अमावस की रात में हाथियों का कहर

  • 8 अक्तूबर 2013
हाथी, छत्तीसगढ़, घरों पर हमला, गांववाले
Image caption सागरपुर गांव के लोगों की रातें पहरेदारी में गुज़रती हैं कि कहीं हाथियों का झुंड उनके घर पर हमला न कर दे.

आज रात चाँद नहीं निकला है और चारों तरफ़ घुप अँधेरा छाया है. छत्तीसगढ़ के धरमजयगढ़ तहसील में कई गाँव ऐसे हैं, जहाँ के लोग महीनों से रात को नहीं सोए हैं.

सूरज ढलते ही इनकी रतजगे की तैयारी शुरू हो जाती है. मैं इन्हीं में से एक गांव सागरपुर में रात बिताने आया हूं.

हाथी कभी भी आ सकते हैं. उनके आगे किसकी मर्ज़ी चलती है.

और वे आ जाते हैं. गांव के लोग हाथों में लाठियां और टॉर्च लेकर जंगल से लगे खेतों की तरफ़ दौड़ रहे हैं. तभी आवाज़ आती है- "हाथी यहाँ हैं".

बस इस हांक पर लोगों का यह हुजूम शोर मचाता हुआ उसी तरफ़ दौड़ पड़ता है. हाथियों को जंगल तक खदेड़ने के बाद गाँव के लोग वापस लौट आते हैं, तभी कहीं दूर से शोर सुनाई देता है.

बढ़ रहा है टकराव

मेरे साथ सागरपुर के रहने वाले प्रसून साहा हैं. वे बताते हैं कि यहाँ से खदेड़े जाने के बाद हाथियों का झुंड अब पास वाले किसी पड़ोसी गाँव में घुस गया है.

Image caption लोग इतने आतंकित हैं कि परिवार के साथ रात को भी घरों के बाहर आकर बैठे रहते हैं.

सागरपुर और आसपास के लोगों की नींद हराम है और उन्हें पता है उनकी मदद के लिए कोई नहीं आने वाला.

गांव में शाम से ही फटे-पुराने कपड़ों की मशाल बनाने का काम शुरू हो जाता है. कोई मिट्टी के तेल के इंतज़ाम में लग जाता है, तो कोई पुराने टायर इकठ्ठा करने में. शाम ढलते ही आस-पास के जंगलों में हरकत शुरू होने लगती है.

प्रसून साहा बांग्लादेश से आए शरणार्थी हैं, जिनका परिवार तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान यानी बांग्लादेश से यहाँ भागकर आया था. सरकार ने साहा की तरह वहां से आए लोगों को धरमजयगढ़ के इलाक़े में ज़मीन के पट्टे देकर बसाया था.

इस पूरे इलाक़े में बसने वाले अमूमन सभी लोग किसान हैं, जिनके पास खेती के सिवाय रोज़ी-रोटी कमाने की कोई और राह नहीं है.

पिछले दस साल से वे हाथियों के हमले के बीच रहना सीख रहे थे और ये टकराव अब बढ़ते जा रहे हैं.

फ़सलें बर्बाद

Image caption हाथियों ने सागरपुर के प्रसून साहा की फ़सलें पूरी तरह बर्बाद कर दी हैं.

प्रसून साहा को इस बार काफ़ी नुक़सान हुआ है. उनका कहना है कि आर्थिक रूप से अब वे कभी संभल नहीं पाएंगे. कई एकड़ में फैली उनकी तैयार हो चुकी मकई की फ़सल को हाथियों ने तबाह कर दिया है. उन पर अब लाखों रुपए का क़र्ज़ है.

सागरपुर में साहा की तरह कई ऐसे ग्रामीण हैं, जिनका सब कुछ बर्बाद हो चुका है.

सागरपुर के बाशिंदे अपने मकानों और खेतों की रक्षा के लिए पहरेदारी कर रहे हैं. लोगों की रातें घरों के बाहर गुज़रती हैं.

लोग बताते हैं कि इस साल 31 जुलाई को बायसी गांव में जब हाथियों ने हमला किया था, तो बिमल सील अपने परिवार के साथ सो रहे थे. हाथियों ने उनका मकान गिरा दिया. दीवार के मलबे में उनकी चार साल की बेटी दब गई और बड़ी मुश्किल से उसे निकाला गया. उसको काफ़ी चोटें आईं थीं.

