लोकसभा चुनाव: क्या हैं कांग्रेस के विकल्प?

  • 25 सितंबर 2013
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ये क़रीब-क़रीब साफ होने लगा है कि अगले साल होने वाले आम चुनाव के दो मुख्य मुद्दे होंगे महंगाई और सांप्रदायिकता. ऐसे में सभी राजनीतिक दलों ने अपनी स्थिति का आकलन नए सिरे से करना शुरू कर दिया है.

नई सूरत में पहले के आकलन बेमानी होने का ख़तरा बढ़ गया है और ये ख़तरा मोल लेने को कोई तैयार नहीं, न कांग्रेस और न भारतीय जनता पार्टी.

किसी समझदार राजनीतिक दल की तरह भारतीय जनता पार्टी ने अपना चुनावी आकलन साल 2011 से ही शुरू कर दिया था.

अन्ना हज़ारे के आंदोलन के समय इन अटकलों को काफ़ी बल मिला था कि यूपीए सरकार अब चल नहीं पाएगी और मध्यावधि चुनाव कभी भी हो सकते हैं. टेलीविज़न चैनलों के सर्वेक्षण भी अपनी तस्वीर गढ़ रहे थे और भाजपा उससे उत्साहित थी.

सार्वजनिक लफ्फ़ाज़ी अपनी जगह, लेकिन भाजपा को इस बात का श्रेय देना होगा कि उस 'अति उत्साहित माहौल' में भी उनके पैर ज़मीन पर टिके रहे.

पार्टी के एक बड़े नेता ने एक टेलीविज़न बहस में स्वीकार किया कि एनडीए से अलग भाजपा को अकेले 165 से 170 सीटें मिल सकती हैं. चार महीने बाद अब वह यक़ीनन उस आंकड़े पर दोबारा ग़ौर कर रही होगी.

Image caption भाजपा को उम्मीद है कि यूपीए से लोगों की नाराज़गी से उसे फ़ायदा होगा.

कांग्रेस को भी सार्वजनिक बयानबाज़ी से इतर, अंदाज़ा है कि अगले साल के चुनाव में उसकी स्थिति साल 2009 की तरह नहीं होगी, जब वह अप्रत्याशित रूप से 200 लोकसभा सीटों का आंकड़ा पार कर गई थी.

10 साल की सत्ता विरोधी जनभावना, आम लोगों की नाराज़गी और कुछ अपनी करनी से कांग्रेस की सीटें कम होनी ही हैं.

सीटें बढ़ने की कोई संभावना दिखाई नहीं देती.

कैसे बनेगी सरकार?

सवाल ये है कि यह कमी कितनी सीटों की होगी? और उस स्थिति से कांग्रेस पार्टी और उसका गठबंधन कैसे निपटेगा?

कांग्रेस के लिए इस समय सबसे महत्वपूर्ण संख्याएं 50, 60 और 70 हैं. यानी साल 2009 के मुक़ाबले इतनी सीटें कम. इन संख्याओं में फ़ासला सिर्फ़ 20 सीट का है लेकिन उनके राजनीतिक अर्थ बहुत बड़े हैं.

वे कांग्रेस को दोबारा सत्ता सौंपने से लेकर विपक्ष में बिठाने तक कुछ भी कर सकते हैं. पार्टी इन तीन संख्याओं का अर्थ बहुत अच्छी तरह समझती है और उसकी अंदरूनी बेचैनी की मुख्य वजह भी यही है.

70 लोकसभा सीटें कम हुईं तो कांग्रेस पार्टी 136 सीट के आंकड़े पर पहुंच जाएगी और उसके पास विपक्ष में बैठने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा.

Image caption कांग्रेस को उम्मीद है कि बसपा उत्तर प्रदेश में सपा और भाजपा का खेल बिगाड़ेगी

अब दूसरी स्थिति की कल्पना कीजिए. 60 सीटें कम हुईं तो पार्टी 146 सीटों के साथ सरकार न भी बना सके, लेकिन ऐसी स्थिति में होगी कि उसके बिना कोई सरकार नहीं बन सकेगी.

