ये लड़ाई कभी भी पैसे के लिए नहीं थी:डॉक्टर कुणाल साहा

अनुराधा और कुणाल साहा
Image caption डॉक्टर कुणाल साहा ने पत्नी की मौत के बाद एक संस्था बनाई जो मेडिकल लापरवाहियों के खिलाफ आवाज़ उठाती है.

चिकित्सीय लापरवाही के एक मामले में लगभग छह करोड़ रुपये का मुआवज़ा पाने वाले कुणाल साहा का कहना है कि उनकी लड़ाई कभी भी पैसे के लिए नहीं थी.

अमरीका में रहने वाले भारतीय मूल के डॉक्टर साहा का कहना है कि ये लड़ाई भारत में चिकित्सीय लापरवाही के हालात के खिलाफ़ थी जिसके फ़ैसले से आने वाले समय में कई लोगों की जान बच सकेगी.

उन्होंने साल 1998 में अपनी पत्नी की भारत के एक अस्पताल में मौत होने के बाद उस अस्पताल पर लापरवाही का मुक़दमा किया था.

गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में फ़ैसला देते हुए अस्पताल को आदेश दिया कि वो डॉक्टर साहा को क़रीब छह करोड़ रुपये बतौर मुआवज़ा दे.

अमरीका के ओहायो राज्य के कोलंबस शहर से बीबीसी के साथ ख़ास बातचीत में डॉक्टर कुणाल साहा ने कहा, "मैं मुआवज़े की राशि को लेकर ख़ुश नहीं हूं क्योंकि ये लड़ाई कभी पैसे के लिए नहीं थी. ये लड़ाई भारत में चिकित्सीय लापरवाही के हालात के ख़िलाफ़ थी."

मामला

डॉक्टर साहा की पत्नी डॉक्टर अनुराधा साहा साल 1998 में भारत आई थीं जहां त्वचा से जुड़ी एक असाधारण बीमारी के लिए इलाज के लिए उन्हें कोलकाता के एडवांस मेडिकेयर रिसर्च इंस्टिट्यूट, एएमआरआई, अस्पताल में भर्ती कराया गया.

एएमआरआई में इलाज के बाद अनुराधा साहा की हालत बिगड़ने पर उन्हें मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में स्थानांतरित किया गया था जहां टॉक्सिक एपिडर्मल नेक्रोलिसिस (एनइटी) से उनकी मौत हो गई.

पत्नी की मौत के बाद कुणाल साहा ने अस्पताल के ख़िलाफ़ लापरवाही का मुक़दमा किया था.

साल 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने एएसआरआई को मेडिकल लापरवाही का दोषी पाया था और इस मामले को नेशनल कंस्यूमर डिसप्यूट रिड्रेसल कमीशन को रेफर किया गया था जिसने मुआवज़े की राशि 1.7 करोड़ तय की थी. लेकिन डॉक्टर साहा को नामंज़ूर थी और उन्होंने मुआवज़े की राशि बढ़ाने के लिए अदालत में अपील की थी.

डॉक्टर साहा ने बताया कि उन्होंने 77 करोड़ रुपये का दावा किया था और पिछले 15 साल में इस लड़ाई को लड़ने के लिए उन्होंने ख़ुद पांच-छह करोड़ रुपये खर्च किए हैं.

सिस्टम को बदलने की ज़रूरत

उन्होंने कहा, "आज से 15 साल पहले अनुराधा की मौत हुई थी लेकिन ऐसी और बहुत अनुराधा आज भी भारत में मर रही हैं. आज जो ये फ़ैसला आया है इसका असर भारत की चिकित्सा प्रणाली पर पड़ेगा और इससे आने वाले समय में बहुत सी जाने बच सकेंगी."

ओहायो स्टेट युनिवर्सिटी में एड्स के एक बड़े रिसर्चर डॉक्टर कुणाल साहा ने एएमआरआई के तीन डॉक्टरों के ख़िलाफ़ मामले भी दर्ज करवाए थे जो अनकी पत्नी के इलाज से जुड़े हुए थे. इस मामले में 17 डॉक्टरों की अदालत में पेशी हुई थी.

लेकिन इसके बावजूद वो कहते हैं कि वो डॉक्टरों के ख़िलाफ़ नहीं हैं.

Image caption डॉक्टर अनुराधा साहा साल 1998 में भारत आई थीं जहां त्वचा से जुड़ी एक असाधारण बीमारी में उनकी मौत हो गई थी.

डॉ़क्टर साहा ने कहा, "मैं डॉक्टरों के खिलाफ़ नहीं हूं. मैं ख़ुद भी डॉक्टर हूं और मेरे बहुत से दोस्त और परिवार में डॉक्टर हैं. लेकिन हमारे समाज में आज जैसे डॉक्टरी हो रही है, मेडिसिन एक व्यापार हो गया है, ये ठीक नहीं है."

उनका ये भी आरोप है कि भारत में पैसा देकर मेडिसिन की डिग्री खरीदी जा सकती है.

उन्होंने कहा, "मेरे पिता भी डॉक्टर थे. मैंने देखा था कि उन्हें कितनी इज़्ज़त मिलती है. लेकिन आज ये इज़्ज़त कहां हैं? मेडिसिन में जो शीर्ष पर हैं वो अपनी जानकारी और इल्म की वजह से नहीं बल्कि राजनीति करने और पैसा देने से बनते हैं. आज भारत में पैसा देकर एमबीबीएस की डिग्री भी खरीदी जा सकती है. ऐसे लोग कैसे डॉक्टर बनेंगे?"

डॉक्टर साहा का कहना है कि इस सिस्टम को बंद करना पड़ेगा और इसके लिए अच्छे डॉ़क्टरों को सामने आना होगा. वे मानते हैं कि उनके मामले में दिए गए फ़ैसले से डॉक्टरों में थोड़ा डर पैदा होगा जिससे इस तरह के हालात की रोकथाम में मदद मिलेगी.

डॉक्टर कुणाल साहा का कहना है कि ये लड़ाई उनके लिए आसान नहीं रही है. लेकिन उन्होंने ऐसा किया क्योंकि ये काम एक पूरी पीढ़ी के लिए है और इंसान की जान बचाने के लिए है.

वो कहते हैं कि उनकी पत्नी उनके लिए आज भी ज़िंदा हैं.

पेशे से बच्चों की डॉक्टर रहीं अनुराधा साहा की मौत के बाद से ही उनके पति मेडिकल लापरवाही के मामलों के खिलाफ अभियान चला रहे हैं. उन्होंने ‘पीपल फ़ॉर बेटर ट्रीटमेंट’ नाम की एक संस्था बनाई और मेडिकल लापरवाहियों के खिलाफ आवाज़ और बुलंद की.

क्या अप्रवासी भारतीय या एनआरआई होने की वजह से उन्हें कुछ फ़ायदा हुआ?

डॉक्टर साहा कहते हैं कि इस बात का फ़ायदा और नुकसान दोनों ही रहे.

वे कहते हैं, "इन सालों में मुझे भारत के कई चक्कर लगाने पड़े. अपना काम छोड़कर कोई 50-60 बार भारत आना पड़ा जो कि बहुत मुश्किल था. हां, लेकिन एनआरआई होने की वजह से मैं इतना ख़र्च कर सकता हूं जो एक आम भारतीय नहीं कर सकता था. इसलिए इस सिस्टम को बदलना ही होगा."

(बीबीसी संवाददाता विनीत खरे के साथ बातचीत पर आधारित.)

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