अधिकारी, जिसने राष्ट्रपति की सुविधाओं पर सवाल उठाए

  • 1 अक्तूबर 2013
Image caption बीबीसी हिंदी को इंटरव्यू देते हुए एमके कॉव.

दिल्ली के कोटला मुबारकपुर में एक चपरासी के क्वार्टर से अपनी ज़िंदगी की शुरुआत कर राज भवन के बगल वाले मुख्य सचिव के शाही बंगले का सफ़र जितनी सहजता से महाराज कृष्ण कॉव ने तय किया है उतना शायद किसी भी आईएएस अफ़सर ने नहीं किया.

सुनने में ये बात अजीब सी लग सकती है लेकिन कॉव ने अपनी सारी पढ़ाई लगभग स्ट्रीट लाइट में की थी. पढ़ाई के अंतिम पड़ाव में ज़रूर उनका साथ केरोसीन की चिमनी ने दिया.

कॉव महज़ 18 साल की उम्र में ही एमए एलएलबी हो गए थे.

आईएएस की परीक्षा में बैठने के लिए 21 साल का होना ज़रूरी था. उन्होंने बाक़ी का समय श्रम मंत्रालय में शोध जांचकर्ता के पद पर काम करते हुए बिताया.

(संजय गांधी के ख़िलाफ़ गवाही देने का साहस)

हिमाचल कैडर से शुरुआत

साल 1971 में जब हिमाचल प्रदेश बना तो एमके कॉव को वहाँ पोस्टिंग मिली और वहाँ पहुंचते ही इनका वास्ता राज्य के मुख्यमंत्री यशवंत सिंह परमार से हुआ. कॉव बताते हैं कि परमार बहुत ही प्रभावशाली शख़्सियत के मालिक थे. उनकी नीली सी आँखे थीं जैसे कि सांप की हुआ करती हैं.

परमार शिमला के बस स्टैंड के पास एक प्लॉट का मुआएना कर रहे थे जहाँ पंचायत विभाग का मुख्यालय बनाया जाना था. कॉव ने आव देखा न ताव. फ़ौरन बोले, "क्या आप समझते हैं कि भवन के लिए यही सबसे उपयुक्त जगह है." कॉव का यह कहना था कि वहाँ मौजूद वरिष्ठ अधिकारियों के बीच सन्नाटा छा गया.

Image caption बंद गले के सफेद सूट में हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री यशवंत सिंह परमार तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ दिख रहे हैं.

लेकिन परमार को शायद युवा अफ़सर का जोश पसंद आया. लिहाज़ा उन्होंने नरमी दिखाते हुए टिप्पणी की, "जनाब ये हम तय करेंगे या आप ?"

परमार के बाद हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री बने राम लाल विशुद्ध राजनीतिक इंसान थे. हर पल सत्ता की लड़ाई में ऊँची से ऊंची सीढ़ी तक पहुंचना उनके जीवन का मुख्य ध्येय था. राज्य के स्वास्थ्य मंत्री के तौर पर काम करते हुए उन्होंने परिवार नियोजन पर ख़ासा ध्यान दिया. इसलिए वो संजय गाँधी की निगाहों में चढ़ गए.

एक बार राज्य के बिजली आपूर्ति मामलों के मंत्री राम लाल ने बिना वित्त मंत्रालय से बात किए हरियाणा के साथ जल समझौता कर लिया. समझौते पर दस्तख़त करने के बाद उन्होंने कॉव के पास अनुमोदन के लिए फ़ाइल भेजी.

(अकेले दम पर चुनाव सुधार का करिश्मा)

कभी नोटिंग नहीं बदली

कॉव ने फ़ाइल पर नोट लिखा कि समझौता हिमाचल प्रदेश के पक्ष में नहीं है क्योंकि उसमें पानी देने के एवज़ में मिलने वाली बिजली को प्रति यूनिट के हिसाब से नहीं आंका जा रहा था.

मुख्यमंत्री परमार ने कॉव की सलाह पर उस समझौते को ख़ारिज कर दिया. इस बीच रामलाल मुख्यमंत्री बन गए. राम लाल ने उन्हें बुलाया और कहा कि आप फ़ाइल पर अपनी नोटिंग को बदल दीजिए. कॉव का जवाब था, "मैंने ज़िंदगी में अपनी नोटिंग नहीं बदली और अब मैं उसकी शुरुआत नहीं करने जा रहा."

1982 में जब कॉव दिल्ली की प्रतिनियुक्ति के बाद वापस हिमाचल प्रदेश लौटे तो इन्हीं राम लाल ने उन्हें अपना प्रधान सचिव बनाया. एक समय स्थिति ये हो गई कि जब तक कॉव उनसे किसी कागज़ पर हस्ताक्षर के लिए नहीं कहते थे, राम लाल उस पर दस्तख़त ही नहीं करते थे. पूरे हिमाचल में ये ख़बर फैल गई कि कॉव ही सरकार चला रहे हैं.

