'यूएस अफ़ग़ानिस्तान में भारत को दे रहा ठेका'

  • 20 अक्तूबर 2013
आडवाणी और मोदी
हाल के समय में मोदी और आडवाणी के रिश्ते सहज नहीं रहे

बीते हफ़्ते भारतीय ऊर्दू अख़बारों में जहां चुनावों से पहले गर्माती राजनीति और ग़ुलामों पर आई एक ताज़ा रिपोर्ट की चर्चा रही, वहीं पाकिस्तानी अख़बारों में प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के अमरीकी दौरे को लेकर ख़ासी गहमागहमी है.

दिल्ली से छपने वाले ‘इंक़लाब’ ने अपने संपादकीय में लिखा है कि लाल कृष्ण आडवाणी इतने मीठे हो जाएंगे, ये अंदाज़ा किसी को नहीं था.

उन्होंने न सिर्फ़ नरेंद्र मोदी की तारीफ़ की बल्कि ये तक कह दिया कि अगर मोदी प्रधानमंत्री बने तो उन्हें ख़ुशी होगी. आडवाणी ने कहा कि सिर्फ़ हिंदोस्तान में ही नहीं, बल्कि विदेशों में गुजरात और मोदी की तारीफ़ की जा रही है.

अख़बार के मुताबिक़ ये नहीं कहा जा सकता है कि ये शब्द उन्होंने ख़ुद कहे या गुजरात में होने की वजह से उनसे कहलवाए गए. लेकिन ये ज़रूर कहा जा सकता है कि इन शब्दों से उन्होंने मोदी का कद बढ़ाया नहीं, बल्कि अपना कद घटाया है.

धर्मनिरपेक्षता पर बहस

‘हिंदोस्तान एक्सप्रेस’ ने एक वैश्विक सर्वे पर संपादकीय लिखा है जिसके मुताबिक़ भारत में लगभग एक करोड़ चालीस लाख लोग ग़ुलामी की ज़िंदगी जीने को मजबूर हैं. इस सर्वे में भारत के बाद चीन को दूसरा और पाकिस्तान को तीसरा स्थान मिला है.

अख़बार कहता है कि गुलामी की ये तस्वीर ऐसे वक्त में दिखाई गई है जब भारत की सरकार बराबर दावा करती है कि दुनिया ने भारत को उभरती हुई अर्थव्यवस्था के तौर पर स्वीकार कर लिया है और वो विश्व मंच अपनी मौजूदगी प्रभावी तरीके से दर्ज कराने में कामयाब रहा है. लेकिन ये रिपोर्ट भारत की क़लई खोलती है.

दैनिक ‘सहाफत’ ने मुसलमान और सेक्युलरिज़्म के शीर्षक से लिखा है कि मुसलमानों का ये रवैया बहुत अजीब है कि जिन देशों में मुसलमान बहुसंख्यक हैं और जिन्हें मुस्लिम देश कहा जाता है, वहां कभी सेक्युलरिज़्म का नाम नहीं लिया जाता, लेकिन जिन देशों में मुसलमान अल्पसंख्यक हैं, वहां मुसलमानों की तरफ़ से बराबर सेक्युलर यानी धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था पर जोर दिया जाता है.

अख़बार कहता है कि मिसाल के तौर पर भारत में मुस्लिम नेता धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था को बहुत ज़रूरी बताते हैं, लेकिन कभी किसी मुस्लिम नेता ने यह नहीं कहा गया है कि सऊदी अरब और दूसरे मुस्लिम देशों में भी धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था होनी चाहिए.

'बेहतरीन मौका'

दूसरी तरफ़ पाकिस्तानी अखबार ‘नवाए वक्त’ ने लिखा है कि चीनी निवेशक पाकिस्तान में सुरक्षा का स्थिति को लेकर परेशान हैं. बीजिंग में हुए एक सेमीनार मे कहा गया कि पाकिस्तान में काम के दौरान सबसे बड़ी समस्या व्यक्तिगत सुरक्षा है.

अमरीका के दौरे पर हैं नवाज़ शरीफ़

अख़बार के अनुसार चीन पाकिस्तान का पक्का दोस्त है. इन हालात में जब विदेशी निवेशक पाकिस्तान आने को तैयार नहीं है और पाकिस्तानी उद्योगपति भी अपना कारोबार समेत कर विदेशों का रुख कर रहे हैं, ऐसे समय में चीनी विशेषज्ञ पाकिस्तान में दर्जनों प्रोजेक्ट चला रहे हैं. लेकिन इनमें से कई लोग चरमपंथी हमलों में मारे गए हैं.

