एक रात बेघरों के साथ

Image caption अपनी मां और छह भाई-बहन के साथ पूजा शर्मा फुटपाथ पर रहती हैं.

पूजा शर्मा रात को सोती नहीं हैं कि कहीं कोई ‘ग़लत फ़ायदा’ ना उठा ले.

बाईस साल की ये युवती इसलिए असुरक्षित महसूस करती हैं क्योंकि वो दिल्ली के प्रसिद्ध कनॉट प्लेस के पास हनुमान मंदिर के फ़ुटपाथ पर रहती है.

उनकी माँ मंदिर में जो भीख पाती हैं उसी से खाने का इंतज़ाम होता है. नहाने धोने के लिए सार्वजनिक शौचालय का आसरा है और पीने का पानी पास के पेट्रोल पंप से मांगना पड़ता है.

पूजा हिंदुस्तान के उन लाखों लोगों में शामिल हैं जिनके पास रहने को घर नहीं है. पर आज हम इन ‘बेघर’ लोगों के बारे में बात क्यों कर रहे हैं?

क्योंकि कई ग़ैर-सरकारी संस्थाओं ने मिलकर भारत के 28 शहरों में आम शहरियों से दरख्वास्त की थी कि वो अपने घर छोड़, बेघर लोगों के साथ फ़ुटपाथ पर एक रात बिताएं. इसी के तहत हनुमान मंदिर के फ़ुटपाथ पर दिल्ली के कॉलेजों के कुछ 23 लड़के और दो लड़कियां पहुंचीं.

ये पढ़े लिखे मध्यवर्ग के युवाओं और बेघर मजबूरों के बीच एक शहरी मुलाक़ात थी और मेरे जैसे पत्रकार इस मुलाक़ात के गवाह बने.

दिल्ली विश्वविद्यालय के नामी ‘लेडी श्रीराम कॉलेज’ की निशिता स्लीपिंग बैग भी लाईं थीं, पर कुछ ही देर बाद बोलीं, “मुझे नहीं लगता मैं यहां सोऊंगी, बातचीत करते-करते ही रात बिताना चाहूंगी, वैसे भी जैसी चादरों और चटाईयों पर ये लोग बैठे हैं, ऐसे में आरामदेह स्लीपिंग बैग खोलना बद्तमीज़ी लगेगी.”

Image caption दिल्ली के कॉलेजों में पढ़ रहे कई छात्र बेघर लोगों के साथ रात बिताने पहुंचे.

जीवन की जंग

ऐसी ही शुरुआती झिझक में मेहमान एक कोने में और उनके सवालों के इंतज़ार में मेज़बान अपनी-अपनी चादर पर बैठे रहे, मानो ‘पहले आप-पहले आप’ की झिझक हो.

पर कहानियां तो कहीं जाने को बेताब थीं. इसी प्रक्रिया में पूजा शर्मा से मेरी मुलाक़ात हुई. दो साल की उम्र में अपनी मां के साथ आगरा से दिल्ली आई पूजा तबसे यहीं फ़ुटपाथ पर रहीं हैं.

वो बताती हैं कि ज़िन्दगी को बेहतर बनाने के कई मौक़े तलाशे, पर थोड़ा ही आगे बढ़तीं और फ़ुटपाथ मानो पीछे खींच लेता.

पूजा कहती हैं, “मैंने एक ग़ैरसरकारी संस्था की मदद से स्कूल जाना शुरू किया, वहीं रहने को भी मिला. पर वो जगह आठवीं के बाद छोड़नी पड़ी, क्योंकि मां ने शादी कर दी. आदमी अधेड़ था पर उसके पास घर था. चौदह साल की उम्र में शारीरिक संबंध बहुत मुश्किल था. दो बच्चे भी हुए, पर फिर आदमी गुज़र गया और ससुरालवालों ने वापस यहां भेज दिया.”

पूजा ने कहा कि अब अपने बच्चों को उन्होंने बेघर बच्चों की एक संस्था के पास दाख़िल करवाया है ताकि उन्हें फ़ुटपाथ पर ना रहना पड़े.

और फिर पूजा ने जो कहा, वो सुनकर मैं अवाक रह गई. पूजा के मुताबिक़, “अपने लिए काम का जुगाड़ भी किया मैंने, ग़ाज़ियाबाद के एक प्राइवेट अस्पताल में गर्भवती महिलाओं का ऑपरेशन करना सीखा, बच्चों की डिलिवरी की, पर फिर मैं लंबा बीमार पड़ गई. नौकरी छूट गई और मैं फिर यहां हूं.”

नाउम्मीदी

पूजा अपनी ज़िन्दगी का ताना-बाना अभी समेट ही रही थी कि क़रीब 40 साल के एक आदमी ने मुझे रोका. मुग़लसराय के राजेश पाल ने कहा कि उनकी ज़िन्दगी तो कभी नहीं बदलेगी.

राजेश बोले, “मां पैदा करते ही मर गईं, और दस साल का था तो फ़ौजी पिता जी भी चले गए, तब से ट्रकवालों की ऐसी संगत में पड़ा कि शराब-गांजे का जीवनभर का साथ हो गया.”

Image caption राजेश पाल लंबे समय तक एक जगह नहीं रहते, फुटपाथ बदलते रहते हैं.

राजेश जब मुझे मिले तो नशे में नहीं थे, बस एक अजीब सा चैन था चेहरे पर. बोले कि अब अकेलापन ही अच्छा लगता है, ना साथी या शादी की तलाश है, ना परिवार-बच्चों की, ना ही कोई घर बनाने का सपना.

उन्होंने बताया कि कभी-कभी किसी पार्टी में बरतन धोने का काम करते हैं तो कभी ख़लासी का, और गुज़ारे के लिए ये काफ़ी है.

राजेश ने कहा, “यही ज़िन्दगी अच्छी है, किसी और तरीक़े से कभी जिया नहीं, अब जहां मन करता है चला जाता हूं, जैसे कुत्ते होते हैं ना – आवारा – वैसा ही हूं, अपनी मर्ज़ी का मालिक.”

राजेश की इस नाउम्मीदी ने मेरे बचे हुए सवालों को ख़ामोश कर दिया. मेरे साथ खड़े छात्र भी तितर बितर हो गए. सुबह भी होनेवाली थी, तो सब घड़ी देखने का बहाना करने लगे.

तभी उन्हीं में से एक, पटना से दिल्ली पत्रकारिता की पढ़ाई करने आए संदीप भूषण ने कहा, “मैं जब यहां आया था तो सोचा था कि ये लोग गंदे होंगे, बद्तमीज़ी से बात करेंगे, कोई समझ नहीं होगी, पर ये तो बिल्कुल हमारे जैसे हैं, साफ़ भी समझदार भी, बस ज़िन्दगी ने इन्हें सही मौक़े नहीं दिए हैं.”

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