शाहिद आज़मी: ये भारत ही है जहाँ चरमपंथी रहे मुसलमान को स्वीकारा गया

मुंबई के वकील शाहिद आज़मी की हत्या के लगभाग तीन साल बाद उनके जीवन पर बनी हंसल मेहता की फ़िल्म 'शाहिद' सिनेमा घरों में रिलीज़ हुई है. ये फ़िल्म अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म सर्किट में पिछले साल से ही हलचल मचा रही है.

मुंबई में रहते हुए मैं अहमद शाहिद आज़मी को करीब से जानता था.

शाहिद आज़मी से हमारी पहली मुलाक़ात मुंबई के टैक्सीमेंन कॉलोनी में उनके दफ्तर के उसी कमरे में हुई थी जहाँ चार साल बाद यानी 11 फ़रवरी 2010 को उनकी अज्ञात लोगों ने हत्या कर दी थी.

करीब से दागी गई दो गोलियों ने उस आवाज़ को हमेशा के लिए खामोश कर दिया था, जिसे दुनिया एक दबंग मानवाधिकार वकील की आवाज़ समझती थी और मैं निडर और दो-टूक शब्दों में बात करने वाली आवाज़.

शाहिज़ आज़मी अपने 'दागदार' अतीत के बारे में बात करने से कभी घबराते नहीं थे. हमारी पहली मुलाक़ात में ही उन्होंने मुझे बता दिया था कि वो पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के एक चरमपंथी कैंप में ट्रेनिंग ले चुके है. उन्होंने मुझसे कहा था, "मैं ऑटोमेटिक राइफल चला सकता हूँ. बम बना सकता हूँ."

लेकिन, इससे पहले कि उन्हें अपनी ट्रेनिंग को आज़माने का मौक़ा मिलता उन्हें भारत लौटते ही गिरफ्तार कर लिया गया. उन्होंने एक बार फिर मुस्कुराते हुए कहा था, "मैं 16 साल की उम्र में टाडा कानून के अंतर्गत गिरफ्तार होनेवाल सबसे कम उम्र का चरमपंथी था."

'जिहादी वकील बुलाते थे'

शाहिद जेल में सात साल रहे. लेकिन इस सात सालों का उन्होंने भरपूर फायदा उठाया. वहां उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की और अपने भविष्य का रास्ता ढूंढ लिया. जब वो जेल से बाहर आए तो एमए कर चुके थे. कुछ साल बाद वो एक योग्य वकील भी बन गए और 2003 से बॉम्बे हाई कोर्ट में वकालत भी करने लगे.

कुछ महीने उन्होंने प्रसिद्ध क्रिमिनल लॉयर मजीद मेमन के साथ काम किया, लेकिन बाद में अपनी प्रैक्टिस खुद ही शुरू कर दी.

उन्हें अंदाजा था कि एक पूर्व चरमपंथी के लिए बॉम्बे हाई कोर्ट में वकालत करना आसान नहीं होगा. अपनी वकालत के शुरू के दिनों की बातें बताते हुए उन्होंने मुझे बताया था कि वहां के वकील उन्हें वकील की हैसियत से स्वीकार करने के बजाये उन्हें 'आतंकवादी' या 'जिहादी' वकील कह कर बुलाते थे और ताने कसते थे.

लेकिन उन्होंने इसकी शिकायत करने के बजाय इस बात की हमेशा प्रशंसा की है कि ये भारत ही है जहाँ टाडा में सात साल गुज़ारे मुस्लमान को समाज में इतनी आसानी से वापस स्वीकार कर लिया.

शाहिद काज़मी की बातें सुन कर लगता था कि उन्हें अपने अतीत की हरकतों पर पछतावा था. उनके विचारों में उदारता झलकती थी. उनके दफ्तर में काम करने वाले अधिकतर हिन्दू थे. उन्होंने सभी से

मुझे गर्व के साथ मिलाया भी था.

