लद्दाख, जहाँ के 'सिल्क रूट' को दुनिया जानती है

लद्दाख

लद्दाख की ख़ूबसूरती के बीच करीब 11 हजा़र फ़ीट की ऊंचाई पर आज से अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म फ़ेस्टिवल शुरू हो रहा है. यह फेस्टिवल अपने आप में एक अनूठा प्रयास है. इसी की कवरेज के लिए मेरा लद्दाख आना हुआ है.

लद्दाख पहुँचने से पहले विमान से ही इसकी झलक आपका मन मोह लेती है.

दिल्ली की दौड़-धूप और कंक्रीटनुमा इमारतों के बीच रहने वाले शायद किसी भी बाशिंदे को लद्दाख की शांति और ठहराव भा जाएगा.

हर तरफ़ ऊंचे पर्वत, जिन पर हरियाली नहीं है, मानों आपसे कुछ कहते हैं. कुछ ही महीनों में ये बर्फ़ से लद जाएँगे.

हेलो लद्दाख

लद्दाख से जान-पहचान अभी एक दिन की ही है पर जिस बात ने दिल को छू लिया, वो हैं यहाँ के लोग. अजनबी होते हुए भी हर कोई मदद के लिए तैयार रहता है.

सरहदी इलाक़ा होने के कारण यहाँ हर क़दम पर सेना के ट्रैक और जवान दिख जाते हैं.

एक दिन के लद्दाख भ्रमण के दौरान भारत के कई हिस्सों से आए पर्यटक भी मिले. ज़्यादातर की राय यही थी कि मुख्यधारा में लद्दाख की संस्कृति, जीवन, प्रशासन, गौरवशाली इतिहास की चर्चा कम ही की जाती है.

इसीलिए लद्दाख पहुँचकर इसे ज़रा क़रीब से जानने की कोशिश मैं भी कर रही हूँ.

सिंधु से हिंदुस्तान का सफ़र

स्थानीय लोगों का कहना है कि भारत को हिंदुस्तान नाम दरअसल सिंधु नदी से मिला, वही सिंधु नदी जो अविभाजित भारत की शान थी.

अब यही सिंधु नदी भारत में लद्दाख से बहती हुई पाकिस्तान चली जाती है. यह लद्दाख की मुख्य नदी है.

एक ओर पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर है, तो दूसरी ओर चीन और तीसरी ओर है हिमाचल की स्पीति घाटी. इन सबसे घिरा लद्दाख. समुद्र तल से कोई 2300 से 5000 मीटर ऊपर.

जम्मू-कश्मीर का हिस्सा लद्दाख अपनी मिली-जुली बौद्ध और मुस्लिम संस्कृति और लैंडस्केप के लिए ख़ासा मशहूर है.

इसे 'मूनलैंड' यानी चाँद की ज़मीन भी कहा जाता है.

जब सिल्क रूट से बिकता था रेशम, पश्मीना

Image caption एक दिन के लद्दाख भ्रमण के दौरान भारत के कई हिस्सों से आए पर्यटक भी मिले.

प्राचीन काल में लद्दाख कई अहम व्यापारिक रास्तों का प्रमुख केंद्र था. लद्दाख मध्य एशिया से कारोबार का एक बड़ा गढ़ था.

लद्दाख के वरिष्ठ इतिहासकार और विद्वान एजी शेख बताते हैं, “सिल्क रूट की एक शाखा लद्दाख से होकर गुज़रती थी. दूसरे मुल्कों के कारवां के साथ सैकड़ों ऊँट, घोड़े, खच्चर, रेशम और कालीन लाए जाते थे जबकि हिंदुस्तान से रंग, मसाले आदि बेचे जाते थे. तिब्बत से भी याक पर ऊन, पश्मीना वगैरह लादकर लोग लेह तक आते थे. यहां से इसे कश्मीर लाकर बेहतरीन शॉलें बनाई जाती थीं. बाद में दलाई लामा के भारत आ जाने से ये व्यापारिक लेन-देन ख़त्म हो गया."

मध्य एशिया से लेह के ज़रिए व्यापार 1950 में ही ख़त्म हो गया था क्योंकि चीन में कम्युनिस्ट सरकार की नीतियाँ अलग थीं.

लद्दाख पहुँचने के बाद यहाँ के बाज़ार की अभी बस झलक ही देखने को मिली है. बहुत सी दुकानों में काम करने वाले उत्तर भारत के राज्यों से आए हुए लोग दिखे. पूछने पर पता चला कि खेती बाड़ी और अन्य कामों के लिए बिहार से काफी लोग यहाँ आते हैं.

दगाबाज मौसम

Image caption सरहदी इलाक़ा होने के कारण हर कदम पर सेना के ट्रेक और जवान दिख जाते हैं.

लद्दाख दरअसल दो शब्दों से बना है. लाह यानी दर्रे और लाह कहते हैं, रहने वाले को. करीब 33,554 वर्ग मील में फैले लद्दाख में बसने लायक जगह बेहद कम है. यहाँ हर ओर नंगे पहाड़ और मैदान हैं. जनसंख्या है-236,539.

एक बात है कि अगर आप लद्दाख आए हैं तो यहाँ का मौसम थोड़ा दगाबाज़-सा साबित हो सकता है. दिन में आँखों में चुभने वाली तेज़ धूप और देखते ही देखते सर्द हवाएँ आपको आगोश में ले लेंगी. हवा ऐसी जो बदन को चीर देगी.

11227 फ़ीट की उँचाई से मैं ये डायरी अपने होटल के बाहर बैठकर लिख रही हूँ, कमरे में इंटरनेट जो काम नहीं कर रहा. ये भी लद्दाख का एक पहलू है.

अगले कुछ दिनों में लद्दाख के बारे में कुछ और बातें आपसे साझा करूँगी. अभी लद्दाख संगीत के बीच लद्दाखी खाना हमारा इंतज़ार कर रहा है.

(लद्दाख से बीबीसी संवाददाता वंदना की डायरी)

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