केंद्र में सीमित स्थायित्व भी उसके बिना संभव नहीं होगा. ज़ाहिर है, वह ग़ैर-भाजपा सरकार ही होगी.

तीसरी संख्या केंद्र और उसमें कांग्रेस पार्टी की भूमिका की तस्वीर बदलकर रख सकती है. साल 2009 के मुक़ाबले 50 सीटों की कमी को कांग्रेस अपने पक्ष में जनमत नहीं कह सकेगी, लेकिन हो सकता है कि 156 सीट वाली पार्टी अगली लोकसभा की सबसे बड़ी पार्टी हो. उस स्थिति में निर्णय कांग्रेस के हाथ में होगा कि सरकार किसकी बनेगी और कैसी बनेगी?

एक और स्थिति की कल्पना से कांग्रेस ख़ुद को रोक नहीं पा रही होगी. वो ये कि काश! भाजपा की सीटें उसके हड़बड़ आकलन से 10 कम हो जाएं और उसकी सीटें 10 बढ़ जाएं. तब स्थितियां पूरी तरह कांग्रेस के पक्ष में होंगी.

यानी भाजपा 160 और कांग्रेस 166 सीटें.

इसके आगे के खेल में कांग्रेस की उस्तादी भाजपा को भी पता है और शायद इसीलिए दोनों प्रमुख राजनीतिक दल तीन सौ से सवा तीन सौ सीटें अपने पास रखने की जुगत लगा रहे हैं.

उत्तर प्रदेश की अहम भूमिका

दोनों दल जानते हैं कि इस आंकड़े के और नीचे खिसकने का अर्थ अपनी ज़मीन और भूमिका खो देना होगा क्योंकि तब यह क्षेत्रीय दलों के लिए 'खुला खेल फ़रुख़ाबादी' हो जाएगा.

इस सारे गणित में उत्तर प्रदेश की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होगी. कांग्रेस के ख़ेमे में एक गणना यह है कि राज्य में मायावती की बहुजन समाज पार्टी लोकसभा सीटों के मामले में समाजवादी पार्टी से काफ़ी आगे निकल जाएगी.

कांग्रेस दूसरे या तीसरे नंबर पर रहेगी और उसकी सीटें साल 2009 की तुलना में कम होकर भी बहुत कम नहीं होंगी.

Image caption अगले लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की अहम भूमिका होगी.

ऐसे में भाजपा, पहले की तरह, चौथे नंबर पर आएगी और उसका खेल वहीं बिगड़ जाएगा.

आख़िरकार उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटें ही देश का भविष्य तय करती हैं, जैसे वे पहले करती रही हैं. उत्तर प्रदेश के अलावा 40 या उससे ज़्यादा लोकसभा सीट वाले राज्यों में भाजपा की स्थिति कमज़ोर है और कांग्रेस इसे अपने पक्ष में मान रही है तो वह अकारण नहीं है.

आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और बिहार से भाजपा को कितनी सीटें मिल सकती हैं, यह उसके कट्टर समर्थक भी जानते हैं.

कुल मिलाकर बात तीस सीटें तराशने की है. आधी सीटें - यानी कि 272 - किसी की कल्पना में नहीं है.

शायद इसीलिए कांग्रेस ने बहुत यथार्थवादी ढंग से उसे एक सौ कम कर दिया है. अब धावक एडवर्ड सिक्वेरा की तरह कोशिश ये है कि उसका आंकड़ा 160 के पार पहुंच जाए.

दौड़ अभी ख़त्म होना तो दूर, शुरू भी नहीं हुई है. इसलिए बेहतर यही होगा कि राजनीतिक दल एडवर्ड सिक्वेरा का 70 का दशक याद रखें.

आख़िरी कुछ सेकेंड और आख़िरी कुछ सीटें तराशना हमेशा मुश्किल रहा है.

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