सरकारी अध्यादेश के विरोध में 'सरकार के ही मंत्री'

मिलिंद देवड़ा, मंत्री

केंद्रीय संचार राज्य मंत्री मिलिंद देवड़ा ने एक विवादास्पद बयान में दाग़ी नेताओं को राहत देने वाले सरकार के अध्यादेश की आलोचना की है.

मिलिंद देवड़ा ने ट्विटर पर लिखा कि दोषी पाए गए नेताओं को उनकी सीट बचाने देने से लोगों का लोकतंत्र में भरोसा ख़तरे में पड़ सकता है.

मिलिंद देवड़ा ने ट्विटर पर लिखा, "क़ानूनी पक्ष अलग है लेकिन दोषी सांसदों और विधायकों को अपील के दौरान उनकी सीट पर बने रहने देने से लोकतंत्र में लोगों का पहले से ही कम होता भरोसा और ख़तरे में पड़ेगा."

मिलिंद देवड़ा का ये बयान इसलिए हैरान करता है क्योंकि आम तौर पर मंत्री अपनी ही सरकार के फ़ैसले की आलोचना नहीं करते क्योंकि माना जाता है कि वो लोकतांत्रिक परंपरा के अनुसार कैबिनेट की सामूहिक ज़िम्मेदारी से बंधे होते हैं.

इस साल जुलाई में सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक आदेश में जनप्रतिनिधित्व क़ानून (आरपीए) के उस प्रावधान को रद्द कर दिया था जिसके तहत दोषी सांसदों और विधायकों को तब अयोग्य नहीं क़रार दिया जा सकता, अगर वे किसी ऊंची अदालत में अपील करते हैं.

'अनैतिक, असंवैधानिक अध्यादेश'

Image caption सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का आदेश उलटते हुए अध्यादेश जारी किया है.

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का आदेश उलटते हुए एक अध्यादेश जारी किया है, जिसके तहत अदालत में दोषी पाए जाने के बाद भी सांसदों और विधायकों को अयोग्य क़रार नहीं दिया जा सकेगा.

अगर अध्यादेश को मंज़ूरी मिलती है तो सांसद और विधायक दोषी पाए जाने के बावजूद अपने पद पर बने रहेंगे बशर्ते उनकी अपील कोई उच्च न्यायालय 90 दिनों के अंदर स्वीकार कर ले और दोषी पाए जाने के फ़ैसले पर अदालत रोक लगा दे.

मिलिंद देवड़ा के इस कदम पर संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप का कहना है कि मिलिंद देवड़ा ऐसा कर सकते हैं लेकिन उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था.

सुभाष कश्यप ने बीबीसी से कहा, "मंत्रियों को एक स्वर में बोलना चाहिए, वे कैबिनेट की सामूहिक ज़िम्मेदारी से बंधे होते हैं. हाल के दिनों में ऐसे कई वाकए सामने आए हैं जब मंत्रियों ने सरकार के फ़ैसले की आलोचना की है."

सुभाष कश्यप ने आगे कहा, "प्रधानमंत्री मिलिंद देवड़ा पर कार्रवाई कर सकते हैं लेकिन वो कार्रवाई करेंगे या नहीं ये उन पर निर्भर है. गठबंधन की मजबूरी का हवाला देकर अक्सर कार्रवाई नहीं की जाती."

इस बीच लालकृष्ण आडवाणी की अगुवाई में बीजेपी नेताओं ने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मुलाकात कर इस अध्यादेश पर दस्तख़त न करने की अपील की है.

Image caption बीजेपी नेता सुषमा स्वराज ने अध्यादेश को असंवैधानिक बताया है.

वहीं लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने कहा है कि ये अध्यादेश 'गैरक़ानूनी, अनैतिक और असंवैधानिक' है.

उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी ये मानती है कि दोषी सांसदों और विधायकों पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला बिलकुल सही है.

कांग्रेस में भी इस अध्यादेश का विरोध हो रहा है. पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के बेटे और पूर्व मंत्री अनिल शास्त्री ने कहा है, "दोषी सांसदों और विधायकों पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को बेअसर करने वाला सरकार का अध्यादेश आने वाले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को भारी नुकसान पहुंचाएगा."

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