दतिया: 'हादसे का दुख तो है पर तीर्थ भी ज़रूरी है'

  • 14 अक्तूबर 2013

मध्य प्रदेश के दतिया ज़िले के रतनगढ़ मंदिर पहुंचने पर ऐसा नहीं लगता है कि इससे कुछ ही दूर पर एक दिन पहले इतना बड़ा हादसा हुआ था.

दशहरे के मौके पर यहां लोग मंदिर में पूजा-अर्चना कर रहे हैं और उत्सव मना रहे हैं. रंगे-बिरंगे कपड़ों और तमाम आभूषणों से लदे लोग मंदिर परिसर में तालियाँ बजाते हुए गीत गा रहे हैं और ढोलक बजा रहे हैं.

मरने वालों की संख्या 115 तक हो गई है और बाईस लोग अभी भी घायल हैं जिन्हें आस-पास के अस्पतालों में भर्ती कराया गया है.

पढ़ें: पुल पर हर ओर केवल शव दिख रहे थे

रतनगढ़ मंदिर में पहुँचे श्रद्धालुओं का कहना था कि उन्हें रविवार को हुए हादसे का अफ़सोस है लेकिन उन्हें अपनी तीर्थ यात्रा भी पूरी करनी है, इसलिए वो मंदिर तक आए हैं.

छोटे दुकानदार खाने-पीने की चीजों के साथ अन्य कई तरह की वस्तुएं बेचते नज़र आ रहे थे. यहां का माहौल देखकर तो यही लग रहा है कि लोग त्योहार के रंग में रँगे हुए हैं और एक दिन पहले यानी रविवार को हुए दर्दनाक हादसे को भूलने की कोशिश कर रहे हैं.

रतनगढ़ मंदिर को जाने वाले जिस पुल पर रविवार को पुल टूटने की अफ़वाह के बाद भगदड़ मची थी वो पुल आज यात्रियों से भरा हुआ था और सुबह से ही लोगों की आवाजाही जारी थी.

सौ से ज्यादा मौतें

Image caption रविवार को रतनगढ़ में हुए हादसे में सौ से भी ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी.

रविवार को इसी पुल पर हुए हादसे में सौ से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी और कई लोग अभी भी जिंदगी और मौत से संघर्ष कर रहे हैं. कुछ श्रद्धालुओं से जब पूछा गया कि उन्हें रविवार के हादसे के बाद डर नहीं लग रहा है तो उनका कहना था कि उन्हें किसी तरह का भय नहीं है. रविवार का हादसा एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी और वो हादसा अब गुज़र चुका है.

ग़ौरतलब है कि रतनगढ़ मंदिर जाने वाले इसी पुल पर कुछ साल पहले भी भगदड़ मचने से एक बड़ा हादसा हुआ था. उस हादसे में भी पचास से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी.

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