'ये दुनिया का इतिहास है, मैं तो बस इसे संजो रही हूँ'

  • 19 अक्तूबर 2013
चमेली और फूलचंद जैन
Image caption एक स्वतंत्रता सेनानी जोड़ी की दुर्लभ तस्वीर,साल 1923

कैसा हो यदि इतिहास हमें मोटी किताबों और उसमें दर्ज भारी भरकम संदर्भों और तारीखों की लंबी फ़ेहरिस्त के ज़रिए न याद करना पड़े.

अनुषा यादव के लिए भी मामला ऐसा ही था. इसलिए उन्होंने तय किया कि भारतीय उपमहाद्वीप का इतिहास वे लोगों की किस्से कहानियों के ज़रिए बताएंगी.

फिर क्या था, भारतीय शादियों के ऊपर एक किताब लिखने का सिलसिला शुरू हुआ. फिर ये सफ़र धीरे धीरे देशों का इतिहास लिखने और जानने का प्रोजेक्ट बन गया.

अनुषा भारतीय शादियों के ऊपर एक किताब लिखना चाहती थी. कैसे होती थी शादियां पुराने जमाने में, लोग अलग अलग संस्कृतियों में कैसे सजते-संवरते थे. गहने, परंपरा, उत्सव.

तो बस यहीं से ये सिलसिला शुरू हुआ. बाद में शादियों को जानने की तलब तस्वीरों और कहानियों के जरिए उस समय के इतिहास की पहेली को बूझने में बदल गई.

आइडिया

Image caption मेमोरी प्रोजेक्ट की ऑनलाइन तस्वीरों को आठ लाख से ज्यादा लोग देख चुके हैं.

अनुषा बताती हैं, ''जब हम तस्वीरें इकट्ठी कर रहे थे तो आइडिया आया कि हम इनके जरिए कई चीजों के बारे में पता कर सकते हैं.'' लोगों ने मेरे मांगने पर फेसबुक पर अपनी तस्वीरें अपलोड करके भेजीं.

फिर उन्होंने विभाजन, धर्म, शादियां सहित कई मुद्दों पर अपने अनुभव मुझसे बाँटे. अपने दादा-परदादा के बारे में बात की.

उस समय मुझे एहसास हुआ कि ये आइडिया तो कुछ ज्यादा ही बड़ा है. शादी तो इसमें बस एक बूंद की तरह है.

अपनी इस मुहिम का नाम इंडियन मेमोरी प्रोजेक्ट के रखने के बारे में अनुषा कहती हैं, '' मेमोरी प्रोजेक्ट नाम मेरे लिए वास्तव में फ़िट बैठता है क्योंकि मैं यादों की बात कर रही थी. हर तस्वीर एक याद है, और तस्वीरों के आस-पास जो कहानी है, वो भी एक याद है. इंडिया को याद करने का यह एक तरीका था मेरे लिए. पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल जैसे देश जो कभी भारत का हिस्सा थे, मैं उन सबके बारे में बात करना चाहती थी.''

अनुषा के मुताबिक अब तक बहुत से लोग उनके इस प्रोजेक्ट के साथ अपने अनुभव साझा कर चुके हैं.

वे कहती हैं, ''फिलहाल मेरी साइट पर 120 तस्वीरें हैं. अभी तक इस वेबसाइट पर इन तस्वीरों को 8 लाख लोग देख चुके हैं. देखने वालों की संख्या रोज बढ़ रही है. क्योंकि ये दुनिया का ऐसा सबसे पहला आर्काइव है जो तस्वीरों और उनकी यादों के जरिए भारतीय उपमहाद्वीप का इतिहास पता करने की कोशिश कर रहा है.''

कहानियाँ

Image caption भारत के आखिरी सिल्क रूट ट्रेडर मुंशी अजीज 1945 में लद्दाख में अपने दोनों बेटों के साथ.

अनुषा को इन ढेर सारी तस्वीरों में से न्यूज चैनल एनडीटीवी के पत्रकार श्रीनिवासन जैन के दादा-दादी की तस्वीर बेहद पसंद आई. वे 16-17 साल की उमर में स्वतंत्रता सेनानी बन गए थे.

साल 1923 में राजस्थान में एक जोड़ी का हाथ पकड़ कर तस्वीर खिंचवाना दुर्लभ अनुभव है. उनकी पूरी कहानी बहुत रोचक है. 95 फीसदी लोग यह नहीं जानते हैं कि इतनी कम उम्र में लोग देश की आजादी के लिए लड़ रहे थे. चमेली और फूलचंद जैन की कहानी कम उम्र के स्वतंत्रता सेनानी के बारे में है.

अनुषा लोगों से सबसे पहले यही पूछती हैं कि उनके दादा-नाना, दादी-नानी क्या करते थे. इसके अलावा लोग भी अब उन्हें खुद से कहानियां बताने लगे हैं.

भारतीय उपमहाद्वीप में लोग अपने परिवार की बातों, रहस्यों के बारे में बात नहीं करना चाहते हैं. खासकर तब जब ये सारी चीजें ऑनलाइन आ गई हैं.

एक खास बात है कि लोग अब अपने अतीत को लेकर ज्यादा बात करने लगे हैं. इन बातों में खूबसूरती है, तो दर्द भी है. वे उनके बारे में भी बाते करने लगें हैं जिस पर बातें करना अब तक सही नहीं माना जाता रहा है.