बात अगर दोबारा पहली मुलाकात की करें तो ये मुलाक़ात 2006 में उस समय हुई जब मुझे एक लेख के लिए किसी पूर्व चरमपंथी से मिलना था. अंग्रेजी अख़बारों में इंटरव्यू से उनके बारे में पता चला था. इत्तेफाक से उनका दफ्तर और घर मेरे दफ़्तर के करीब था. मैंने उन्हें बीबीसी के स्टूडियो में इंटरव्यू के लिए निमंत्रण दिया तो उन्होंने कहा कि वो किसी के दफ़्तर नहीं जाते. उन्होंने दो-टूक शब्दों में कहा, "अगर आपको मेरा इंटरव्यू करना है तो आप मेरे दफ़्तर आ सकते हैं."

उनकी ये अदा मुझे भली

लगी. एक बार मुझे महेश भट्ट ने बताया था कि वो एक फ़िल्म बना रहे हैं जिसमें वो ये दिखाना चाहते हैं कि एक चरमपंथी के दिमाग में क्या चलता है. मैंने शाहिद आज़मी का नाम लिया और कहा कि आप उनसे मिलकर ये सवाल कीजिए. मेरे सामने महेश भट्ट ने उन्हें फोन किया और मुंबई के उपनगर जुहू आने की दावत दी. शाहिद आज़मी ने कहा वो लोगों से केवल अपने दफ्तर में मिलते हैं. महेश भट्ट अपने स्क्रिप्ट राइटर के साथ उनके दफ्तर दो बार गए.

शाहिद आज़मी से मैं अक्सर उस समय मिलता था जब मुंबई में कोई बम धमाका या चरमपंथी हमला होता था. उन्हें ये अंदाज़ा था कि इन हमलों में किसका हाथ हो सकता था.

इसी तरह से 2006 में लोकल ट्रेनों में हुए बम धमाकों के सात अभियुक्तों की वकालत करने वाले शाहिद ने मुझे बताया था कि 'वो केवल सात लोगों की पैरवी इसलिए कर रहे हैं क्योंकि उन्हें पता था कि वो बेक़सूर' हैं.

'मुख्य धारा का अंग बन गए थे'

शाहिद आज़मी ने मुझे बताया था कि जब उन्होंने 2006 के बम धमाकों के अभियुक्तों पर लगे मकोका कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी तो उन्हें धमकियाँ मिलने लगीं. उन्हें अंदाज़ा था कि उनकी जान को खतरा है लेकिन उन्होंने इसकी परवाह नहीं की. पुलिस ने उन्हें सिक्यूरिटी भी दी लेकिन उनकी हत्या के समय सुरक्षा नहीं थी.

शाहिद आज़मी में मेरी दिलचस्पी का एक और कारण ये था कि वो अमरीकी पत्रकार डेनियल पर्ल की हत्या के कथित ज़िम्मेदार ओमर सईद शैख़ को अच्छी तरह से जानते थे. दोनों की दोस्ती जेल में हुई थी और जेल से रिहा होने के बाद भी शाहिद ने मुझे बताया था कि उनकी 'खतो किताबत' होती थी.

मैंने ओमर सईद शैख़ से एक इंटरव्यू उस समय किया था जब दुनिया उन्हें जानती भी नहीं थी. शाहिद आज़मी ने मुझे बताया था कि वो चिट्ठियाँ उनके पास हैं और वो मुझे पढने के लिए देंगे. लेकिन जब मुंबई में 2005 में बाढ़ आई तो उनकी सारी किताबें और ये चिट्ठियाँ भी पानी की भेंट चढ़ गईं.

शाहिद आज़मी से जब मैं पहली बार मिला था तो उनकी आयु केवल 28 साल थी. देखने में वो एक फ़िल्मी हीरो से कम नहीं लगते थे और कोई भी उन्हें देख कर पूर्व चरमपंथी नहीं कह सकता था. देखने में जितने अच्छे लगते थे, बातें भी उतनी ही शानदार करते थे. कानून के अलग अलग पहलुओं पर बातें करने में उन्हें बड़ा मज़ा आता था और मुझे हमेशा महसूस होता था कि वो समाज की मुख्य धारा का अंग बन चुके हैं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार