राहुल गाँधी: सत्ता के केंद्र में बग़ावत की राजनीति

राहुल गाँधी

अँग्रेज़ी की कहावत है -- कबूतरों के बीच बिल्ली छोड़ देना. अब इस तस्वीर को आँखों के सामने लाइए कि कबूतरों का झुंड निश्चिंत भाव से दाना चुग रहा है कि अचानक उनके बीच कोई खूँखार बिल्ली छोड़ दी जाए.

पिछले शुक्रवार को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने दिल्ली के प्रेस क्लब में कुछ ऐसा ही किया. अपनी बांहें समेटते हुए उन्होंने कांग्रेस के ही नहीं बल्कि तमाम राजनीतिक पार्टियों के समूचे नेतृत्व की निश्चिंतता को भंग कर दिया.

कांग्ररेस प्रवक्ता अजय माकन की प्रेस कॉन्फ़्रेंस में अचानक प्रकट होकर राहुल गांधी ने सज़ायाफ़्ता सांसदों और विधायकों की सीटें बचाने के लिए सरकार की ओर से लाए जा रहे अध्यादेश को "पूरी तरह बेतुका" बताते हुए कहा कि इसे "फाड़कर फेंक दिया जाना चाहिए." उन्होंने ये भी कहा कि "मेरी निजी राय है कि जो कुछ मेरी सरकार कर रही है वो ग़लत है."

राहुल गाँधी ने सीधे सीधे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, उनके मंत्रिमंडल, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और कांग्रेस के पूरे सामूहिक नेतृत्व को एक झटके में कठघरे में खड़ा कर दिया.

आप जानते ही हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि अगर किसी सांसद या विधायक को कोई अदालत आपराधिक मामले में दो साल से ज़्यादा की सज़ा सुनाती है तो वो तुरंत विधानसभा या संसद की सदस्यता खो देंगे.

लगभग सभी राजनीतिक पार्टियाँ सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को संसद के ज़रिए पलट देना चाहती हैं क्योंकि इससे सभी का हित सधता है.

राहुल गांधी के बयान के अगले दिन से ही अख़बारों के कॉलम रंगे जाने लगे कि किस तरह उन्होंने मनमोहन सिंह की विदेश यात्रा के दौरान ऐसा कड़ा बयान देकर प्रधानमंत्री पद की गरिमा को ख़त्म किया है.

प्रधानमंत्री के पूर्व सलाहकारों सहित कई टिप्पणीकारों ने कहा कि इतनी बड़ी बेइज़्ज़ती के बाद अब मनमोहन सिंह को इस्तीफ़ा दे देना चाहिए.

राजनीतिक निहितार्थ

Image caption नरेंद्र मोदी और राहुल गाँधी

रविवार को दिल्ली में एक चुनावी रैली में भारतीय जनता पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी अचानक मनमोहन सिंह के ख़ैरख्वाह हो गए.

उन्होंने एक क़दम आगे बढ़कर मनमोहन सिंह के प्रति अगाध समर्थन का इज़हार करते हुए कहा कि अगर राहुल गांधी प्रधानमंत्री की गरिमा नहीं घटाते तो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की हिम्मत नहीं पड़ती कि वो भारत के प्रधानमंत्री को "देहाती औरत" कहते. ये अलग बात है कि ये पूरा वाक़या ही बेबुनियाद निकला.

राहुल गांधी की आलोचना इस बात के लिए भी की जा रही है कि अध्यादेश के ख़िलाफ़ उन्होंने पार्टी के भीतर अपनी बात रखने की बजाए सार्वजनिक मंच से अपनी ही पार्टी के नेतृत्व को क्यों कोसा.

यहां दो पल ठहरें और सोचें कि राहुल गांधी के मौखिक विस्फोट के क्या राजनीतिक निहितार्थ हो सकते हैं.

उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती 2014 में होने वाला आम चुनाव है जिसमें उनकी टक्कर - चाहे या अनचाहे - उस नरेंद्र मोदी से होने वाली है जिन्हें तमाम विपरीत परिस्थितियों को अपने माफ़िक मोड़ लेने और अपनी तमाम आलोचनाओं से राजनीतिक फ़ायदा उठा लेने में महारत हासिल है.

वो नरेंद्र मोदी जो 2002 में गुजरात में हुए मुस्लिम विरोधी दंगों का दाग़ छुड़ा नहीं पाए पर उन्होंने उस दाग़ को एक तमग़े में बदल कर अपने सीने पर पहनना शुरू कर दिया है. खुद सोनिया गांधी एक बार मोदी के लिए मौत के सौदागर वाला जुमला इस्तेमाल करके अपनी अंगुलियां झुलसा चुकी हैं. उसके बाद सोनिया ने फिर कभी गुजरात के दंगों का ज़िक्र नहीं किया.

दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी ने कॉरपोरेट जगत के बड़े महारथियों के साथ मंच पर प्रकट होकर भारतीय उच्च मध्यवर्ग के बीच अपनी छवि बदल डाली.

इंटरनेट, सोशल मीडिया, गूगल हैंगआउट जैसे टेक्नॉलॉजी के आधुनिक औज़ारों के ज़रिए युवा वर्ग में ख़ुद को स्थापित करने में काफ़ी हद तक कामयाबी हासिल की है.

प्रतिष्ठान विरोध

Image caption राहुल गाँधी ने उत्तर प्रदेश की पदयात्रा की पर राजनीतिक फायदा नहीं मिला.

राहुल गांधी के सामने दूसरी ब़ड़ी चुनौती है कांग्रेस, यूपीए सरकार और सबसे बढ़कर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पिछले पांच साल में मिली बदनामी से ख़ुद को अलग दिखाना.

