चांदनी चौक में 'मेड इन चाइना' की बाढ़

दिल्ली के चांदनी चौक में सस्ते सामानों के कई बाज़ार हैं लेकिन इनमें से एक बाज़ार में भीड़ सबसे अधिक होती है. इस बाज़ार में अधिकतर चीन का सामान बिकता है.

एक दुकानदार ने कहा, "सबको पता होता है कि यह चाइना मार्केट है और यहाँ चीनी सामान ही मिलेगा. चीनी सामान सस्ते होता है और इनकी फिनिशिंग भी अच्छी होती है."

तंग गलियों वाले इस बाज़ार में जिधर देखो उधर मेड इन चाइना सामान नज़र आएगा. पंखे, टॉर्च, ताले, इलेक्ट्रिक शेवर, घड़ियाँ, मोबाइल फ़ोन और अन्य कई तरह के सामान हर दुकानों पर मिल जाएँगे.

इस बाज़ार से 20 किलोमीटर दूर तुगलकाबाद में एक विशाल कंटेनर डिपो है जहाँ हर दिन विदेशों से सामान आता है. लेकिन एक देश से किया गया आयात सब पर भारी है और वो है चीन.

क्लीयरिंग एजेंट का काम करने वाले एक अधिकारी ने कहा, "90 प्रतिशत आयात किया सामान यहाँ चीन से आता है. पिछले कुछ सालों से चीन से आयात बढ़ता ही जा रहा है."

पिछले साल चीन और भारत के बीच आपसी व्यापार 66 अरब डॉलर का था. यह तेज़ी से लगातार बढ़ रहा है.

भारत के लिए चिंताजनक बात यह है कि इस व्यापार में चीन का पलड़ा काफी भारी है.

बढ़ता व्यापार असंतुलन

Image caption भारतीय त्यौहारों के बाज़ार पर भी चीन का कब्जा.

पिछले साल चीन ने भारत को लगभग 48 अरब डॉलर का सामान निर्यात किया. जबकि भारत ने चीन को केवल 18 अरब डॉलर का सामान निर्यात किया.

यह असंतुलन हर साल बढ़ रहा है. साल 2001-02 में यह असंतुलन एक अरब डॉलर से थोड़ा अधिक था जबकि इस साल यह 40 गुना बढ़ कर 41 अरब डॉलर तक पहुंच गया है.

यह व्यापारिक असंतुलन भारत के लिए ख़ास चिंता का विषय है. लेकिन सवाल यह है कि इसका मुख्य कारण क्या है?

जेके भल्ला बिजली घर बनाने वाली चीनी कंपनियों के भारतीय एजेंट हैं और इसके इलावा वो चीन से कई तरह का माल भी आयात करते हैं.

सरकारी मदद

भल्ला कहते हैं, "भारतीय कंपनियां चीनी कंपनियों से मुकाबला नहीं कर सकतीं. उनकी मशीनें हमसे बेहतर हैं. उनके कारीगर ट्रेनिंग लेकर काम शुरू करते हैं लेकिन इस से भी बढ़ कर चीनी कंपनियों को सस्ते दर पर बैंक से ब्याज मिलता है और चीनी सरकार इन्हें टैक्स में कई तरह की छूट देती है."

चीन से रजाई बनाने वाली मशीनें आयात करने वाले सुनील कुमार सेठ करते हैं, "देखिये ये मशीनें भारत में भी बनती हैं लेकिन मेरे ग्राहक मेड इन चाइना मशीनें पसंद करते हैं क्योंकि ये सस्ती होती हैं और कई तरह की डिजाइन बना सकती हैं."

'जो भी खरीदो सब मेड इन चाइना'

Image caption यहां कुछ भी मेड इन इंडिया नहीं मिलता.

खुद सुनील कुमार सेठ के घर में जितना भी सजावटी सामान था वो करोलबाग से खरीदा हुआ मेड इन चाइना था. उन्होंने कहा, "मुझे तो पता भी नहीं था कि जो चीज़ें मैंने खरीदी हैं, वो चीन की बनी हैं. घर पर आकर समझ में आता है कि अब जो चीज़ भी खरीदो वो मेड इन चाइना ही होती है."

लेकिन इन सबका भारतीय कंपनियों पर बुरा असर पड़ रहा है. कई छोटी कंपनियां बंद हो चुकी हैं. कई दूसरी बंद होने के कगार पर हैं.

भल्ला कहते हैं, "चीन की आर्थिक प्रगति का दारोमदार उत्पादन पर है. चीन भारत से कच्चा माल खरीदता है और फिर उससे कई चीज़ें बनाकर भारत को ही सप्लाई करता है. इस कारण भारतीय कंपनियां चीन से मुकाबला नहीं कर पा रही हैं. भारतीय कंपनियों को सहारा देने की ज़रूरत है और वो सरकार ही दे सकती है."

पिछले कुछ सालों से भारतीय कंपनियों ने भी अपनी फैक्टरियां चीन में लगाना शुरू कर दिया है ताकि वो दाम और फिनिशिंग में उनसे मुकाबला कर सकें.

लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि जब तक भारतीय कंपनियों को सरकारी मदद नहीं मिलती तब तक वो चीनी कंपनियों से मुकाबला करने के योग्य नहीं होंगी और तब तक भारत और चीन के बीच व्यापार में असंतुलन जारी रहेगा.

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