अनुषा मानती हैं कि इस तरह की बहस समाज को और उदार बना सकती है. अब तो शोध ने भी ये साबित कर दिया है कि नॉस्टाल्जिया के बारे में बातें करना लोगों को और सहनशील और संवेदनशील बनाता है. यह लोगों को प्यार करना भी सिखाता है.

लंदन से भी कहानी

Image caption लंदन के बर्ट्स स्कॉट और उनकी गर्लफ्रेंड की 1930 में भारत में खींची गयी तस्वीर.

कहानियों के इन पुलिंदों में कभी कभी भूले बिसरे अधूरे प्रेम की कहानी भी सामने आ जाती है.

अनुषा बताती हैं कि एक कहानी इंग्लैंड के एक व्यक्ति बर्ट्स स्कॉट की है. वे भारत में टाइम्स ऑफ इंडिया में काम करते थे. यह कहानी उनकी मौत के बाद पोते ने लिखी है. बर्ट्स स्कॉट के बहुत से फोटोग्राफिक कलेक्शन थे. पोते को इस कलेक्शन से पता लगा कि दादा की एक प्रेमिका भी थी, जिसके बारे में उनके दादा ने कभी जिक्र तक नहीं किया था.

फेसबुक पर अब तक इसके लगभग चार हजार से ज्यादा शेयर हो चुके हैं.

इस अनोखे प्रोजेक्ट का आधार डिजिटल है. अनुषा नए जमाने के डिजिटल टूल के बारे में बेहद उत्साहित हैं. वो कहती हैं, ''डिजिटल टूल का जितना फायदा हम उठा सकते हैं वह हम उठा रहे हैं, फेसबुक जैसी कई फ्री साइट्स औऱ ऐप से हम बहुत सी चीजें इकट्ठा कर रहे हैं, पर इतना बड़ा आर्काइव चलाने के लिये, इसमें और सुधार करने के लिये हमें और ज्यादा फंडिंग की जरूरत है, लोग हमें मदद भी कर रहे हैं.''

आने वाले समय में इस आर्काइव में वीडियो, ऑडियो, वर्कश़ॉप, प्रदर्शनी, किताबें शामिल हो सकते हैं. छः-सात और देश हैं, जो अपने देश का इतिहास बचाने के लिये ऐसे ही प्रोजेक्ट चला रहे हैं.

अनुषा के मुताबिक यह दुनिया का पहला ऐसा आर्काइव है. मगर आज भी 80 प्रतिशत लोग ऐसे हैं, जिनके पास इंटरनेट नहीं है. वे इस आर्काइव के बारे में कुछ नहीं जानते हैं.

अनुषा कहती हैं, ''इस प्रोजेक्ट ने मुझे सिखाया है कि हम सब की सबसे बड़ी जरूरत है कि हमारा मतलब बना रहे. और शायद इसी वजह से लोग अपनी यादों को हमसे साझा करते हैं ताकि उनकी यादों के जरिए उनका रेलेवेंस बना रहे. इन कहानियों को पढ़कर अमरीका, लंदन, आस्ट्रेलिया से लोगों के फोन आते हैं, चिट्ठियां आती हैं. लोग अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हैं.''

Image caption पहला महिला रॉक बैंड बनाने वाली भारत की अनुपा नथानियल दोस्त शालिनी गुप्ता के साथ. साल 1962

अनुषा से कई लोग अपनी जिंदगी के कई अध्याय खोल कर दिखलाने में गुरेज़ नहीं करते हैं. एक तस्वीर भारत के पहले प्रसिद्ध महिला रॉक बैंड की थी. यह तस्वीर 1962 में ली गयी थी. यह कहानी लोगों को खासी पसंद आयी.

दुनिया का इतिहास

इस अनोखे वेबसाईट पर सभी देशों से लोग आते हैं. अनुषा बताती है, '' भारत में सबसे ज्यादा लोग इस आर्काइव पर आते हैं. भारत के बाद अमरीका, लंदन से लोग सबसे ज्यादा इस प्रोजेक्ट को जानना चाहते हैं.''

इतिहास की ये कहानियाँ भी सबसे ज्यादा भारत से ही लोग भेजते हैं. इसके अलावा लंदन, आस्ट्रेलिया, पाकिस्तान, बंग्लादेश, अमरीका, साउथ अफ्रीका, लंदन से भी लोग कहानियाँ भेजते हैं.

अनुषा 17 साल की उम्र से किताबें डिजाइन कर रही हैं. वे एक फोटोग्राफर और ग्राफिक डिजाइनर भी हैं. इस प्रोजेक्ट की जरूरत के लिये पैसे की जरूरत वह इन सबसे पूरा करती हैं.

इतिहास के बिखरे हुये इतिहात को इकट्ठा करने पर अनुषा जवाब देती हैं कि, ''ये दुनिया का इतिहास है. यह इतिहास लोगों का है, और लोग ही अपनी कहानियों के इस इतिहास को संजो रहे हैं. मैं तो बस इसे संजो रही हूँ. विभाजन की कहानियाँ लोगों की भावनाओं, उनके जीवन से जुड़ी हैं.''

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