क्या मोदी के नाम पर जद-यू के भीतर हो रहा है घमासान?

शिवानंद तिवारी
Image caption जद-यू नेता ने पार्टी के चिंतन शिविर के मौके पर मोदी की प्रशंसा की है.

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ बोलने वाले जद-यू नेता शिवानंद तिवारी को अब मोदी में अच्छाइयां नजर आने लगी हैं. उन्होंने मोदी की बड़ाई करते हुए कहा है कि जीवन में काफ़ी संघर्ष करने के बाद मोदी इस मुक़ाम तक पहुंचे हैं.

ये मौका था राजगीर में चल रहे जद-यू के चिंतन शिविर का. इस बयान के बाद पार्टी के कई कार्यकर्ता शिवावंद तिवारी के खिलाफ़ खड़े हो गए हैं. बीबीसी संवाददाता सुशीला सिंह ने जद-यू नेता शिवानंद तिवारी से बातचीत की.

मोदी के बारे में दिए गए अपने बयान के बारे में राज्य सभा सांसद शिवावंद तिवारी का कहना है कि एक ईमानदार राजनीतिक कार्यकर्ता का दायित्व है कि वह अपना अनुभव और फ़ीडबैक पार्टी के सामने रखे. और इसी जवाबदेही के तहत उन्होंने अपनी बात रखी.

शिवानंद मानते हैं कि इस बयान का मतलब ये नहीं कि वे अपनी पार्टी से बग़ावत करने जा रहे हैं.

फ़ासीवादी फलसफा

Image caption मोदी की प्रशंसा करने के बाद जद-यू नेता शिवानंद तिवारी अपनी ही पार्टी में घिर गए हैं.

मोदी की तारीफ़ के बाद हो रही आलोचना के बाद अपना स्पष्टीकरण देते हुए शिवानंद तिवारी कहते हैं, "प्रधानमंत्री पद के लिए जिस व्यक्ति का नाम ज़ोर शोर से लिया जा रहा है, वह फ़ासीवादी चरित्र का है. आरएसएस का फ़ासीवादी फ़लसफ़ा उनकी रग रग में है. ऐसा आदमी यदि प्रधानमंत्री बनता है तो वह देश के लिए ख़तरा है."

जनता दल यूनाइटेड के चिंतन शिविर में शिवानंद तिवारी ने नरेंद्र मोदी की तारीफ़ करते हुए कहा था कि वे नरेंद्र मोदी के प्रशंसक हैं क्योंकि जीवन में काफी संघर्ष करने के बाद मोदी इस मुकाम तक पहुंचे है और ये कोई साधारण बात नहीं है.

शिवानंद तिवारी अपनी आलोचना के बारे में कहते हैं, " मैं साल 1964-65 से पार्टी का राजनीतिक कार्यकर्ता हूं, मैंने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के कई सम्मेलनों में हिस्सा लिया. जब किसी को कोई बात अच्छी नहीं लगती है तो मारपीट तक हो जाती है. प्रतिरोध करना सबका अधिकार है."

'मेरी मर्जी'

मीडिया ने शिवानंद तिवारी की बात को जिस ढंग से रखा उसके प्रति अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए उन्होंने कहा, "मीडिया में भी मूर्खों की कमी नहीं है. मैंने किसी और संदर्भ में बात की थी. मैंने कहा था कि एक चाय बेचने वाला, हमारा आपका जूठा गिलास धोने वाला आदमी इस ऊंचाई तक पहुंचा. ये उसकी ताकत है. और यही ताकत उसको और ख़तरनाक बनाती है."

उन्होंने आगे कहा, "अटल बिहारी बाजपेयी भी आरएसएस स्कूल के ही प्रोडक्ट थे. साल 1957 में वे लोकसभा में गए. वे जवाहरलाल नेहरू से प्रभावित थे. इसीलिए वे जब प्रधानमंत्री भी बने तो उनमें आरएसएस की कट्टरता नहीं थी."

फिर वे पार्टी के मंच से नरेंद्र मोदी के बारे में अपने विचार व्यक्त करने को सही भी ठहराते हैं. वे कहते हैं कि ये सही मौका था, पार्टी का फ़ोरम था. सबको अपनी बात कहने को कहा गया था.

इस कार्यक्रम में पार्टी के कार्यकर्ता के अलावा पार्टी नेतृत्व भी मौजूद था. मंच पर शरद यादव और नीतीश कुमार जैसे नेता उपस्थित थे.

Image caption पटना में 27 अक्टूबर को हुई मोदी की रैली का दृश्य

जद-यू के चिंतन शिविर के दिन ही अपनी बात रखना क्यों ज़रूरी था, इस बारे में शिवानंद तिवारी ने बताया, "ये मेरी मर्ज़ी है कि मैंने इसी दिन को अपनी बात उठाने के लिए चुना. पार्टी का कैंप रोज़ तो नहीं लगता कि हम अपनी बात कहें."

'चाय बेचने वाला'

शिविर में पार्टी के नेता और कार्यकर्ता की ओर से कहा गया कि वे नरेंद्र मोदी का नाम ना लें. नाम नहीं लेने की बात पर शिवानंद कहते हैं, " नरेंद्र मोदी से हमारा मुकाबला है. हम अपने प्रतिद्वंद्वी के बारे में जानेंगे नहीं तो लड़ाई कैसे लड़ेंगे. रणनीति कैसे बनाएंगे."

शिवानंद फिर से अपना बचाव करते हुए कहते हैं, "कोई मामला है ही नहीं. तिल का ताड़ बनाया जा रहा है. पार्टी का फ़ोरम है, उसमें हमने अपनी बात कही. यही राजनीतिक परंपरा है."

Image caption जद-यू के चिंतन शिविर में मंच पर शरद यादव और नीतीश कुमार

बीजेपी ने प्रधानमंत्री उम्मीदवार के रूप में नरेंद्र मोदी के नाम की घोषणा काफी पहले की थी. तो क्या शिवानंद तिवारी को उस समय ये ख़्याल नहीं आया था?

इस आरोप के जवाब में वे कहते हैं, "पिछले असेंबली चुनाव के पहले ही हमारी पार्टी चाहती थी कि हमलोग एनडीए से बाहर आ जाए. नरेंद्र मोदी का नाम जैसे आया वैसे ही हमने विरोध किया था."

शिवानंद तिवारी ने ये भी कहा कि नरेंद्र मोदी सिर्फ 'चाय बेचने वाले' नहीं हैं. इतना मज़बूत आदमी जिस तरह की विचारधारा की पैरवी करते हैं, वो डरावनी बात है.

अब देखना है कि शिवानंद तिवारी के विरोध में उठे ये स्वर आगे भी बने रहेंगे, या ये मामला यहीं शांत हो जाएगा.

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