लालू पर फ़ैसला, सियासी नफ़े-नुकसान का हिसाब

  • 30 सितंबर 2013
लालू प्रसाद यादव की आरजेडी पार्टी

पिछले शुक्रवार को दिल्ली के प्रेस क्लब में राहुल गांधी की हैरतभरी घोषणा ने केवल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लिए ही असमंजस पैदा नहीं किया, बल्कि उत्तर भारत के महत्वपूर्ण प्रदेश बिहार की राजनीति में उलटफेर के हालात भी पैदा कर दिए हैं.

पिछले एक साल से आरजेडी नेता लालू यादव ने जगह-जगह रैलियाँ करके प्रदेश की राजनीति में न सिर्फ अपनी वापसी के हालात पैदा कर लिए हैं, बल्कि एनडीए से टूटे जेडीयू का राजनीतिक गणित भी बिगाड़ दिया है.

मई में पटना की परिवर्तन रैली और जून में महाराजगंज के लोकसभा चुनाव में प्रभुनाथ सिंह को विजय दिलाकर लालू ने नीतीश कुमार के लिए परेशानी पैदा कर दी थी.

उस वक़्त लालू प्रसाद ने कहा था कि अगले लोकसभा चुनाव में बिहार की सभी 40 सीटों पर आरजेडी की जीत का रास्ता तैयार हो गया है. वह अतिरेक ज़रूर था, पर ग़ैर-वाजिब नहीं. फिलहाल व्यक्तिगत रूप से लालू और संगठन के रूप में उनकी पार्टी की परीक्षा है.

अध्यादेश का क्या होगा?

दाग़ी जनप्रतिनिधियों की सदस्यता बचाने वाला अध्यादेश अधर में है और अब लगता नहीं कि सरकार इस पर राष्ट्रपति के दस्तख़त कराने पर ज़ोर देगी. अगले हफ़्ते इसके पक्ष में फैसला हुआ भी, तो शायद लालू यादव के लिए देर हो चुकी होगी.

Image caption लालू यादव राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी रहे हैं.

अगले हफ़्ते कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य रशीद मसूद से जुड़े मामले में भी सज़ा सुनाई जाएगी. बहरहाल उनके मामले का राजनीतिक निहितार्थ उतना गहरा नहीं है, जितना लालू यादव के मामले का है.

राहुल गांधी के अध्यादेश को फाड़कर फेंक देने का जितना मुखर स्वागत नीतीश कुमार ने किया है, वह ध्यान खींचता है. क्या नीतीश कुमार को इसका कोई दूरगामी परिणाम नज़र आ रहा है?

लालू यादव राजनीतिक विस्मृति में गर्त में गए तो तीन-चार महत्वपूर्ण सवाल सामने आएंगे. बिहार में आरजेडी एक महत्वपूर्ण ताक़त है. 2010 के विधानसभा के चुनाव में जेडीयू ने 115 सीटों पर जीत हासिल की थी.

आरजेडी को केवल 22 सीटें मिलीं थीं पर वोट के लिहाज से जेडीयू को 22.61 फ़ीसदी वोट मिले थे और आरजेडी को 18.46 फ़ीसदी. लालू के नेतृत्व में आरजेडी एक बड़ी ताक़त है और आज जब एनडीए का वजूद प्रदेश में ख़त्म हो चुका है, वह प्रदेश की सबसे ताक़तवर पार्टी है.

जेडीयू के साथ अब भाजपा नहीं है. नीतीश कुमार का अब एंटी इनकम्बैंसी से सामना है. लालू यादव के लिए बेहतर ज़मीन तैयार हो रही थी. लोकसभा चुनाव में यदि वे अच्छी सीटें निकालते, तो दिल्ली में बारगेन की स्थिति में रहेंगे.

लालू की पेशबंदी

लालू की व्यक्तिगत क्षति क्या पार्टी की क्षति भी साबित होगी? क्या लालू की पार्टी बिखर जाएगी? क्या वे बाला साहब ठाकरे या जयललिता की तरह बाहर रहकर भी पार्टी की डोर हाथ में रख सकने में कामयाब होंगे? क्या वे 2014 में मोलभाव की स्थिति में होंगे? बिहार में क्या कांग्रेस बजाय लालू के नीतीश कुमार के साथ जाएगी?

Image caption सवाल उठ रहे हैं कि नए राजनीतिक हालात में लालू किसके साथ जाएंगे.

