बदल गई है बड़े साहबों की दुनिया

असली बड़े साहब तो आईसीएस वाले थे. ये वो लोग थे जो भव्य कोठियों में राजसी ठाठबाठ के साथ रहा करते थे.

बियर के अनगिनत दौरों के साथ पांच कोर्स का लंच इनकी दिनचर्या में शामिल होता था. दोपहर के बाद पंखा ब्वाय द्वारा की जाने वाली हवा में वो ऊंघते सुस्ताते, शाम को टेनिस खेलते और खाने से पहले ब्रिज.

ब्रिटिश साम्राज्य की पूरी प्रभुसत्ता उनके हाथों में होती. अधिकारों की हिस्सेदारी के लिए न कोई मंत्री होता, न सांसद, न विधायक और न कोई सरपंच.

उनके मुँह से निकला मामूली शब्द भी क़ानून होता. उस शब्द को लाठी, तलवार, कोड़े और बंदूक़ के दम पर मनवाने के लिए सरकार का तमाम लाव-लश्कर मौजूद होता.

अपने बेंत के सिंहासन पर बैठकर वो दहाड़ते, ''अरे! कोई है?" और उनके इर्दगिर्द मौजूद ख़ानसामों, जमादारों और चपरासियों के बीच उन तक पहुँचने की होड़ लग जाती.

उनका नाम भी याद रखना वो अपनी शान के ख़िलाफ़ समझते थे. उनके कपड़े लंदन में सेवाइल रो में सिलते.

लाट साहब का रौब

हिंदुस्तानियों के आईसीएस में घुसने के बाद उदय हुआ भूरे बड़े साहबों का. गोरा साहब भले ही कभी-कभार अपनी मूँछ नीची कर रहीमबख़्श ख़िदमतदगार को पुकार लेता, अधनंगे फ़कीर गाँधी को सज़ा सुनाते समय उनकी तारीफ़ कर देता या ठेठ उर्दू बोलने की कोशिश करता.

लेकिन भूरा साहब क्रूर व्यवस्था का अंग होने पर शर्मसार होने के बावजूद ब्रिटिश राज के गर्भ गृह में सेंध लगाने पर गौरवान्वित महसूस करता. उसे हमेशा ये डर कचोटता कि कहीं उससे कोई भूल न हो जाए. इसलिए वो क्वींज़ इंग्लिश बोलता, ऊपरी होंठ मुश्किल से खोलता और अफ़सराना गुणों का प्रदर्शन करता.

भूरे साहब के ख़्वाबो-ख़्याल में ये बात कभी नहीं आई कि काला सूट गोरे रंग पर ही फबता है, क्योंकि ये गुलाबी लिए सफ़ेद रंग को और निखारता है.

उसे इस बात का अंदाज़ा ही नहीं होता कि काले रंग पर काला सूट पहनने का मतलब है, शक्ल का बिल्कुल ग़ायब हो जाना. ज़ायकेदार आमों को प्लेट में क़रीने से सजाने के पीछे जो बेतुकापन है, उसका ध्यान उस ओर कभी नहीं जाता. उसको इसका पता ही नहीं था कि ये फल हाथ में लेकर होठों से चूसने की चीज़ है.

उसे ये बात भी सामान्य लगती थी कि आलू के पराठे को कांटे और छुरी से खाया जाए. वो पापड़ को बिना आवाज़ खाने के कौशल जैसी बेकार की बातों के लिए अपनी नींद हराम किए रहता था.

फिर देश आज़ाद हुआ. आईसीएस की भर्ती बंद कर दी गई और उसकी जगह शुरू हुआ आईएएस का चलन.

‘बड़े साहब’ के भूत को दफ़न करने का ये बेहतरीन मौक़ा हो सकता था लेकिन ये मौक़ा भी हाथ से निकल जाने दिया गया.

अंग्रेजों की नक़ल

आईसीएस अधिकारी बहुत दिनों तक अपनी पुरानी छवि को बरक़रार रखे रहे और आईएएस में आने वाले नए रंगरूटों के आदर्श बने रहे.

इन्होंने भी भूरे बड़े साहबों की तरह अंग्रेज़ों की नक़ल करने की कोशिश की. नतीजा ये हुआ कि वो प्रतिलिपि की प्रतिलिपि बन कर रह गए.

कितनी ही बैठकों और समितियों के गठन के बाद सरकार ने तय किया कि इन सेवाओं में ग़रीब परिवारों, ग्रामीण क्षेत्रों, दलितों और पिछड़े तबक़े के प्रतिभाशाली लड़के-लड़कियों को भी लाया जाए.

इंटरव्यू में पास होना अब ज़रूरी नहीं रह गया था. नए प्रोबेशनर्स को सही मूल्य और दृष्टिकोण सिखाने के लिए मसूरी में राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी खोल दी गई.

हुआ ये कि हरियाणा के एक गाँव के महावीर सिंह आईएएस बन गए. वो पांचों उंगलियों से सरसों का साग, मक्के की रोटी और देसी घी खाने के शौक़ीन थे.

Image caption एक आम आईएएस अधिकारी की छवि का चित्रण.

ऊपर से लस्सी, शर्बत और कांजी भी गला तर करने के लिए पीते. खद्दर की धोती और कुर्ता पहनते और नित्यक्रिया के लिए लोटा ले कर खुले खेत में जाते.

इस तरह का आदमी किसी ज़िले का कलेक्टर कैसे हो सकता था? उसका तौर तरीक़ा बिल्कुल एक आम हिंदुस्तानी जैसा था.