90 के दशक में कॉव दिल्ली में उड्डयन सचिव बन कर आए. प्रधान मंत्री इंदर कुमार गुजराल ने उन्हें बुला कर कहा कि उन्हें मंत्रालय में कोई स्कैंडल नहीं चाहिए. चांदमहल इब्राहिम उनके मंत्री थे. वो एक एक महीने तक दुबई में जा कर बैठे रहते थे और अपने साथ एक संयुक्त सचिव को भी ले जाते थे.

टाटा को इनकार

Image caption तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ एमके कॉव.

मंत्री पर तो कॉव का कोई बस नहीं चलता था क्योंकि उनकी यात्रा की अनुमति प्रधानमंत्री दिया करते थे लेकिन संयुक्त सचिव को इन बिना मक़सद की यात्राओं के लिए छोड़ने से कॉव ने साफ़ इनकार कर दिया था.

उनके इसी कार्यकाल के दौरान टाटा ने आवेदन दिया कि उन्हें सिंगापुर एयरलाइंस के साथ एक नई एयरलाइंस शुरू करने की इजाज़त दी जाए. इब्राहिम ने जेट एयरलाइंस को चालीस फ़ीसदी तक सीधे विदेशी निवेश की अनुमति देने के बाद बाक़ी सारे विदेशी निवेशों पर रोक लगा दी.

एक तरह से जेट एयरवेज़ सारे खेल की अकेली लाभार्थी बन गई. हाल ही में नागरिक उड्डयन क्षेत्र में विदेशी निवेश की अनुमति दी गई है लेकिन अगर उस समय के नागरिक उड्डयन मंत्री ने टाटा का प्रस्ताव मान लिया होता तो भारतीय उड्डयन की पूरी तस्वीर ही बदल गई होती.

इसी तरह का एक दिलचस्प क़िस्सा पूर्व राष्ट्रपति केआर नारायणन के साथ हुआ. जब राष्ट्रपति विदेश यात्रा में जाते हैं तो उनके लिए एयर इंडिया एक विमान की व्यवस्था तो करती ही है, एक विमान उनके लिए रिज़र्व भी रखा जाता है. उस रिज़र्व विमान के लिए एक कमांडर और एक सह पायलट भी रिज़र्व रखा जाता है.

राष्ट्रपति पर सवाल

नारायणन चाहते थे कि उनके लिए दो कमांडर रिज़र्व रखें जाएं. जब फ़ाइल एमके कॉव के पास आई तो उन्होंने इसका विरोध किया. एक दिन नारायणन ने उन्हें और कैबिनेट सचिव को राष्ट्रपति भवन बुला भेजा. दोनों ने पूरी ताक़त से नारायणन की मांग का विरोध किया और अपनी बात पर डटे रहे.

(सरकारों के आने जाने का असर नहीं पड़ा)

बाद में नारायणन ने प्रधानमंत्री पर ज़ोर डाल कर अपनी बात मनवा ली. कॉव ने प्रधानमंत्री को नोट भेजा कि एक विमान और उस पर कमांडर और पायलट को रिज़र्व रखने की वजह से राष्ट्रपति की हर विदेश यात्रा के दौरान सरकार के 19 करोड़ रुपए अतिरिक्त ख़र्च होंगे लेकिन उनके इस विरोध को नज़रअंदाज़ कर दिया गया.

Image caption राष्ट्रपति के आर नरायणन के समय में कॉव ने राष्ट्रपतियों को विदेश दौरे पर दी जाने वाली सुविधा पर सवाल उठाए थे.

रिटायरमेंट के बाद भी एमके कॉव की सक्रियता कम नहीं हुई. वे प्रशासनिक मुद्दों पर नियमित स्तंभ लेखन करते हैं, सेमिनारों में हिस्सा लेते हैं और व्याख्यान देते हैं. इतना ही नहीं वे कई तरह के सामाजिक विकास के कार्यक्रमों से भी जुड़े हुए हैं.

इन सबके अलावा कॉव शायद उन गिने चुने अफ़सरों में होंगे जो अपने काम के साथ-साथ कविताएं भी लिख सकते हैं. उनकी कविताओं की एक पुस्तक भी प्रकाशित हो चुकी है 'चढ़ते पानी से बेख़बर'. उसी पुस्तक की उनकी पसंदीदा कविता है हुक्मरान-

आज शायद

आ रहे हैं हुक्मराँ,

सड़क शक बन गई है

अब

बस आने को हैं हुक्मराँ,

सड़क हो गई है सूनी

लो

आ गए हैं हुक्मराँ,

सड़क थरथरा रही है

अभी

चले गए हैं हुक्मराँ,

सड़क हो चली है ज़िंदा.

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