क्या केंद्र और राज्य की एंटी इनकम्बैंसी का यह संगम घातक नहीं होगा? क्या लालू का पराभव नीतीश को जीवदान देगा? एक रोचक सवाल और है क्या लालू भाजपा के साथ जाएंगे? राजनीति में सारी संभावनाओं के दरवाज़े खुले रहते हैं. असंभव कुछ भी नहीं.

मई के महीने में लालू यादव एक दुर्घटना में घायल हो गए थे, तो गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें फ़ोन करके हालचाल पूछा था. यह एक सामान्य घटना थी, लेकिन राजनीतिक अटकलबाजों ने इसके पीछे के मंसूबे खोजने की कोशिश तब भी की थी. संयोग से लालू और मोदी दोनों का नीतीश कुमार से बैर है.

फैसला क्या होगा?

सारी अटकलें इस पर निर्भर करती हैं कि चारा घोटाले के सबसे बड़े मामले आरसी 20 ए/96 पर रांची में सीबीआई की विशेष अदालत आज क्या फ़ैसला सुनाएगी. विशेष न्यायाधीश पीके सिंह यह फ़ैसला सुनाएंगे. मामले में लालू प्रसाद, जगन्नाथ मिश्र सहित कुल 45 अभियुक्त हैं. फैसले के समय लालू प्रसाद सहित अन्य लोग अदालत में मौजूद रहेंगे.

चारा घोटाले के 53 में से 44 मामलों में पिछली मई तक ट्रायल पूरा हो चुका है और 500 से ज़्यादा अभियुक्तों को सजाएं हो चुकी हैं. अंदेशा है कि लालू यादव को सजा हो सकती है. संभव है कि अदालत सिर्फ फ़ैसला सुनाए और सजाएं सुनाने का कोई और दिन तय करे, पर अब यह मामला ज्यादा लंबा खिंचेगा नहीं.

राजनीतिक नज़रिए से लालू प्रसाद के लिए यह समय बेहतर था. बिहार में मिड-डे मील और बोधगया धमाकों के बाद से लगातार घट रही घटनाओं और नीतीश कुमार की बढ़ती अलोकप्रियता ने लालू के लिए प्राणवायु का काम किया है, लेकिन 13 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले ने उन्हें परेशानी में डाल दिया.

इस मामले की सुनवाई के आख़िरी दौर में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से अपील की थी कि सीबीआई के विशेष न्यायाधीश को हटाया जाए क्योंकि वे बिहार के शिक्षा मंत्री पीके शाही के रिश्तेदार हैं. उनका फ़ैसला पूर्वाग्रह से भरा हो सकता है. उनकी अर्ज़ी नामंज़ूर हो गई.

डर जेल का नहीं पार्टी का

Image caption भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण लालू को 1997 में बिहार के मुख्यमंत्री का पद छोड़ना पड़ा था.

लालू या उनके करीबियों को जेल जाने का डर नहीं है. वे पहले भी कई बार जेल जा चुके हैं, पर इस बार यदि सज़ा दो साल या उससे ज़्यादा की होगी, तो उनकी संसद सदस्यता फ़ौरन ख़त्म हो जाएगी. यदि उन्हें इस अवधि के लिए जेल में रहना पड़ा, तो उसके छह साल बाद तक वे चुनाव नहीं लड़ पाएंगे.

इसका मतलब वे स्वयं चुनाव की राजनीति से बाहर हो जाएंगे और बिहार के मुख्यमंत्री और देश के मंत्री का पद ग्रहण नहीं कर पाएंगे. फिर भी वे राजनीति से बाहर नहीं होंगे. सीबीआई अदालत के फैसले को वे अगली अदालत में चुनौती दे सकेंगे.

भले ही उनकी सदस्यता छिन जाएगी, पर वे अपनी पार्टी के संरक्षक के रूप में बने रहेंगे. अलबत्ता वे अब यह कह सकेंगे कि देश में कितने बड़े-बड़े घोटाले हो रहे हैं. उनमें दोषियों का कुछ नहीं हो रहा, लेकिन लालू को फँसाया गया है.