उन्हें यह सिद्ध करना है कि अगर चुनावी मंच से राजनीति में शुचिता की बात करते हैं तो उसे लागू करने में उन्हें कोई हिचक नहीं है, चाहे हमले के दायरे में ख़ुद प्रधानमंत्री ही क्यों न आएँ.

सज़ायाफ़्ता विधायकों और सांसदों को बचाने की यूपीए सरकार की कोशिश को पलीता लगाकर राहुल गाँधी ने यह दिखाने की कोशिश की है कि वो उस मनमोहन सिंह को भी चुनौती दे सकते हैं जिनपर सत्ता बचाने के लिए बार बार बड़े समझौते करने और भ्रष्टाचारियों को नज़रअंदाज़ करने के आरोप हैं.

मनमोहन सिंह की साख धूमिल होने की शुरुआत यूपीए -1 के शासन के दौरान ही हो चुकी थी.

अमरीका के साथ परमाणु समझौते के मुद्दे पर वामपंथी पार्टियों के समर्थन वापस लेने के बाद समाजवादी पार्टी के विवादास्पद नेता अमर सिंह की मदद से मनमोहन सिंह की सरकार बचाने के लिए जिन तथाकथित तौर तरीक़ों का इस्तेमाल किया गया, वो इस सिलसिले का पहला उदाहरण था.

उसके बाद से कॉमनवेल्थ गेम्स, टू-जी स्पेक्ट्रम, निजी कंपनियों को कोयला खदान के लाइसेंस देने में कथित गड़बड़ियाँ, उससे संबंधित फ़ाइलों का ग़ायब हो जाना और प्रधानमंत्री का ये कहना कि "मैं फ़ाइलें रखने के लिए ज़िम्मेदार नहीं हूँ"... यानी भ्रष्टाचार के एक से बढ़कर एक आरोप लगे और प्रधानमंत्री उन सबको नज़रअंदाज़ करते नज़र आए.

दूसरी ओर राहुल गांधी हर मंच से राजनीति को बदलने की बात करते रहे.

एक तरह से उन्होंने ख़ुद को सत्ताधारी दल के भीतर मौजूद एक विद्रोही नेता के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया और विपक्ष के स्पेस पर क़ब्ज़ा करने की कोशिश की.

विपक्ष का स्पेस

Image caption भूमि अधिग्रहण का विरोध कर रहे किसानों के साथ राहुल गाँधी ने एकजुटता जताई.

ये ठीक वही तरीक़ा था जो अटल बिहारी वाजपेयी के ज़माने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके आनुषांगिक संगठनों ने अपनाया था.

संघ स्वदेशी जागरण मंच के ज़रिए सरकार की आर्थिक नीतियों को कठघरे में खड़ा करता था तो उसके वरिष्ठ नेता दत्तोपंत ठेंगड़ी वाजपेयी मंत्रिमंडल में वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा को खुलेआम चोर कहने से नहीं चूकते थे.

राम मंदिर के मामले में विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल लगातार इतना दबाव बनाए रखते थे कि एक बार अटल बिहारी वाजपेयी ने इस्तीफ़ा देने तक की पेशकश कर दी थी.

राहुल गाँधी प्रेस क्लब में जब बाँहें समेट कर अपनी ही सरकार के काम को ग़लत बता रहे थे तो वो ख़ुद को सत्य, न्याय, ईमानदारी और आदर्शवाद के पक्षधर की तरह पेश करना चाह रहे थे.

प्रतिष्ठान विरोधी युवा नेता बनने की ये कोशिश राहुल गाँधी एक लंबे अर्से से कर रहे थे.

कभी वो ओडीशा के आदिवासियों के पास जाकर उनकी ज़मीनें बचाने के संघर्ष में साथ रहने का वचन देते थे तो कभी पुलिस को धता बताकर तड़के दिल्ली के पास भट्टा-पारसौल में भूमि-अधिग्रहण के ख़िलाफ़ आंदोलन के दौरान पुलिस कार्रवाई के शिकार किसानों के साथ एकजुटता ज़ाहिर करने पहुँच जाते.

आर्थिक विकास का लगातार गिरते ग्राफ़ के कारण पश्चिमी देशों का मीडिया मनमोहन सिंह को नाकारा बताने लगा था.

मनमोहन सिहं, वित्तमंत्री पी चिदंबरम और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया की चिंता जहाँ आर्थिक ग्रोथ के ग्राफ़ को ऊँचा उठाने की रही, वहीं राहुल गाँधी की चिंता अगला चुनाव जीतने की है.

वो जानते हैं कि भारतीय जनता पार्टी "इंडिया शाइनिंग" की मृगमरीचिका तैयार करके ख़ुद उसी का शिकार हो गई थी. इसलिए वो चुनाव से पहले ऐसा कुछ नहीं करना चाहते जिससे उनकी कथनी और करनी में अंतर नज़र आए.

पुनश्च:

मनमोहन सिंह की कमज़ोर स्थिति को देखते हुए राहुल गांधी के लिए उनके फ़ैसले को फाड़कर फेंक देने लायक़ बताना आसान रहा होगा. पर अगर वो ख़ुद को नैतिकता की राजनीति के नए रहनुमा के तौर पर स्थापित करना चाहते हैं तो उन्हें इस सवाल का जवाब देने को तैयार रहना चाहिए कि अपने बहनोई रॉबर्ट वाडरा के भूमि सौदों पर सवाल उठने पर वो क्यों ख़ामोश रहे?

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