अपहरण, हत्या के अभियुक्त बिहार साहित्य सम्मेलन के लीडर

  • 24 सितंबर 2013
बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन

भारत के पहले राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के संस्थापकों में से थे.

रामधारी सिंह दिनकर, नागार्जुन और फणीश्वरनाथ रेणु भी इस संस्था से जुड़े रहे लेकिन अब इस संस्था के अध्यक्ष अजय सिंह हैं.

अजय सिंह के आलोचक कहते हैं कि वो इस गौरवशाली परंपरा के वारिस नहीं हैं, उनका साहित्य से कभी जुड़ाव भी नहीं रहा.

अजय सिंह की एकमात्र योग्यता यही कही जा सकती है कि उनकी पत्नी कविता सिंह सत्तारूढ़ जनता दल यूनाइटेड की विधायक हैं.

डांस बार में विधायक गिरफ्तार

दिलचस्प बात ये है कि वो खुद इस बात को मानते हैं.

अजय सिंह कहते हैं, "ये सही है कि मैं साहित्यकार नहीं हूं लेकिन मुझे साहित्य से बहुत प्रेम है. मैं अध्यक्ष की जिम्मेदारियों को पूरा करते हुए साहित्य सम्मेलन का गौरव वापस दिलाने की पूरी कोशिश करूंगा."

'योग्य उम्मीदवार'

खुद को योग्य उम्मीदवार मानने वाले अजय सिंह के ऊपर मोटरसाइकिल लूट से लेकर अपहरण और हत्या तक के लगभग 30 मामले दर्ज हैं.

हालांकि बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के 'प्रधानमंत्री' रामनरेश के अनुसार उनकी जानकारी में अजय सिंह के ख़िलाफ़ कोई आरोप नहीं हैं.

रामनरेश तर्क देते हैं, "संस्था की नियमावली के अनुसार एक योग्य व्यक्ति अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ सकता है और अजय सिंह हर दृष्टि से योग्य हैं. हमने उचित नहीं समझा कि अजय सिंह ने कहां तक पढ़ाई की है लेकिन मुझे वह विद्वान व्यक्ति लगते हैं.''

दो विधायकों की गिरफ्तारी

अजय सिंह इससे पहले चर्चा में तब आए थे जब साल 2011 में वे दरौंदा सीट से टिकट के दावेदार होने के बावजूद चुनाव नहीं लड़ पाए थे क्योंकि हाईकोर्ट ने उन्हें दोषी करार दे दिया था.

ऐसे में आनन-फानन में अजय ने कविता सिंह से शादी की. फिर जनता दल यूनाइटेड ने कविता को उम्मीदवार बनाया और उन्होंने जीत भी दर्ज की थी.

दो-दो अध्यक्ष

बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन इसलिए भी विवादों में है क्योंकि अजय सिंह के अलावा अनिल सुलभ भी इस का अध्यक्ष होने का दावा कर रहे हैं. अनिल सुलभ बिहार राज्य कांग्रेस के बुद्धिजीवी प्रकोष्ठ के अध्यक्ष हैं.

पटना साहित्य सम्मेलन की स्थायी समिति ही अपने अध्यक्ष का चुनाव करती है. अजय सिंह समर्थक स्थायी समिति ने 5 सितंबर को उनको नया अध्यक्ष चुन लिया है.

वहीं दूसरे अध्यक्ष अनिल सुलभ के नेतृत्व वाले स्थायी समिति की चुनाव प्रक्रिया अभी चल रही है जो कि 5 अक्टूबर को पूरी होगी.

क्या पप्पू पास हो पाएगा?

अनिल सुलभ पिछले साल अध्यक्ष 'निर्वाचित' हुए थे. लेकिन अजय सिंह धड़े वाली स्थायी समिति के प्रवक्ता अशोक कुमार श्रीवास्तव बताते हैं, "निर्वाचन प्रक्रिया के दौरान ही अनिल सुलभ ने पुरानी स्थायी समिति के समानांतर एक नई स्थायी समिति का गठन कर लिया और यहीं से विवादों का सिलसिला शुरू हुआ."

इसके बाद धीरे-धीरे विवाद इतना बढ़ा कि दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर कई केस भी दर्ज करा दिए.

इन आरोपों के जवाब में अनिल सुलभ का कहना है, "अध्यक्ष बनने के बाद मैंने रामनरेश सिंह की स्वार्थपूर्ण गतिविधियों पर रोक लगाते हुए संस्थान का गौरव लौटाने की दिशा में गंभीर पहल की है और इससे घबराकर रामनरेश सिंह अजय सिंह को सामने कर बदले की कार्रवाई कर रहे हैं."

'करोड़ों की संपत्ति है वजह'

साहित्य सम्मेलन के विवाद के पीछे एक वजह इस संस्था के पास करोड़ों की अचल संपत्ति होना भी बताया जा रहा है.

स्थायी समिति के एक सदस्य ने पहचान गुप्त रखे जाने की शर्त पर बताया कि सम्मेलन के पास जो एक एकड़ जमीन है आज उसकी बाज़ार कीमत लगभग 30 से 35 करोड़ है और व्यवसायिक रूप से विकसित करने पर इसकी कीमत कई गुना और बढ़ सकती है. उनका मानना है कि कई लोगों की नज़र सम्मेलन के अध्यक्ष पद के बहाने इस संपत्ति पर है.

दागी नेताओं से कानून की आड़ छिनी

लेकिन जिन विवादों की ये संस्था शिकार रही है उनका असर उसकी साहित्यिक गतिविधियों पर पड़ा है. जिस भव्य हॉल में साहित्यक आयोजन होते थे वहां अब साड़ियों और जूतों की सेल लगती है. इसका इस्तेमाल बैंक्वेट हॉल की तरह भी किया जाता है. इस संस्था का समृद्ध पुस्तकालय भी देखभाल के अभाव में बर्बाद हो रहा है.

हिंदी के वरिष्ठ कवि आलोक धन्वा बताते हैं, "साहित्य के विकास के साथ-साथ यह संस्थान साहित्य और राजनीति के सहयोग का भी गवाह रहा है. जब नार्गाजुन साहित्य सम्मेलन में रहा करते थे तब मैं अक्सर उनसे मिलने वहां जाता था. अब भी कभी-कभार वहां जाता हूं तो उसके पुराने गौरव की याद आती है. लेकिन आज यह व्यक्तिगत वर्चस्व का अखाड़ा बन गया है जिससे साहित्य का बिल्कुल भी भला नहीं होगा."

ज़ाहिर है दो नेताओं के बीच वर्चस्व की इस लड़ाई में नुकसान हिंदी समाज का होता दिख रहा है.

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