मतदाताओं को मिला 'राइट टू रिजेक्ट'

भारत की सुप्रीम कोर्ट
Image caption अदालत ने यह फ़ैसला ग़ैर सरकारी संगठन पीयूसीएल की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाते हुए मतदाताओं को 'राइट टू रिजेक्ट' यानी सभी उम्मीदवारों को ख़ारिज करने का अधिकार दे दिया.

भारत की शीर्षस्थ अदालत ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि वह इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) में एक ऐसा बटन लगाए जिसके जरिए मतदाता सभी उम्मीदवारों को खारिज कर सके. यानी मशीन में 'इनमें से कोई नहीं' का विकल्प होना चाहिए.

अदालत ने कहा है कि यह व्यवस्था इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव से ही शुरू की जाए.

सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले पर राजनीतिक दलों ने मिली-जुली प्रतिक्रिया व्यक्त की है. जहाँ आम आदमी पार्टी ने इस फैसले का स्वागत किया है, वहीं भारतीय जनता पार्टी ने चुनाव सुधारों को समय की जरूरत बताते हुए सरकार से तत्काल क़दम उठाने की मांग की है.

मतदातओं के विकल्प

फ़ैसला सुनाते हुए अदालत ने कहा कि मतदाताओं को यह विकल्प देना लोकतंत्र और देश चलाने के लिए बेहतर लोगों का चुनाव करने के लिए जरूरी था.

अदालत ने यह फ़ैसला पीपुल्स यूनियन फ़ॉर सिविल लिबर्टी (पीयूसीएल) की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया. पीयूसीएल ने यह याचिका 2004 में दायर की थी. संगठन ने मतदाताओं के लिए निगेटिव वोटिंग की मांग की थी.

फ़ैसला सुनाते हुए उन्होंने कहा कि एक जीवंत लोकतंत्र में मतदाताओं को 'इनमें से कोई नहीं' का विकल्प चुनने का अधिकार जरूर दिया जाना चाहिए.

इस फ़ैसले का लाभ इस साल दिसंबर में दिल्ली, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मिजोरम में होने वाले विधानसभा चुनाव में मतदाताओं को मिलेगा.

चुनाव में अब तक उम्मीदवारों को नकारने वाले वोटों को गिनने की कोई व्यवस्था नहीं है. इससे इसका चुनाव परिणाम पर असर भी नहीं पड़ता. सामाजिक कार्यकर्ताओं की मांग थी कि अगर किसी निर्वाचन क्षेत्र में हुए मतदान में पचास फ़ीसद से अधिक मतदाता 'राइट टू रिजेक्ट' का इस्तेमाल करते हैं तो, वहाँ दुबारा मतदान कराया जाना चाहिए.

चुनाव का मतलब

Image caption नकवी का कहना है कि चुनाव सुधार समय की जरूरत है.

पीयूसीएल ने अपनी याचिका में मतदाताओं को सभी उम्मीदवारों को खारिज करने का अधिकार देने की मांग की थी. चुनाव आयोग ने भी इस मांग का समर्थन किया था. लेकिन केंद्र सरकारइसके पक्ष में नहीं थी. उसका कहना था कि चुनाव का मतलब चुनाव करना होता है, खारिज करना नहीं.

सभी उम्मीदवारों को नकारने की वर्तमान व्यवस्था में मतदाता मतदान केंद्र पर जाकर पीठासीन अधिकारी से 49 ओ नाम के एक फ़ार्म की मांग करता है और उसे भर कर वापस कर देता है. लेकिन इस तरह के फार्म की गणना नहीं होती है.

इस फ़ैसले के बाद भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने एक टीवी चैनल से कहा कि चुनाव सुधार समय की जरूरत है. इसलिए सरकार की ओर इसकी ओर तत्काल ध्यान देना चाहिए.

'राइट टू रिजेक्ट' और ' राइट टू रिकॉल' यानी कि जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने की मांग को लेकर अभियान चलाने वाले और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले का स्वागत किया. इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि इससे लोगों को बहुत अधिक उम्मीद नहीं करनी चाहिए.

उन्होंने कहा कि यह सही मायने में तभी सार्थक होगा जब इसके आधार पर चुनाव परिणाम तय हो.

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