मोदी का दांव उल्टा पड़ेगा या सीधा, मीडिया में चर्चा

नरेन्द्र मोदी

भारतीय मीडिया गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को भारतीय जनता पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनने के बाद उनके पहले भाषण का विश्लेषण कर रहा है.

मोदी ने रविवार को हरियाणा के रेवाड़ी में एक जनसभा को संबोधित किया, जहां उन्होंने मुख्य रूप से विदेश नीति पर बात की.

उन्होंने देश में सशक्त नेतृत्व की वकालत की, 'असली धर्मनिरपेक्षता' साबित करने में सेना की सराहना की और पाकिस्तान को ग़रीबी से लड़ने पर अपना ध्यान लगाने की सलाह दी.

भाजपा ने शुक्रवार को एक संवाददाता सम्मेलन में मोदी को 2014 में होने वाले लोकसभा चुनावों के लिए पार्टी को तरफ से प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाने की घोषणा की थी.

कुछ अख़बारों का मानना है कि मोदी को कांग्रेस की अगुवाई वाली केंद्र सरकार की आलोचना करने के बजाए देश के विकास के बारे में एक सकारात्मक रूपरेखा देने की ज़रूरत है.

नकारात्मक मसाला

द टाइम्स ऑफ़ इंडिया का कहना है कि मोदी के पास सरकार को निशाना बनाने के लिए बहुत सारा नकारात्मक मसाला मौजूद है लेकिन उन्हें अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर लाने के लिए भाजपा की योजना के बारे में बताना चाहिए.

अख़बार के मुताबिक़ गुजरात के आर्थिक विकास का श्रेय मोदी को जाता है और उनका रिकॉर्ड इस मोर्चे पर उन्हें विश्वसनीय बनाता है.

लेकिन हिन्दुस्तान टाइम्स का कहना है कि इस बात का कोई मतलब नहीं है कि गुजरात के मॉडल को देश में सब जगह दोहराया जा सकता है. भारत जैसे विशाल और विविधताओं वाले देश में इसकी पुनरावृत्ति नहीं की जा सकती है. मोदी को यह बताना होगा कि देश के ग़रीब और उपेक्षित लोगों के लिए उनके पास क्या योजना है.

हिंदी अख़बार अमर उजाला का मानना है कि मोदी को अभी यह साबित करना है कि राष्ट्रीय राजनीति में वह कितने सक्षम हैं. गुजरात की सफलता या सरकार की आलोचना से काम नहीं चलेगा.

आरोप

अख़बारों में इस बात का भी जिक्र है कि क्या मोदी के विवादास्पद अतीत से भाजपा को नुकसान होगा. गुजरात को देश के सबसे संपन्न राज्यों की कतार में शामिल करने का श्रेय मोदी को जाता है.

लेकिन उन पर 2002 के मुस्लिम विरोधी दंगों को रोकने के लिए जरूरी कदम नहीं उठाने का भी आरोप है. इन दंगों में 1000 से अधिक लोग मारे गए थे. हालांकि मोदी ने हमेशा इस आरोप से इनकार किया है.

द टाइम्स ऑफ़ इंडिया का कहना है, "मोदी अपने विकास रिकॉर्ड से कहीं ज़्यादा पार्टी पर बोझ बन सकते हैं लेकिन इसमें संतुलन कायम करके वो भाजपा में नई जान फूंक सकते हैं."

द ट्रिब्यून ने मोदी की नियुक्ति को एक जुआ बताया है. अख़बार का कहना है कि इस कदम से भाजपा की ओर ज्यादा संख्या में मतदाता जुड़ेंगे जबकि इसकी अपेक्षा कम मतदाता पार्टी से विमुख होंगे.

जनसत्ता ने लिखा है, "भाजपा की सारी उम्मीदें अब मोदी पर टिकी हैं लेकिन पार्टी का यह दाव उल्टा भी पड़ सकता है"

आडवाणी युग

स्थानीय मीडिया का कहना है कि भाजपा के संस्थापक सदस्यों में से एक लाल कृष्ण आडवाणी मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने से नाराज़ थे और यही वजह थी कि उन्होंने विरोधस्वरूप शुक्रवार के संवाददाता सम्मेलन में हिस्सा नहीं लिया.

अख़बारों का मानना है कि भाजपा ने आडवाणी के विरोध के बावजूद मोदी की ताज़पोशी करके बहुत साहसिक कदम उठाया है.

एशियन एज के मुताबिक़ आडवाणी को किनारे किए जाने से साथ ही पार्टी में उनका युग समाप्त हो गया है.

लेकिन अख़बार का ये भी मानना है कि चुनाव के बाद उभरे परिदृश्य में मोदी को सहयोगी जुटाने के लिए आडवाणी जैसे दिग्गज नेता की जरूरत पड़ सकती है.

द पायनियर का भी मानना है कि जो कुछ हुआ उसके बावजूद आडवाणी पार्टी के सबसे बड़े और सम्मानित नेता हैं और मोदी को इस समय उनके मार्गदर्शन की जरूरत है.

'नहीं देंगे सोने की जानकारी'

दूसरी ख़बरों में द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़ देश के दक्षिणी प्रांत केरल में गुरूवयूर के एक मंदिर ने सोने के अपने ख़जाने के बारे में जानकारी साझा करने के भारतीय रिज़र्व बैंक के आग्रह को ठुकरा दिया है.

रिपोर्ट के मुताबिक़ गुरूवयूर का श्री कृष्ण मंदिर देश के सबसे अमीर मंदिरों में से एक है और उसके ख़जाने में सोने के अलावा कई बहुमूल्य चीज़ें शामिल हैं. रिपोर्ट में आरबीआई के प्रवक्ता के हवाले से कहा गया है कि बैंक को अपने आंकड़ों को दुरुस्त करने के लिए यह जानकारी चाहिए थी.

आख़िरकार दिल्ली में कूड़ेदानों का कायाकल्प होने जा रहा है. द पायनियर के मुताबिक़ एजेंसियों ने कूड़ेदानों को रंगवाने का फ़ैसला किया है.

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