भारत में तूफ़ानों से ज़्यादा तबाही क्यों मचती है?

  • 13 अक्तूबर 2013
पायलिन, तूफ़ान

ओड़िशा के तटवर्तीय इलाकों में समुद्री तूफान पायलिन ने भारी तबाही मचाई है. खेती, मूल-भूत सुविधाओं और सड़क-यातायात को भी चक्रवात से भारी नुकसान पहुंचा है. ओड़िशा सरकार के अनुसार तूफान से सात लोगों की मौत भी हुई है.

लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में चक्रवात से आम तौर पर होने वाली मौतों की संख्या दुनिया के बाकी इलाकों से कही ज़्यादा है?

आखिर भारत के पूर्वी तट और बांग्लादेश में बार-बार तूफ़ान आते क्यों है और क्या वजह है कि भारत के पूर्वी तट पर जान और माल की क्षति सबसे ज़्यादा होती है?

नेशनल साइक्लॉन रिस्क मिटिगेशन प्रोजेक्ट के मुताबिक उत्तरी हिंद महासागर में आने वाले तूफ़ान दुनिया में आने वाले कुल तूफ़ानों का सिर्फ़ सात फ़ीसदी ही होते हैं लेकिन पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के तटों पर इन तूफ़ानों का असर सबसे ज़्यादा गंभीर होता है.

'ऊंची लहरें ख़तरनाक'

चक्रवात की इस गंभीर समस्या के लिए तूफ़ान के वक्त उठने वाली ऊंची लहरों को ज़िम्मेदार माना जाता है.

मौसम विभाग का मानना है कि समुद्र तल छिछला होने की वजह से भारत के पूर्वी तट पर लहरें ऊंची उठती हैं.

लेकिन ये भी समझना ज़रूरी है कि भारत का पश्चिमी तट, पूर्वी तट की तुलना में शांत कैसे है.

नेशनल साइक्लॉन रिस्क मिटिगेशन प्रोजेक्ट के मुताबिक साल 1891 से 2000 के बीच भारत के पूर्वी तट पर 308 तूफ़ान आए. इसी दौरान पश्चिमी तट पर सिर्फ़ 48 तूफ़ान आए.

इसकी वजह भी है, भारत के मौसम विभाग के मुताबिक 'बंगाल की खाड़ी के ऊपर बनने वाले तूफ़ान या तो बंगाल की खाड़ी के दक्षिण पूर्व में बनते हैं या उत्तर पश्चिम प्रशांत सागर पर बनने वाले तूफ़ानों के अंश होते हैं जो हिंद महासागर की ओर बढ़ते हैं.'

उत्तर पश्चिम प्रशांत सागर पर बनने वाले तूफ़ान वैश्विक औसत से ज़्यादा होते हैं इसलिए बंगाल की खाड़ी पर भी ज़्यादा तूफ़ान बनते हैं.

वहीं अरब सागर पर बनने वाले तूफ़ान या तो दक्षिण पूर्व अरब सागर पर बनते हैं या बंगाल की खाड़ी पर बनने वाले तूफ़ानों के अंश होते हैं.

क्योंकि बंगाल की खाड़ी पर बनने वाले तूफ़ान ज़मीन से टकराने के बाद कमज़ोर पड़ जाते हैं इसलिए ऐसा कम ही होता है कि ये अरब सागर तक पहुंचें.

पश्चिमी तट 'शांत'

इसके अलावा बंगाल की खाड़ी की तुलना में अरब सागर ठंडा है इसलिए इस पर ज़्यादा तूफ़ान नहीं बनते.

माना जाता है कि तूफ़ान से निपटने की कमज़ोर तैयारी की वजह से मुश्किल बढ़ जाती है.

अब लौटते हैं ऊंची लहरों के ख़तरे की ओर. मौसम विभाग मानता है कि तूफ़ान से तीन तरह के ख़तरे होते हैं, भारी बारिश, तेज़ हवाएं और ऊंची लहरें.

इन तीनों में भी सबसे ख़तरनाक ऊंची लहरें ही हैं और हाई टाइड के वक्त लहरें और ज़्यादा उठती हैं. ये तब और खतरनाक हो जाती हैं जब समुद्र का तल छिछला हो.

गुजरात के आसपास के पश्चिमी तट पर ऊंची लहरें उठने का ख़तरा कम है लेकिन पूर्वी तट पर हम जैसे-जैसे तमिलनाडु से ऊपर आंध्र प्रदेश, ओडीशा और पश्चिम बंगाल की ओर बढ़ते हैं, ये ख़तरा बढ़ता जाता है.

जब एक विशेष तीव्रता का तूफ़ान भारत के पूर्वी तट और बांग्लादेश से टकराता है तो इससे जो लहरें उठती हैं वो दुनिया में किसी भी हिस्से में तूफ़ान की वजह से उठने वाली लहरों के मुकाबले ऊंची होती हैं.

इसके पीछे वजह है तटों की ख़ास प्रकृति और समुद्र का छिछला तल.

ये सही है कि ऊंची लहरें तबाही मचाती हैं लेकिन जनसंख्या के ज़्यादा घनत्व और तूफ़ानों के प्रति लोगों के जागरुक न होने या इनसे निपटने में सरकारों की कमज़ोर तैयारी की वजह से मुसीबत और बड़ी हो जाती है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार