मुजफ्फ़रनगरः दंगे, कर्फ्यू और स्टेशन पर पीपली लाइव

  • 18 सितंबर 2013
दंगा, पत्रकार, मुज़फ़्फ़रनगर

मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के दौरान स्थानीय और बाहर से बड़ी तादाद में टूट पड़े पत्रकारों का जमघट ज़िला जनसंपर्क कार्यालय के बाहर लगा था.

उनके गलों में उनका प्रेस कार्ड था. और वे थके हुए थे. कुछ इसलिए कि वे लगातार इस घटनाक्रम को कवर कर रहे थे.

कुछ दिल्ली या दूसरी जगहों से यहां तक पंहुचे थे. और ज्यादातर इसलिए कि दंगे के चौथे दिन ख़बरों का टोटा पड़ने लगता है. रूटीन और सरकारी विज्ञप्तियों के बाहर कोई सुराग मिलने की तलाश. और कुछ छूट न जाने का डर भी.

एक गरीब रिपोर्टर दूसरे से पूछ रहा था "यार, कोई कोट-वोट पड़ा हो तो दे, कहानी चार बजे के पहले भेजनी है और 1.30 बजे दोपहर तक तो यहीं बैठे हैं. कुछ कल का पड़ा हो तो बता."

किसी दूसरे कोने में तीन रिपोर्टर फ़र्जी नाम और कहानियाँ गढ़ रहे थे और तय कर रहे थे साथ छापें.

उकताए हुए कहानी तलाशते पत्रकार, तस्वीरों की टोह लेते कई फ़ोटोग्राफ़र, हर कोई एक दूसरे से कहानी, बाइट या कोट मांगता बोरियत से भरा वहां बैठा था. मैं भी.

तभी एक स्थानीय फ़ोटोग्राफ़र वहाँ आए और मेरे गले में लटके पहचान पत्र को देख कर बोले, "आपके लिए रेलवे स्टेशन पर एक स्टोरी बन सकती है."

Image caption रज़ा कहते हैं कि वो साल 1957 में पाकिस्तान चले गए थे.

वो आगे बोले, "स्टेशन पर एक बुड्ढा पाकिस्तान से आया है. बैठा रो रहा है पुलिस वालों के पास. यहाँ अपने बेटे से मिलने आया था अब स्टेशन पर फंसा है क्योंकि शहर में तो कर्फ्यू लगा है.."

मैं दौड़ा. मेरे साथ कुछ और फ़ोटोग्राफ़र भी.

स्टेशन पहुंचे तो वहां मिले सैयद मुक़र्रब रज़ा. रज़ा पाकिस्तानी थे, बकौल उनके उनकी उम्र 90 साल थी.

हालांकि उनका पासपोर्ट कहता था कि वो 68 साल के हैं, स्टेशन पर कर्फ्यू के कारण घुसते ही सामने एक नंबर प्लेटफॉर्म के बाहर बैठे थे.

वैसे उनके बैठने के अंदाज़ को पसरना कहा जा सकता है और उनके चेहरे की रौनक को देखकर ये कहना मुनासिब होगा कि वो जलवा अफ़रोज़ थे.

सामान के नाम पर दो बैग जिन्हें देख कर लगता था कि वो बहुत सफ़र कर चुके हैं. एक बस्ते में एक प्लास्टिक का डिब्बा था जिसमें हिफाज़त से पाकिस्तान का पासपोर्ट सहेजा हुआ था.

लेकिन जिन फ़ोटोग्राफ़र महोदय ने हमें उम्मीद की मशाल पकड़ा कर दौड़ाया था उनके ब्योरे से अलग रज़ा दुखी नहीं थे और रो तो बिलकुल नहीं रहे थे.

मैंने पूछा, “बाबा बात करेंगे” तो रज़ा बोले " मुझे क्या दोगे, मिठाई खिलाओ."

मैं बोला, “चचा शहर तो मय हलवाइयों के बंद है, यूं ही बात कर लो.”

इतनी देर में ही... ढेर सारे फ़ोटोग्राफ़र दौड़े आये. उनके कैमरों ने बुजुर्गवार को घेर लिया. वे मुजफ़्फ़रनगर रेलवे स्टेशन की मक्खियों को अपने हाथ से उड़ाते रहे.

आसपास मौजूद पुलिस के जवान उनको पानी वगैरह दे चुके थे और बता चुके थे कि उन्हें उनके बेटे के घर छोड़ने के लिए थानेदार की गाड़ी गश्त ख़त्म कर के आएगी.

बेटे से उनकी बात कोई दूसरा पुलिस अधिकारी करा ही चुका था.

रज़ा इत्मीनान से थे . फ़ोटोग्राफ़रों ने रज़ा से अपना पासपोर्ट दिखाने को कहा.

उन्होंने अपना पासपोर्ट फ़ोटोग्राफ़र के हाथ में दे दिया.

Image caption इस आर ऐ एफ के जवान के कभी नहीं सोचा होगा कि दंगा ग्रस्त इलाके में उसे तमाम किस्म के पोज़ देने को भी कहा जाएगा .

एक फ़ोटोग्राफ़र ने उनसे कहा “बाबा इसे खोल कर पकड़ोगे तुम्हारी तस्वीर लेंगे.”

रज़ा बोले, "मैं क्या तुम्हारे बाप का नौकर हूँ. खुद पकड़ लो और खींच लो तस्वीर."

मैं बोला, “क्या यहाँ आ कर फंस गए बाबा.”

तो बड़े मियां ने मज़े लेते हुए कहा, "फंसे तो तुम हो बेटा. मैं तो आराम से बैठा हूँ और तुम लोग मुझे घेरे खड़े हो. खूब मौजें उड़ा रहे थे, अब काम करना पड़ रहा है. सच बोला करो झूठ मैं झट से पकड़ लेता हूँ."

वैसे मैंने फ़ोटो पत्रकारों की धुन पर बड़े-बड़े नेता सरकारी अधिकारी, अभिनेताओं को नाचते देखा है.

एक मुख्यमंत्री को एक उद्घाटन समारोह में मैंने केवल फ़ोटोग्राफ़रों के आग्रह पर दोबारा दिया जलाते देखा है.

सरकारी अधिकारियों नेताओं को राहत के चेक बांटे वक़्त पांच-पांच मिनट तक चेक पकडे एक मुद्रा में मूर्तिवत खड़े देखा है ताकि स्थानीय अखबार का फोटोग्राफर ढंग से मुस्कुराती तस्वीर उतार ले.

लेकिन मुझे ये भी मालूम हैं कि अगर फोटोग्राफरों के सामने कोई अड़ियल सैयद मुक़र्रब रज़ा की तरह का कोई आदमी पड़ जाए तो बड़ी मुश्किल होती है.

अब दुनिया भर की एजेंसियों, अख़बारों को रोज़ाना ढेरों फ़ोटो भेजना कोई आसान काम तो है नहीं. फ़ोटोग्राफ़र जिन्हें लग रहा था कि रज़ा का फ़ोटो खींच कर एहसान करने वाले हैं पांच मिनट में लगभग गिड़गिड़ाने लगे.

एक बोला, "पकड़ लो बाबा, मिठाई तो नहीं है समोसा खिला दूंगा. सुबह कहीं से लिया था अपने लिए." बड़ी मान मनौव्वल के बाद बाबा माने लेकिन पासपोर्ट पकड़ा वैसे ही जैसे उनका जी चाहा.

फिर रज़ा ने मुझे भी मुझे भी उपकृत करने की ठानी. मैंने पूछा यहाँ बेहतर है कि कराची में, रज़ा बोले " इंसान जहाँ इंसानों की तरह रहे, वहां बेहतर है."

फोटोग्राफर अब इस वाक्य को अपने कैमरे में कैसे कैद करते.

रज़ा की बात में तो दम था लेकिन इसमें से कोई कहानी तो नहीं बनी ना. कर्फ्यू पास लटकाए वे फोटोग्राफर फिर लौट पड़े सरकारी जनसंपर्क दफ्तर की तरफ. और मैं भी लौट आया अपना कर्फ्यू पास लेने.

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