'विवादों से हार नहीं मानी राजेंद्र यादव ने'

राजेंद्र यादव

हिंदी साहित्य की मशहूर पत्रिका 'हंस' के संपादक, हिंदी में नई कहानी आंदोलन के प्रवर्तकों में एक, कहानीकार, उपन्यासकार राजेंद्र यादव का जीवन विवादों से भरा रहा. मगर उन्होंने कभी इससे हार नहीं मानी.

समाज के वंचित तबके और स्त्री-पुरुष संबंधों को अपने लेखन का विषय बनाने वाले राजेंद्र यादव के जीवन पर बीबीसी ने बात की दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफ़ेसर मैनेजर पांडेय से.

हंस का भविष्य अंधकारमय: मैनेजर पांडेय

राजेंद्र यादव पिछली आधी सदी से हिंदी साहित्य में सक्रिय रहे. उन्होंने तीन-चार क्षेत्रों में बहुत महत्वपूर्ण काम किया है. नई कहानी के लेखकों में महत्वपूर्ण थे राजेंद्र यादव. उन्होंने कुछ अच्छे उपन्यास भी लिखे जिस पर 'सारा आकाश' जैसी फ़िल्म भी बनी. जीवन के उत्तरार्ध में उन्होंने 'हंस' पत्रिका निकाली, जो हिंदी की लोकप्रिय और विचारोत्तेजक पत्रिका मानी जाती है.

इसके जरिए उन्होंने दो काम किए, पहला यह कि उन्होंने स्त्री दृष्टि और लेखन को बढ़ावा दिया. स्त्री दृष्टि पर उनकी राय विवादास्पद लेकिन विचारणीय रही. उन्होंने दूसरा काम यह किया कि 'हंस' के ज़रिए उन्होंने दलित चिंतन और दलित साहित्य को बढ़ावा दिया. दलित साहित्य को हिंदी साहित्य में स्थापित करने में राजेंद्र यादव ने उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

राजेंद्र यादव विचार और व्यवहार में लोकतांत्रिक आदमी थे. मतभेदों से न वे डरते थे, न घबराते थे और न बुरा मानते थे. मैं पिछले 20 साल से 'हंस' के लिए लिख रहा हूं. कई मुद्दों पर मतभेद के बाद भी उनसे मेरा संबंध आत्मीय बना रहा, कभी उसमें खटास नहीं आई. उनका जाना हिंदी साहित्य के लिए बहुत बड़ी घटना और नुक़सान है.

इससे 'हंस' का भविष्य अंधकारमय हो गया है. उसका भविष्य क्या होगा यह न तो राजेंद्र यादव को मालूम था और न हम लोगों को. हम इस पर उनसे चर्चा किया करते थे. 'हंस' अगर अब चलती भी है तो, उसमें वह बात नहीं होगी जो राजेंद्र के समय थी. दूसरा बड़ा नुक़सान यह है कि हिंदी के विभिन्न मुद्दों पर होने वाली बहसों में शामिल रहते थे. लेकिन अब ऐसा नहीं हो पाएगा.

हिंदी में दलित साहित्य को आगे बढ़ाने में राजेंद्र यादव का बहुत बड़ा योगदान है. मेरी जानकारी में हिंदी में दलित साहित्य पर पहली गोष्ठी उन्होंने 1990 के दशक में कराई थी. उसके माध्यम से लोग यह जान सके कि हिंदी में दलित साहित्य की धारा विकसित हो रही है. उन्होंने दलित लेखकों की रचनाओं को 'हंस' में प्रमुखता से छापा. दलित साहित्य पर 'हंस' के कई विशेषांक निकाले. इसके ज़रिए दलित साहित्य को समझने और आगे बढ़ाने का काम राजेंद्र यादव ने किया. इसकी बदौलत दलित साहित्य हिंदी में स्थापित धारा बन पाया.

युवा लेखकों को आगे बढ़ाने में भी राजेंद्र यादव का बड़ा योगदान है.

दलित, स्त्री प्रश्न, दमित यौन वृत्तियों पर बहस कराई: अपूर्वानंद

'हंस' साहित्यिक पत्रिका का पुर्नप्रकाशन उनका सबसे बड़ा योगदान माना जाएगा. इसे उन्होंने एक ऐसे मंच का रूप दिया, जिस पर कई नए कहानीकार आए, जिन्हें कोई जानता तक नहीं था. राजेंद्र यादव ने उन्हें जगह दी. विवादों को जानबूझकर जन्म देते हुए और विवाद झेलते हुए भी उन्होंने नए लोगों को मौक़ा दिया. इसके लिए उन्होंने इस बात की चिंता नहीं की कि इसका परिणाम क्या होगा.

हंस में उन्होंने साहित्य के इर्द-गिर्द सामाजिक विषयों पर बहस शुरू की. दलितों के सवाल पर, स्त्रियों के सवाल पर और यौन वृत्तियों के सवाल पर. यह भी उनका बड़ा योगदान है.

राजेंद्र यादव उस त्रयी के सदस्य थे, जिनमें कमलेश्वर और मोहन राकेश का नाम आता है. इस त्रयी ने हिंदी कहानी को एक नई दिशा दी और उसके तेवर को बदलकर रख दिया.

मेरी नज़र में राजेंद्र यादव ने अपनी कहानियों में स्त्री-पुरुष संबंधों में दमित इच्छाएं खोजने की कोशिश ज़रूर की लेकिन वह सफल नहीं हो पाए.

आज की पीढ़ी उन्हें 'हंस' के संपादक के रूप में याद करेगी. 'हंस' का संपादन उन्होंने उस समय शुरू किया, जब उनकी रचनात्मकता का सबसे अनुर्वर समय था. इसलिए रचनाकार राजेंद्र यादव को वह पीढ़ी नहीं जान पाई, जो 'हंस' पढ़कर बड़ी हुई. लेकिन इसके पहले की पीढ़ी उन्हें नई कहानी की त्रयी के सदस्य के रूप में याद करेगी.

इनके अलावा बहुत से ऐसे लोग भी हैं, जिन्होंने उनके समय में पहली बार साहित्य में क़दम रखा. वे उन्हें इस रूप में याद करेंगे कि राजेंद्र यादव ने उन्हें मंच दिया. ऐसे लेखकों को संपादकीय साहस की ज़रूरत थी, जिसे राजेंद्र यदाव ने दिखाया.

इसके अलावा राजेंद्र यादव को ख़तरों की परवाह किए बिना अपनी बात बेबाकी से रखने के लिए भी याद किया जाएगा.

(अपूर्वानंद से बीबीसी संवाददाता रूप झा और मैनेजर पांडेय से बीबीसी संवाददाता अजय शर्मा की बातचीत पर आधारित)

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