हमलों के बाद लफ्फाजी करती सरकार

मनमोहन सिंह

भारत एक बार फिर चरमपंथियों के हमले से लहुलूहान है. जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी कट्टरपंथी दहशतगर्दों ने अमेरिका यात्रा में व्यस्त भारतीय प्रधानमंत्री की नवाज़ शरीफ़ के साथ जिस संवाद के बारे में अटकलों का बाजार गर्म था, उसे पटरी से उतारने के लिए और किसी भी रचनात्मक संभावना को ध्वस्त-नष्ट करने के लिए दुस्साहसिक तरीके से वारदात को अंजाम दिया. इससे यह बात एक बार फिर जगजाहिर हो गई है कि यह केंद्र सरकार हिंसक, उग्रवादी चुनौती का सामना करने में बुरी तरह असमर्थ और लाचार है.

हर बार की तरह इस बार भी कोरी लफ्फाजी सुनने को मिल रही है, ''यह एक कायरतापूर्ण हरकत है'', ''यह मानवता के विरुद्ध अपराध है'', ''इस हरकत के अपराधी, अभियुक्त, दोषी किसी भी भी बख्शा नहीं जाएगा'', ''हमारे बहादुर सैनिक किसी भी दुश्मन को मुंहतोड जवाब देने के लिए समर्थ-सक्षम हैं'', ''यह वक़्त सरकार के काम की आलोचना का नहीं वरन एकजुट होकर देश के दुश्मन का मुकाबला करने का है'', किसी ऐसी घटना के वक्त राजनीति नहीं की जानी चाहिए'', वगैरह-वगैरह. यह सुनते सुनते भारतवासियों के कान पक चुके हैं.

सीमा पार से जो तत्व भारत को अस्थिर करने की साजिश में सक्रिय हैं वे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत की मौजूदा सरकार कितनी कमजोर और लाचार है. किसी भी तरह की दहशतगर्दी और चरमपंथ के प्रतिरोध की कोई स्पष्ट या दूरदर्शी सोच उसके पास नहीं है. जैसे-तैसे दिन काटकर अपना कार्यकाल पूरा करने की मानसिकता और दैत्याकार भ्रष्टाचार के आरोपों ने यूपीए को पंगु बना दिया है.

असफल अर्थशास्त्री

भयंकर आर्थिक संकट का समाधान करने में बुरी तरह असफल अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह की लगातार असफलता ने उनकी विश्वसनीयता को पूरी तरह ख़त्म कर दिया है. यह बात किसी से छिपी नहीं है कि अल्पमत वाला यह साझा संगठन अवसरवादी समर्थकों की बैसाखियों पर लड़खड़ाता खड़ा है.

अगले कुछ महीनों में होने वाले चुनावों में 'जीत' सुनिश्चित कराने वाली रणनीति के दवाब में वोट बैंकों के तुष्टीकरण को दी जाने वाली प्राथमिकता ने विदेश नीति, राजनय और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुडे संवेदनशील मुद्दों का बहुत बड़ा नुक़सान पहुंचाया है.

दुर्भाग्य यह है कि अपनी ख़ुदगर्ज लापरवाही और कमजोरी पर लीपापोती के प्रयास में सरकार इस दलील का इस्तेमाल कवच के रूप में करती है कि ‘यह ऐसे गोपनीय मुद्दे हैं जिन पर सार्वजनिक बहस नहीं हो सकती. जनता बेफिक्र रहे, हम कारगर कदम उठा रहे हैं!’

प्रधानमंत्री का एक और हठ है कि पाकिस्तान के साथ संवाद का कोई विकल्प नहीं, इसे हर कीमत पर जारी रखना चाहिए. उनके सहयोगी मंत्री भी इसी वजह से तोता की तरह रटते रहते हैं कि ‘इस सद्भावना और परस्पर भरोसा बढ़ाने वाले अभियान को नुक़सान पहुंचाने के लिए ही दहशतगर्द फसादी खूनखराबे की नाटकीय घटना को अंजाम देते हैं. इसलिए हमें उनके मंसूबों पर पानी फेरने के लिए इन्हें तूल न देकर अपने पथ पर निर्विकार चलना चाहिए'' आदि.

बेलगाम घोड़े

भारत के रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री और गृह मंत्री के हाल के बयानों को सुन ऐसा जान पड़ता है कि इन तीन महानुभावों की हालत उन बेलगाम घोडों जैसी है जो रण क्षेत्र की गंभीरता से अनभिज्ञ अपने रथ को तीन विपरीत दिशाओं में खींचने की नुमाइश करने में व्यस्त हैं.

कभी सामरिक चुनौती का सामना करने की जिम्मेदारी दूसरे मंत्रालय की बताई जाती है तो कभी यह आश्वासन दिया जाता है कि ‘सब कुछ चुस्त दुरुस्त है, दुश्मन खस्ताहाल है और इस तरह के हमले उसकी हताशा-निराशा का ही प्रमाण हैं.’

कड़वा सच इससे बहुत अलग है. इस बात का कोई लक्षण देखने को नहीं मिल रहा है कि भारत के खिलाफ़ जिस परोक्ष प्रायोजित युद्ध का संचालन बरसों से पाकिस्तान की ज़मीन से हो रहा है उसमें कोई मंदी आई है या कि उग्रवादियों का खेमा कमजोर और हताश है.

सरकार का यह कहना तर्कसंगत या विश्वसनीय नहीं लगता कि ‘आतंकवाद का कोई धर्म या रंग नहीं होता, न ही कोई जाति. यह मात्र एक जघन्य अपराध है जिसके प्रतिरोध के लिए पूरे मानव समाज को एकसाथ संघर्ष करना है!’

विफल सरकार

इस तरह की नारेबाजी बहुत थोडे समय की मोहलत या राहत सुलभ करा सकती है. लेकिन यह मौका यह सरकार बहुत पहले गवां चुकी है.

अलगाववादी उग्रवाद, असहिष्णु मजहबी कट्टरपंथी हो या अतिवादी वामपंथी हिंसा, इनके कारणों का समाजशास्त्रीय विश्लेषण करने का काम सरकार का नहीं, न ही उसके किसी सदस्य में इसकी योग्यता है. निरीह नागरिकों के प्राणों की रक्षा का उत्तरदायित्व उसका है. इतनी ही प्राथमिक जिम्मेदारी देश की एकता और अखंडता की रक्षा की है.

समस्या का समाधान ढूंढ़ने में बुरी तरह विफल यूपीए सरकार व्यापक सरलीकरणों को ही यथेष्ठ समझती रही है, ‘अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संकट की तरह यह भी एक विश्वव्यापी समस्या है, कौन देश इससे मुक्त है आज?’ आदि.

करिश्माई चमत्कारी युवा मार्गदर्शक मसीहा की मरीचिका में फंसे लोग भला कैसे वास्तविक नेतृत्व का अभाव महसूस कर सकते हैं? अपनी लाचारी-कमजोरी-पस्ती को अनदेखा करने का आग्रह कर इस सरकार के महारथी दस साल पहले तब सत्तारूढ़ एनडीए की ‘भूलों’ की याद दिलाने वाले महायुद्ध की व्यूह रचना में अपना पराक्रम दिखाने में व्यस्त हैं.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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