी कर सकती है, पितृ पक्ष की नहीं. माना जा रहा है कि या तो आज फैसला होगा नहीं तो सोमवार को. और इसे होना ही है तो आज ही क्यों न हो?

हाशिए पर जाएंगे आडवाणी?

खबरें हैं कि मोदी समर्थकों ने फैसला कर लिया है कि आडवाणी मान जाते हैं तो ठीक, पर यदि वे हठ पर अड़े ही रहे तब फिर जी भर के तेज और कड़े फैसले किए जाएं और आडवाणी को हाशिए पर धकेलते हुए उन्हें विलेन बना दिया जाए. यानी एकतरफा तौर पर घोषणा कर दी जाए. इसके राजनीतिक परिणाम विनाशकारी भी हो सकते हैं. पार्टी अंतिम क्षण तक बदमजगी को दूर रखने की कोशिश करेगी.

आडवाणी क्या मौके की नजाकत को नहीं समझ रहे हैं? क्या उन्हें लगता है कि जिस पार्टी को उन्होंने पाल-पोसकर ताकतवर बनाया वह उनसे धोखा करेगी? गुरुवार को सुधीन्द्र कुलकर्णी और सुशील मोदी की ट्विटर पर जंग चलती रही. सुधीन्द्र कुलकर्णी का कहना है कि जिस नेता के नाम पर पार्टी में इस स्तर का पोलराइजेशन हो गया है, वह प्रधानमंत्री बन गया तो क्या होगा.

बुधवार को सुशील मोदी का ट्वीट था आडवाणी पब्लिक मूड को समझने में विफल रहे. उन्होंने जिस तरह आगे बढ़कर अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित किया वे नरेन्द्र मोदी के लिए भी ऐसा कर सकते हैं. गुरुवार को उन्हें लगा शायद बात ज्यादा कड़ी हो गई है सो गुरुवार को उन्होंने ट्वीट किया कि आडवाणी भाजपा के सबसे ऊँचे नेता हैं उनके आशीर्वाद के बगैर नमो, वसुंधरा, शिवराज और उमा भारती मुख्यमंत्री नहीं बन पाते.

भाजपा का सैद्धांतिक दोष

आडवाणी चाहते हैं कि चार राज्यों में चुनाव के पहले कोई फैसला न किया जाए. मोदी के नाम को लेकर उन्हें लगता है कि मोदी के कारण भाजपा को सहयोगी दल नहीं मिलेंगे. पर यह सैद्धांतिक बात है. व्यावहारिक बात यह है कि वे इसे अपनी व्यक्तिगत पराजय के रूप में देखते हैं. मोदी के समर्थन और विरोध में भी उनके अंतर्विरोध व्यक्त होते हैं.

वे आज ऐसा क्यों सोचते हैं कि सहयोगी दल नहीं मिलेंगे? इसलिए कि 1992 के बाद भारतीय जनता पार्टी राजनीतिक दृष्टि से अछूत हो गई थी. यह बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद का सबक था. सबसे बड़ा सच यह है कि भाजपा के पास इस देश के सभी तबकों को जोड़कर रखने का विचार नहीं है.

अलबत्ता यह समझ में आता है कि उन्हें भाजपा के संकीर्ण रास्ते का भान देर से हुआ. पर कम से कम 1996 में उन्हें इतना समझ में था कि भाजपा इतने संकीर्ण रास्ते पर जा चुकी है कि दूसरे राजनैतिक दल उससे गठबंधन नहीं करेंगे. इसलिए उन्होंने प्रधानमंत्री पद के लिए अटल बिहारी वाजपेयी का नाम आगे बढ़ाया.

पर नरेन्द्र मोदी तो उनके शिष्य थे और 2002 के कारण कलंकित हो गए थे. उनके विवादास्पद होने की बात उन्हें आज क्यों समझ में आई, पहले क्यों नहीं?

मोदी जब बाहरी दुनिया के लिए विवादास्पद हो रहे थे तब आडवाणी ने उनका साथ दिया, बल्कि बचाया. इधर आडवाणी ने अपनी छवि उदार राजनेता की बना ली है. इसके लिए उन्होंने जिन्ना का सहारा लिया. इससे उनके विचार की परिपक्वता नहीं असमंजस दिखाई पड़ता है.

अटल बिहारी वाजपेयी भी इसी राजनीतिक हिन्दुत्व के नेता थे, पर बाबरी मस्जिद के मसले पर उन्होंने सावधानी से खेद व्यक्त कर दिया, जबकि आडवाणी 'जो कहा, सो किया' वाली लाइन पर थे.

उनका राजनीतिक भविष्य 2009 के चुनाव में भाजपा की जबर्दस्त पराजय के बाद तय हो गया. वे अब नेता विपक्ष भी नहीं है. भारतीय जनता पार्टी को आज समझ में आता है कि यूपीए सरकार ‘एंटी इनकम्बैंसी’ की शिकार होगी. दूसरा कारण है कांग्रेस में नेतृत्व का संकट.

इसीलिए अरुण जेटली लगातार अगले लोकसभा चुनाव को नेतृत्व के मुकाबले के रूप में प्रदर्शित कर रहे हैं. कांग्रेस पार्टी की ओर से राहुल गांधी तैयार नहीं हैं और मनमोहन सिंह आडवाणी की दशा को प्राप्त हो चुके हैं.

कार्यकर्ता मोदी के साथ

नरेन्द्र मोदी की छवि तेज-तर्रार नेता की है या बनाई जा रही है. पार्टी के शिखर नेतृत्व में भले ही दूसरी राय हो, नीचे का कार्यकर्ता चाहता है कि चुनाव में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में ही उतरना चाहिए. आडवाणी इस फैसले को अब तक टाल सकते थे, रोक नहीं सकते.

हाल में जब नरेन्द्र मोदी ने कहा कि प्रधानमंत्री बनने की मेरी महत्वाकंक्षा नहीं है, तो उसके साथ लिपटा संदेश था कि फैसला करना है तो जल्दी करो. मोदी की परीक्षा होनी है तो विधानसभा चुनाव से ही क्यों न हो?

मोदी के बारे में फैसला करने के बाद भी पार्टी की चुनौतियाँ खत्म नहीं होंगी, बल्कि बढ़ेंगी. फैसला सर्वसम्मति से नहीं हुआ तो यह खराश आसानी से नहीं जाएगी. विधान सभा चुनावों में पर्याप्त सफलता नहीं मिली तो यह लोकसभा चुनाव के लिए अशनि संकेत होगा.

एनडीए लगभग खत्म हो चुका है. चुनाव पूर्व गठबंधनों में इस बार ज्यादा जान नहीं होगी. पार्टी को जीतना है तो उसे एकजुटता और कार्यकर्ता के सुदीर्घ मनोबल की जरूरत होगी.

जहाँ तक मोदी का तीर है, वह धनुष पर चढ़ाया जा चुका है. उसे वापस लेना भी सम्भव नहीं है. आज का ‘फ्राइडे द थर्टींथ’ काफी महत्वपूर्ण लगता है भले ही मोदी, राजनाथ सिंह और आडवाणी इस अंधविश्वास को न मानते हों.

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