महावीर की मिसाल

ऐसे में उसकी इज़्ज़त कौन कर सकता था ? वो अपने हर वाक्य में ठेठ हरियाणवी में लोगों की ‘माँ बहन’ का ज़िक्र करता. आख़िर ये कब तक चलता.

धीरे-धीरे महावीर को उदाहरण और दोस्तों के दबाव में साहबी के तौर तरीक़े सिखाए गए.

अब वो शालीनता के साथ डाइनिंग चेयर पर बैठता. उसकी गोद में नैपकिन होती, कोहनियाँ मेज़ पर नहीं होतीं और वो कांटे-छुरी का सही इस्तेमाल करता.

लंच पर वो ठंडी बियर मंगवाता, दोपहर में जिन के साथ नींबू लेता और शाम को सोडे के साथ विहस्की पीता.

उसको अब इस बात की तमीज़ आ गई थी कि लाल मांस के साथ रेड वाइन और सफ़ेद माँस के साथ व्हाइट वाइन पी जाती है.

अब उसका पहनावा था, नीला ब्लेज़र या भूरे या सिलेटी रंग का थ्री पीस सूट, कफ़लिंक्स, टाईपिन और बांई जेब में लाल रंग का सिल्क का रूमाल.

उसने अपने दोस्त हरि की ‘हैरी’ कहलवाने की इच्छा को ख़ुशी ख़ुशी मान लिया. देखते ही देखते ग्रोवर ‘ग्रूवी’ बन गया और ज्योति ‘जो जो.’

उसके दो बच्चे हुए जिनका दाख़िला उसने सीधे सनावर के स्कूल में कराया जहाँ बड़े-बड़े उद्योगपतियों, फ़िल्मी और खेल जगत के सितारों और राजनीतिक हस्तियों के बच्चे उनके सहपाठी थे.

इलीट् क्लास

महावीर का बातचीत करने का खुला और बड़बोला अंदाज़ कहीं पीछे छूट गया था. उसके लहजे में अब ठंडापन और औपचारिकता आ गई थी जिससे अब उससे संवाद आगे बढ़ाना मुश्किल हो चुका था.

अब उसको हलकी फुलकी बातचीत में मुश्किल आने लगी थी. अब वो नख़रेबाज़, बात-बात पर नाक भौं सिकोड़ने वाला इंसान बन चुका था जिसके माथे पर हमेशा बल पड़े रहते थे. अब चिकोटी काटने पर उसके मुंह से ’उई’ की जगह ‘आउच’ निकलता था.

आज महावीर एक तोंदू और अधेड़ इंसान दिखाई देता है. उसका एक हाथ पैंट की जेब में होता है और दूसरे हाथ में उसने पाइप पकड़ रखा है.

उसमें वो देहाती महावीर बिल्कुल नदारद है जिसका बाप एक मामूली किसान और माँ अनपढ़ गंवार हुआ करती थी. अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि को ले कर वो हमेशा शर्मसार रहता. उन्हें मां बाप मानना भी उसे गवारा नहीं था.

एक बार उसके यहाँ चल रही पार्टी के दौरान वो दोनों अचानक बिना बताए आ पहुंचे थे और उसने उन्हें जल्दी-जल्दी पीछे के कमरे में पहुंचा दिया था ताकि कोई उन्हें देख न पाए.

अब इक्कीसवीं सदी के बड़े ‘साहब’ के वो जलवे कहाँ! अब कोई ख़िदमतगार ही नहीं हैं जिसे वो ''कोई है" कह कर पुकार सके.

उसकी नौकरी से सारी शक्तियाँ निचोड़ली गई हैं. अब नोट भी उसे लिखना पड़ता है और प्रस्ताव को मंज़ूरी भी उसे देनी पड़ती है. जब कोई फ़ाइल बम की तरह फटती है तो उसका शिकार भी वो ख़ुद बनता है.

उच्च कोटि का दंभ

वो नाक पर मक्खी नहीं बैठने देता. उच्च कोटि का दंभी है, मानो वही एक देवलोक से उतरा है. वो आम लोगों के साथ बातचीत करना पसंद नहीं करता.

अक्सर किसी पार्टी में उसे धीमे से ये पूछते पाया जा सकता है, "कौन सी सेवा से हैं आप ?" अगर जवाब मिले ‘रेलवे ट्रैफ़िक’ या ऐसी ही कोई सेवा, तो उसकी भौहें थोड़ी सिकुड़ती हैं और उसकी आंखों में हिक़ारत की एक पतली सी लकीर हिचकोले लेने लगती है.

उसके मुँह से बरबस निकलता है "ओह'' और आगे के शब्द उसके मुंह से निकल ही नहीं पाते और वो जल्दी-जल्दी उस ओर बढ़ जाता है जहाँ उसकी बराबरी के लोग खड़े हैं.

एक कार्टूनिस्ट से कहा जाए तो वो एक औसत आईएएस अधिकारी का चित्र बनाते हुए उसे गोलमटोल, औपचारिक और ज़रूरत से ज़्यादा पोशाक पहने हुए, एक ख़ास अंदाज़ में सिगार पीते हुए, हर चीज़ को न कहते हुए और लालफ़ीताशाही के फ़ीतों में उलझा हुआ दिखाता है. वो नेताओं के आगे पीछे मंडराता है, गिरगिट की तरह रंग बदलता है और सत्ता के लिए जोड़तोड़ करता हुआ दिखाई देता है.

कोई कह नहीं सकता कि उसकी ये कार्टूनी तस्वीर असलियत से बहुत दूर है.

(एमके कॉव भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय और नागरिक उड्डयन मंत्रालय के सचिव रहे हैं. उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों की छवि का चित्रण किया है.)

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