टेस्ट केस बनेंगे लालू

भारतीय राजनीति में जेल जाना या भ्रष्टाचार के आरोपों में फँसना कलंकित कर सकता है या नहीं इस बारे में लालू यादव का मामला टेस्ट केस बनेगा. सत्तर के दशक तक भारतीय राजनीति एक हद तक पवित्रतावादी थी. किसी अपराधी के साथ ग्रुप में राजनेता की तस्वीर छप जाती थी, तो हड़कंप मच जाता था. अस्सी के दशक के बाद जातीय, धार्मिक और क्षेत्रीय पहचान की राजनीति के उभार ने आपराधिक कलंक को पीछे कर दिया.

Image caption लालू यादव की सहयोगी रही कांग्रेस अब नीतीश कुमार की तरफ बढ़ती दिख रही है.

दाग़ी सांसदों की सदस्यता खत्म करने वाले सुप्रीम कोर्ट के 10 जुलाई के फ़ैसले को बदलने वाला विधेयक राजनीतिक गणित को समझने की चूक के कारण पास होने से रह गया. अगस्त के पहले हफ़्ते में जब सत्र शुरू हो रहा था, तब राजनीतिक दलों के बीच इस बात पर मोटी सहमति थी कि इसका परिष्कार कर दिया जाएगा.

ऐसा नहीं हुआ तो केंद्र सरकार ने अध्यादेश लाने का फैसला किया. मगर पिछले हफ़्ते के घटनाक्रम ने अचानक इसे दूसरा मोड़ दे दिया है. राहुल गांधी के प्रवेश के पहले तक लगता था कि अध्यादेश की कहानी मीडिया के पिछले बुलेटिन की तरह भुला दी जाएगी.

यह भी सच है कि लालू यादव अपने समर्थकों के बीच वह जगह नहीं बना पाए हैं, जैसी बाल ठाकरे ने बनाई. बाल ठाकरे भी चुनाव लड़ने से वंचित कर दिए गए थे, पर उनकी राजनीति ने उन्हें ताक़तवर बनाए रखा और वे इतने ताक़तवर साबित हुए कि उनके निधन के बाद उन्हें राजकीय सम्मान दिया गया.

लालू प्रसाद को अब अपने उत्तराधिकारी के रूप में किसी को तैयार करना होगा. लालू की ही नहीं समूची राजनीति की समझ है कि उत्तराधिकारी आज के भारतीय परिदृश्य में परिवार से आता है.

खड़ाऊँ की परम्परा

Image caption लालू ने अपने बेटे तेजस्वी को राजनीति के मैदान में उतारा है.

भारतीय राजनीति में खड़ाऊँ को गद्दी पर बैठाने की परंपरा है. लालू यादव ने 1997 में राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाकर इसमें एक नया अध्याय जोड़ा था. सन 2006 से 2008 तक बगैर राजनीतिक शक्ति के मधु कोड़ा झारखंड के मुख्यमंत्री रहे. ताक़त कहीं और थी.

उसके पहले सन 2001 में तमिलनाडु में जयललिता ने कुछ समय के लिए ओ पन्नीरसेल्वम को मुख्यमंत्री की गद्दी पर बैठाकर यह साबित किया था कि आपराधिक आरोपों के कारण व्यक्तिगत राजनीति ख़त्म नहीं होती.

बहरहाल लालू यादव ने मई की परिवर्तन रैली में अपने दो बेटों को राजनीति में उतारकर पेशबंदी शुरू कर दी थी पर क्या तेजप्रताप और तेजस्वी को पार्टी के वरिष्ठ नेता स्वीकार करेंगे? उनकी बेटी मीसा भारती भी आगामी लोकसभा चुनाव में उतरने वाली हैं.

रामकृपाल यादव, जयप्रकाश यादव जैसे लालू के क़रीबी स्वीकार कर लें, पर क्या रघुवंश प्रसाद सिंह, जगतानंद सिंह और नए सांसद प्रभुनाथ सिंह इसे मान लेंगे? अस्तित्व रक्षा के लिए शायद मान लें. जैसे मनमोहन सिंह राहुल गांधी के नेतृत्व में काम करने को राजी हैं.

उत्तराधिकार का संकट

व्यक्तिगत आधार पर खड़े राजनीतिक दलों के सामने यह यह संकट है. लगभग यही कहानी उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह के परिवार की है.

पिछले साल विधानसभा चुनाव जीतने के बाद मुलायम सिंह ने अखिलेश यादव को गद्दी दिखा दी. मायावती की बसपा में यह भी संभव नहीं है.

बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के साथ भी लगभग यही बात है. पंजाब में अकाली दल और महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ भी ऐसा ही हुआ.

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