क्या झुंपा लाहिड़ी को मिलेगा बुकर ?

अमरीका

भारतीय मूल की अमरीकी लेखिका झुंपा लाहिड़ी का उपन्यास 'दी लोलैंड' साल 2013 के मैन बुकर पुरस्कार की सूची में शामिल 13 उपन्यासों में से एक है.

पुलित्ज़र पुरस्कार विजेता झुंपा सादगी भरे लेखन के लिए जानी जाती हैं. उनकी प्रमुख रचनाओं में इंटरप्रेटेर ऑफ मेलडीज (1999), दि नेमसेक (2003) और अनअकस्टम्ड अर्थ (2008) हैं. दि नेमसेक पर इसी नाम से फिल्म भी बन चुकी है.

लंदन में पैदा हुईं लाहिड़ी के उपन्यास 'दी लोलैंड' की कहानी भारत और अमरीका को आधार बनाकर बुनी गई है. उपन्यास की प्रेरणा और पृष्ठभूमि के बहाने उनके जीवन से जुड़े इसके तार को भी खंगालने की कोशिश की गई. झुंपा से बात की बीबीसी संवाददाता रज़िया इकबाल ने.

झुंपा अपनी किताबों में ऐसे किरदार रचती हैं जिन्हें आसानी से भुलाया नहीं जा सकता. लंदन में पैदा हुईं और न्यूयॉर्क में रह रहीं लाहिड़ी पश्चिमी बंगाल से ब्रिटेन आए एक भारतीय प्रवासी की बेटी हैं.

सामूहिकता की कमी खलती रही

आप्रवासी भारतीय की बेटी होने के कारण मैंने हमेशा से सामूहिकता की कमी महसूस की. इसीलिए मुझे इसकी तलाश में ज़्यादा रुचि रही.

मैंने अपने भीतर हमेशा उन सीमाओं और उस अलगाव को महसूस किया जो दूसरे देश में बसा व्यक्ति करता है.ये मैंने एक इंसान के रूप में नहीं, बल्कि एक बच्चे के रूप में ज़्यादा किया.

बचपन में मैं इस अहसास से हमेशा बेचैन रहती थी, और सबसे कटी कटी रहती थी. आज बड़े होने पर भी मुझे यही सब महसूस होता है.

मगर एक अंतर ये है कि आज मैं लेखिका हूं. अपने अहसास लिख कर व्यक्त कर सकती हूं. लेखन ने मुझे खुला आकाश दिया. बहुत कुछ है लिखने को.

लिखने के हुनर ने सारी सीमाएं मिटा दीं. लिखना एक विश्वव्यापी अनुभव रहा मेरे लिए. अलग-थलग पड़ जाने, देश छोड़ आने का अहसास, सब मेरी रचनाओं में मैंने समेट लिया.

'दी लोलैंड' की पृष्ठभूमि

मेरी चौथी किताब 'दी लोलैंड' कई पीढियों की गाथा है. इसमें किरदारों के बहाने कृषि क्रांति, नक्सलवादी समस्या के बारे में भी बात की गई है. किताब में एक जगह वर्णन है कि किस तरह सरकार एक भाई को नक्सलवादी कह कर फांसी दे देती है.

'दी लोलैंड' ने मुझे भी आकर्षित किया. इसमें कुछ ऐसा है जिसके हम बेहद करीब हैं, मगर उससे अनजान हैं. इस उपन्यास में फांसी की घटना है. इस तरह की घटना वास्तव में घटी है. यह सब मेरे दादा-दादी के जन्म स्थल से जुड़ा हुआ है.

साल 1971 में इस तरह की कई घटनाएं घटीं. एक तरफ तो मैं बिलकुल अनजान थी कि दुनिया के एक हिस्से में ऐसी हिंसक कार्रवाई और उथल-पुथल क्यों मची है. उस जगह पर जहां मेरे माता पिता रहा करते थे.

जब फांसी की घटना घटी तो मैं वह सब अपने आंखों के सामने घटते हुए देख रही थी. क्योंकि मैं उन पड़ोसियों को जानती थी. भारत जाने पर काफ़ी समय उनके साथ बिताया करती थी.

मैं जानना चाहती थी कि यह सब क्यों हुआ? क्या वजह थी? एक जवान लड़के को फांसी देना और परिवार को एक लाइन में खड़ा करके यह सब देखने को विवश करना, ऐसा क्यों हुआ?

'बुक एण्ड लर्निंग'

झुंपा लाहिड़ी की अधिकांश किताबों का केंद्रीय विषय किताबें और लिखना-पढ़ना ही रहा. उनके रचे गए किरदार काफी पढ़े-लिखे होते हैं. 'दी लोलैंड' का ताना-बाना भी ज़्यादातर यूनिवर्सिटी के आस-पास ही बुना गया है. यहीं एक भाई को गोली मारी जाती है.

'दी लोलैंड' एक तरह से मेरा प्लेग्राउण्ड है, मेरा आकाश है.

मेरे परिवार के बारे में बात करूं तो, मेरे पिता यूनिवर्सिटी में लाइब्रेरियन थे. यही एक ऐसा सच था जिसने हमारे परिवार को अनोखा बनाया. क्योंकि मेरे मन में कहीं न कहीं ये बात गहरे बसी थी कि हम इसलिए यहां हैं क्योंकि मेरे पिता ने कुछ ख़ास किया है, जो समाज के लिए उपयोगी है. हमारे वहां होने की यही पहचान थी.

आप यहां क्यों आए हैं, क्या कर रहे हैं. इस तरह के कई मन दुखा देने वाले सवाल किए जाते थे. मैं उस समाज से कटा हुआ महसूस करती थी, अतीत की कमी खलती थी.

मेरे माता पिता का अतीत बेहद समृद्ध था. उन्होंने आज़ादी देखी थी, आज़ादी के पहले का भारत देखा था. मेरे पिता साल 1931 में जन्मे और 1964 में उन्होंने भारत छोड़ दिया था. ये साल भारतीय इतिहास के नज़रिए से बेहद खास थे.

माता-पिता ही मेरी दुनिया थे

मैं संवाद में विश्वास करती हूं. उन समस्याओं और चुनौतियों की बात करती हूं जो ख़ासकर अंतरंग संबंधों में रहने वाले लोग झेलते हैं. चाहे वह संबंध रोमांटिक हो या पारिवारिक.

बचपन में मुझे लोगों से जुड़ने में काफी दिक्कत होती थी. मैं डरती थी.

माता-पिता ही मेरी दुनिया थे. स्कूल में मैं किसी से दोस्ती नहीं कर पाती थी. बड़े होने पर भी किसी पर भरोसा करना मेरे लिए कठिन रहा.

अपने आस-पास की इस संवादहीनता के कारण मैं किताबों की ओर खिंची. और किताबों ने मुझे लिखने के लिए प्रेरित किया.

मैं कम उम्र में ही लिखने लगी. किताबें मेरी दोस्त बन गईं. ख़ुद से संवाद का एक ज़रिया मिला.

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