10 साल बाद फिर दो पाटों के बीच फंसे

कश्मीर, पुंछ, शांति, एलओसी

मोहम्मद दीन की ज़िंदगी की शांति 22 अगस्त को ख़त्म हो गई, हालांकि ये शांति की डोर नाज़ुक ही थी.

मोहम्मद दीन कहते हैं, "मेरी पत्नी नूरजहां भैंसों को पानी पिलाने के लिए घर से बाहर निकली ही थी कि उनके सामने एक गोला गिरा. वो बचने के लिए पलटीं तो दूसरा गोला उनके पीछे गिरा."

उनके शरीर पर कई नुकीले टुकड़े लगे और अब वो चल फिर नहीं सकती. इस हमले के बाद से मोहम्मद दीन के दोनों बच्चों ने स्कूल जाने से इनकार कर दिया है.

मोहम्मद दीन का कहना है, "वो डरे हुए हैं. मुझसे कहते हैं कि मैं घर से बाहर न जाऊँ, उन्हें लगता है कि मैं भी हमले का शिकार हो सकता हूं लेकिन मेरे पास कोई विकल्प नहीं है."

मोहम्मद दीन का परिवार जम्मू के पुंछ ज़िले के कीरनी गांव में रहता है. गांव का कुछ हिस्सा पाकिस्तान में है और दोनों हिस्सों को एक पतला सा नाला बांटता है.

'आसान शिकार'

भारत की ओर वाला कीरनी गांव का हिस्सा उस बाड़ के अंदर है जो भारतीय सेना ने नियंत्रण रेखा पर घुसपैठ रोकने के लिए बनाई थी.

बाहरी लोग कीरनी तक नहीं जा सकते इसलिए मोहम्मद दीन मुझे घाटी के उस पार पहाड़ तक ले जाते हैं और वहां से अपने घर की छत और भारतीय सेना की चौकियां दिखाते हैं.

मोहम्मद दीन कहते हैं कि एलओसी और बाड़ के बीच में फंसे कीरनी गांव के 600 लोग उस पार से होने वाली फ़ायरिंग के आसान शिकार हो सकते हैं.

नवंबर 2003 में युद्धविराम होने से पहले कीरनी गांव अक्सर गोलाबारी का शिकार बनता था, लेकिन इसके बाद एक कमज़ोर युद्धविराम से 740 किलोमीटर की नियंत्रण रेखा के पास रहने वाले लोगों को थोड़ी राहत मिली.

कभी-कभी दोनों पक्ष गोलीबारी करते थे लेकिन इस साल बहुत भारी गोलाबारी हुई है.

भारतीय सेना का कहना है कि जनवरी से सीमापार गोलाबारी की कम से कम 100 घटनाएं हुई हैं और साल 1999 के बाद से इस इलाक़े में दोनों तरफ़ से फ़ायरिंग हुई. भारत और पाकिस्तान में साल 1999 में करगिल में सीमित युद्ध हुआ था.

'लोग डरे हुए हैं'

विवादित सीमा पर लगातार गोलाबारी से लोगों में डर बना हुआ है.

पुंछ में सबसे वरिष्ठ पुलिस अधिकारी शमशेर हुसैन कहते हैं कि पाकिस्तान की ओर से "युद्धविराम उल्लंघन की घटनाएं बढ़ी हैं, कुछ लोग ज़ख्मी हुए हैं, संपत्ति और मवेशियों को नुक़सान पहुंचा है."

कीरनी के सामाजिक कार्यकर्ता शमीम डार इन दिनों पुंछ में रहते हैं, उनका कहना है, "लोगों को डर है कि साल 2003 से पहले के हालात वापस आ सकते हैं."

कश्मीर भारत और पाकिस्तान के बीच 60 साल से ज़्यादा से विवाद का विषय है और करगिल युद्ध के अलावा दो और युद्धों के पीछे की भी वजह यही रही है.

अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि सीमा पर इस ताज़ा समस्या से दोनों देशों के बीच की शांति प्रक्रिया के पटरी से उतरने की आशंका है और भारत में कई लोग चाहते हैं कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ से न मिलें.

चरमपंथियों से खतरा

बीते कुछ हफ़्तों में पाकिस्तान में रहने वाले सैयद सलाहुद्दीन जैसे भारत विरोधी चरमपंथियों ने धमकी दी है कि वे साल 2014 में अफ़ग़ानिस्तान से अमरीकी सेनाओं के हटने के बाद "कश्मीर को लड़ाकों से भर देंगे."

हालांकि श्रीनगर में आईजी अब्दुल ग़नी मीर कहते हैं, "जो आएगा हम लड़ने को तैयार हैं" लेकिन इन धमकियों से भारत में कुछ बेचैनी है.

श्रीनगर के उर्दू अख़बार 'चट्टान' के मुख्य संपादक ताहिर मोहिउद्दीन कहते हैं, "इस साल सुरक्षा बलों पर कुछ बड़े हमले हुए हैं और क़रीब एक दर्जन ग्राम पंचायत सदस्य मारे गए हैं."

भारत प्रशासित कश्मीर में पिछले दो दशक से जारी 'पाकिस्तान समर्थित चरमपंथ' में बीते कुछ सालों में गिरावट आई है.

पिछले एक दशक में भारत और पाकिस्तान ने भरोसा बढ़ाने के लिए वीज़ा नियमों में ढील दी है और लोगों को मिलने और कारोबार करने की इजाज़त दी है.

'हम एक पेड़ के पत्ते'

पुंछ को रिश्तों में सुधार का बड़ा फ़ायदा मिला है - साल 2006 में सीमापार कारोबार और यात्रा को मंज़ूरी मिली थी और पुंछ और पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के रावलाकोट में हर हफ़्ते चलने वाली बस सेवा की शुरुआत हुई.

लेकिन हाल में हुए तनाव के बाद से यहां लोग चिंतित हैं और इसकी वजह भी है. जनवरी में भारत ने जब पाकिस्तान पर दो सैनिकों की हत्या का आरोप लगाया तो इस रास्ते को एक पखवाड़े के लिए बंद कर दिया गया था.

सितंबर की एक सुबह रिश्तेदारों से मिलने रावलाकोट जाने के लिए पुंछ स्टेडियम में परिवार इकट्ठा हो रहे हैं.

कुछ लोग पाकिस्तान से आए रिश्तेदारों को अलविदा कहने आए हैं.

मोहम्मद अयूब 64 साल के हैं, उन्होंने साल 1965 में भारत छोड़ दिया था और अब वो रावलपिंडी में रहते हैं.

अयूब अपनी बहन और परिवार से मिलने के लिए 29 जुलाई को पुंछ आए थे.

मोहम्मद अयूब कहते हैं, "हम एक ही पेड़ के पत्ते हैं."

उनके पास खड़ी उनकी बहन अलीमा बी रोने लगती हैं. वो कहती हैं, "वो काफ़ी वक़्त पहले चले गए थे. मैंने उन्हें कई साल बाद देखा है, क्या पता हम फिर मिल पाएं या नहीं."

मोहम्मद अयूब के भतीजे मोहम्मद नज़ीर इन भावनाओं को ज़्यादा बेहतर ढंग से बताते हैं, "अलविदा कहना अक्सर मुश्किल होता है. हमारे लिए ये और मुश्किल है, क्योंकि कौन जानता है कि कल क्या होगा?"

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