अख़बार के अनुसार चीनी कंपनियों की चिंता अपनी जगह सही है. अगर इन चिंताओं को दूर करने की कोशिश नहीं की गई तो इससे देश की अर्थव्यवस्था को और धक्का लगेगा.

दैनिक ‘उम्मत’ ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के अमरीकी दौरे को अपने संपादकीय का विषय बनाया है और सुर्खी दी है ‘अमरीका से अपनी मांगें मनवाने का बेहतरीन मौका’.

अख़बार कहता है कि अमरीका अफ़ग़ानिस्तान से जाते जाते वहां भारत को अपने हितों का ठेकेदार बनाने की कोशिश कर रहा है. इसका पाकिस्तान पर नकारात्मक असर पड़ना लाज़मी है.

अख़बार ने लिखा है कि पाकिस्तान से भारत की दुश्मनी जगजाहिर है. ऐसे में पूर्वी सीमाओं के अलावा पश्चिमी सीमाओं पर भी आने वाले समय में भारतीय ख़तरे बढ़ जाएंगे. इसलिए पाकिस्तानी चिंताओं को उठाने के लिए नवाज शरीफ का ये दौरा बहुत अहम है.

'दोगली नीति'

दैनिक ‘इंसाफ’ में एक लेख छपा है – शीर्षक है ‘अमरीका क्षेत्र में अशांति चाहता है’. इसके मुताबिक़ अमरीका चरमपंथ के मुद्दे पर पाकिस्तान से आए रोज़ ‘डू मोर’ यानी और कदम उठाने को कहता रहता है लेकिन अफ़ग़ानिस्तान में अपनी मौजूदगी के बावजूद वो पाकिस्तान में वहां से होने वाली घुसपैठ को नहीं रोकता है जो उसकी दोगनी नीति का मुंह बोलता सबूत है.

अख़बार के अनुसार चरमपंथ के ख़िलाफ़ जंग में पाकिस्तान से अधिक क़ुरबानियां किसी देश ने नहीं दीं, लेकिन इनका सम्मान करने की बजाय पाकिस्तान में घुसपैठ के जरिए चरमपंथी कार्रवाइयों को अंजाम दिया जा रहा है.

पाकिस्तान बराबर ड्रोन हमलों का विरोध करता रहा है

लेख में कहा गया है कि जाहिर है इनका मकसद पाकिस्तान को कमज़ोर करना और उस पर दबाव बढ़ा कर अपनी मर्ज़ी के फ़ैसले कराना है.

दैनिक ख़बरें ने लिखा है कि ईद उल ज़ुहा के मौक़े पर देश भर में सुरक्षा के सख़्त इंतज़ामों के कारण कानून व्यवस्था की स्थिति बेहतर रही जिसके लिए सरकार, गृह मंत्रालय, पुलिस, सुरक्षा बल और कानून व्यवस्था में जुटी दूसरी एजेंसियां बधाई के हक़दार हैं, हालांकि ईद के दिन खैबर पख्तून ख्वाह में ईद के दिन हुए आत्मघाती हमले में प्रांत के कानून मंत्री के मारे गए.

दैनिक ‘अमन’ ने संयुक्त राष्ट्र की एक हालिया रिपोर्ट के हवाले से लिखा है कि पाकिस्तान में अब तक हुए 330 ड्रोन हमलों में 2200 लोग मारे गए हैं जिनमें से चार सौ आम लोग थे.

अख़बार के मुताबिक रिपोर्ट में अमरीका की आलोचना करते हुए कहा गया है कि उसने कभी पाकिस्तान और यमन में हुए इन ड्रोन हमलों से जुड़े आंकड़े जारी नहीं किए हैं.

और आख़िर में दैनिक ‘वक्त’ के एक कार्टून का ज़िक्र जिसमें पाकिस्तान की खस्ताहाल अर्थव्यवस्था को एक गाड़ी के तौर पर पेश किया गया है लेकिन न उसके टायरों का पता है और न छत का. खिड़कियां बगल में टूटी पड़ी हैं तो तेल की टंकी सूखी पड़ी है.

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