अमरीकी सेंट्रल बैंक की घोषणा और भारत की मुश्किलें?

हाल के दिनों में डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत में बहुत गिरावट देखने को मिली है

दुनिया भर के विकासशील देशों में इस बात पर कौतूहल है कि बुधवार को देर रात अमरीका का फ़ेडरल बैंक अर्थव्यवस्था में जान फूंकने वाले अपने प्रयासों का क्या भविष्य तय करता है.

ज़ाहिर है, भारत भी इस घोषणा को उतनी ही उत्सुकता से देख रहा है जैसे ब्राज़ील या कुछ अन्य यूरोपीय देश.

अमरीका के केंद्रीय बैंक यानी फ़ेडरल रिज़र्व के प्रमुख बेन बर्नानके के देर रात होने वाले भाषण पर अटकलें लग रही हैं.

अटकलें इस बात पर हैं कि क्या अमरीकी सेंट्रल बैंक हर महीने खरीदे जाने वाले 85 अरब डॉलर के बॉन्ड्स में कुछ कमी करेगा?

दरअसल ये खरीद का सिलसिला 2007 के बाद अमरीका में आए वित्तीय संकट के बाद शुरू किया गया था.

इसका मकसद सुस्त पड़ती अर्थव्यवस्था में जान और डॉलर फूंकना था जिससे मंदी के बादलों को हटाया जा सके.

अब जब विश्लेषक इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि अमरीकी अर्थव्यवस्था पटरी पर लौट रही है तब इस 85 अरब डॉलर के प्रोत्साहन-निवेश को घटाए जाने पर बहस जारी है.

भारत पर असर

सवाल उठता है भारत जैसे विकासशील देश पर अमरीकी बाज़ारों में डाले जा रहे पैसों की कमी का क्या असर पड़ सकता है?

आर्थिक मामलों के जानकार परंजोय गुहा ठाकुरता कहते हैं, "कुछ वर्षों से अमरीकी सेंट्रल बैंक की ओर से अपने बाज़ारों में जारी किए गए डॉलर भारत और चीन जैसे देशों के शेयर बाज़ारों में विदेशी संस्थागत निवेश के ज़रिए पहुँचते हैं. जब अमरीका का सेंट्रल बैंक ही अपने देश में मदद-रुपी इस कदम को घटा देगा तो उससे भारतीय शेयर मार्केट में थोड़ी उथल-पुथल तो आ ही सकती है. वजह यही है कि भारतीय शेयर बाज़ार में उछाल या उतार विदेशी संस्थागत निवेश पर निर्भर करता है."

वैसे अमरीका के सेंट्रल बैंक के 'टेपर' कहे जाने वाले इस कदम के बाद से दूसरे कई विकासशील देशों में सिलसिलेवार संस्थागत विदेशी निवेश दर्ज किया गया था.

फ़ेडरल रिज़र्व ने इस कदम को अमरीकी अर्थव्यवस्था में ब्याज दरों, व्यावसायिक निवेश और घरों को खरीदने के लिए दिए जाने वाले क़र्ज़ पर काबू बनाए रखने के लिए उठाया था.

उतार चढ़ाव

2008 में जब विश्वव्यापी मंदी फैल रही थी तब भारत जैसे देश इसीलिए अछूते रह गए थे क्योंकि उनके सेंट्रल बैंकों ने बाज़ार पर अपनी पकड़ बनाए रखी थी.

लेकिन अब जब अमरीकी बैंक सुधारों वाले कई कदम उठा चुका है और भारत की अर्थव्यवस्था में उत्थान नहीं बल्कि ठहराव देखने को मिल रहा है तब बुधवार होने वाली घोषणा से क्या भारतीय अर्थव्यवस्था थोड़ी और डगमगा सकती है?

Image caption अमरीकी फ़ेडरल रिज़र्व के प्रमुख बेन बर्नानके के भाषण पर अटकलें भी हैं.

परंजोय गुहा ठाकुरता इस अंदेशे को खारिज तो करते हैं, पर सतर्क रहने की नसीहत के साथ.

उन्होंने कहा, "भारत के सामने बड़ी चुनौतियाँ है. पहली, अपने चालू खाते में आई कमी को दूर करना क्योंकि भारत जितना निर्यात नहीं कर रहा है उससे कहीं अधिक आयात कर रहा है. दूसरी बात है भारतीय रुपए के मूल्य का संतुलन बनाए रखना क्योंकि अगर रुपया ही कमज़ोर होता गया तो उसका नकारात्मक असर पूरी अर्थव्यवस्था पर दिखेगा.”

बहराल भारतीय शेयर बाज़ारों में पिछले कुछ दिनों से निरंतर होते उतार-चढ़ाव के लिए ये बेहद ज़रूरी है कि अमरीकी सेंट्रल बैंक बाज़ारों में प्रोत्साहन के लिए जारी किए जाने वाले डॉलरों में एकाएक बड़ी कमी की घोषणा न करे.

अगर फ़ेडरल रिज़र्व के प्रमुख बेन बर्नानके इस संभावित कटौती को सिलसिलेवार और धीमी प्रक्रिया से करेंगे तो भारतीय बाज़ारों में इसका विपरीत असर भी कम देखा जाएगा.

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