Image caption वन विभाग के बोर्ड तो हैं, मगर गांववालों का आरोप है कि उन्हें सरकारी मदद नहीं मिलती.

जब हाथी चले गए, तो रात को ही गाँव के कई लोग मुझे अपने-अपने टूटे मकान दिखाने की ज़िद करते रहे. मेरे साथ गए सामाजिक कार्यकर्ता धीरेन्द्र सिंह मालिया ने रात में ज़्यादा अंदर जाने से मना किया क्योंकि हाथियों का झुंड बहुत दूर नहीं गया था.

कोई नहीं उठाता फ़ोन

लोग कह रहे थे कि रात के वक़्त जब कभी हाथियों का झुंड उनके गाँव और खेतों पर हमला करता है, तो वन विभाग के लोग अपने मोबाइल फ़ोन या तो उठाते नहीं हैं या उन्हें बंद कर देते हैं.

वन विभाग के अमले के रवैये से गांववालों की बेबसी और बढ़ रही है. इसी इलाक़े के रहने वाले तापस बिस्वास कहते हैं कि लाख मिन्नतों के बावजूद वन विभाग के लोग न तो उन्हें बड़ी टॉर्च देते हैं, न मशाल जलाने के लिए मिट्टी का तेल और न पटाख़े.

Image caption रात में हाथी आशियाना तोड़ते हैं तो गांववालों को दिन में घर बनाने की कवायद में जुटना पड़ता है.

गांववालों के इस दावे की तस्दीक़ शुभ्रांशु चौधरी ने भी की, जिनके सिटीज़न जर्नलिज्म नेटवर्क सीजीनेट स्वरा पर अक्सर इन इलाक़ों में फंसे लोग अपनी तकलीफ़ साझा करते हैं.

चौधरी के मुताबिक़ ये रोज़़ का सिलसिला है. "जब कभी भी लोगों पर हाथियों का हमला होता है, तो वे सीजीनेट मोबाइल पर फ़ोन कर अपनी आपबीती सुनाते हैं. कभी-कभी ऐसा हो भी जाता है कि 'सीजीनेट' पर लोगों की गुहार सुनकर, वन विभाग के अधिकारियों की नींद खुलती है."

धरमजयगढ़ के वन मंडल अधिकारी आरसी अग्रवाल कहते हैं कि ऐसा नहीं है. उनके मुताबिक़ हाथियों के हमले से निपटने के लिए एक रैपिड एक्शन फ़ोर्स का गठन किया गया है, जिसके पास गाड़ी, पटाख़े और सायरन मौजूद हैं.

मिर्चें लाएं तो कहां से

Image caption हाथियों का कहर झेलने वाले गांव वाले मुआवज़े के लिए तहसील दफ़्तर पहुंचते हैं तो वहां उनकी सुनवाई नहीं होती.

अग्रवाल कहते हैं कि जब भी कोई आपात स्थिति पैदा होती है तो दल उस जगह पहुंचकर हाथियों को खदेड़ने का काम करता है. उन्होंने बताया कि इसके अलावा विभाग ने गांववालों को सलाह दी है कि जब कभी हाथियों का दल उनके गाँव की तरफ़ आए तो वो मिर्च का बुरादा उनकी तरफ़ उड़ायें या फिर मिर्चों को जलाएं.

गाँव के लोगों को विभाग का यह सुझाव भा नहीं रहा है क्योंकि बाज़ार में मिर्चें काफ़ी महंगी हैं.

प्रसून साहा बताते हैं कि पहले इस इलाक़े में मिर्चों की खेती हुआ करती थी. मगर उससे हाथियों को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा और उनकी आवाजाही बदस्तूर जारी रही.

Image caption गांववालों का विरोध निकलता है इस तरह के पोस्टरों के ज़रिए.

सरकारी दावों की पोल उस रात खुल गई, जब मेरे सामने गाँव वाले वन विभाग के अधिकारियों को फ़ोन लगाने की नाकाम कोशिशें कर रहे थे.

वजह यह थी कि जिस झुंड को कुछ देर पहले ही गांव वालों को खदेड़ा था, वे फिर गांव की तरफ़ आ रहे थे. फिर मशालें, टॉर्च, हल्ला, दौड़भाग.

मैंने सहमी हुई औरतों को अपने बच्चों को गोद से चिपकाते और उन्हें चुप कराते देखा.

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