'दूरबीन तो दूर, स्कूलों में परखनली तक नहीं'

  • 3 नवंबर 2013
विज्ञान

भारत के मंगल मिशन के मौके पर यही सवाल मन में उठता है कि क्या भारतीय समाज वैज्ञानिक सोच वाला समाज है.

क्या हम अपने नौनिहालों को एक वैज्ञानिक सोच देने का सपना देखते हैं और क्या उसे सच करने की क्षमता रखते हैं?

हर बच्चे के भीतर एक खोजी कलाकार और वैज्ञानिक छिपा होता है. मगर भारतीय शिक्षा प्रणाली कुछ ऐसी है कि स्कूल खत्म होते-होते उनमें छिपे खोजी कलाकार और वैज्ञानिक का गला घोंट उनमें डॉक्टर, इंजीनियर या मैनेजर बनने की चाहत बिठा दी जाती है.

बाल मजदूरों का बैंक

लेकिन इसका आशय ये नहीं है कि समाज को इलाज, मकान और सुव्यवस्था की ज़रूरत नहीं है. ऐसे में सवाल है कि क्या कला और विकास के बिना सभ्य समाज सम्भव है? क्या नई खोजों के बिना विकास सम्भव है?

विज्ञान की शिक्षा हमेशा से ही समस्या से जूझती रही है क्योंकि आधुनिक विज्ञान को जन्म लिए अभी सिर्फ़ 400 साल हुए हैं.

शिक्षा के इतने सारे सिद्धांतों और प्रयोगों के बावजूद भारतीय शिक्षा प्रणाली मूल तौर पर रटंत विद्या पर ही चल रही है.

डिग्रियां बेचने की दूकान

उबाऊ पाठ्यक्रमों का बोझ, सुविधाविहीन स्कूल और उत्साहहीन शिक्षकों के चलते विद्यार्थी स्कूलों से निकलने के बाद उच्च शिक्षा के लिए विज्ञान विषय लेने से कतराते हैं.

नतीजा यह है कि भारत में विज्ञान शोधपत्रों की संख्या तथा गुणवत्ता दोनों ही चिंतनीय है. विश्वविद्यालय ज्ञान की नर्सरी की बजाय डिग्रियां बेचने की दुकान बनते जा रहे हैं.

सड़क पर पली जिंदगियाँ

पिछले पंद्रह-बीस साल में वैज्ञानिक शिक्षा की कमर पूरी तरह टूट गई है. निजी कॉलेज तथा विश्वविद्यालयों में तकनीक तथा आपूर्ति विज्ञान को प्राथमिकता दी जा रही है.

विज्ञान शिक्षा को रोचक और प्रभावकारी बनाने के कई सारे गैर-सरकारी प्रयास देश भर में किए जाते रहे हैं.

इन प्रयासों में केरल में केरल शास्त्र एवं साहित्य परिषद, मध्य प्रदेश में विनोद रैना द्वारा 1972 होशंगाबाद का विज्ञान शिक्षण कार्य, दिल्ली में 2001 में साइंस पॉपुलराइजेशन एसोसिएशन ऑफ कम्यूनिकेशन्स एंड एजूकेशन्स, 'स्पेस' यानी एसपीएसीई द्वारा स्कूलों में एस्ट्रानॉमी क्लब उल्लेखनीय हैं.

केएसएसपी और एचएसईपी ने लोक भाषा में विज्ञान की सस्ती किताबों और पत्रिकाओं के ज़रिए विज्ञान को रोचक ढंग से आम लोगों तक पहुंचाने के लिए प्रयोग किए.

खेल खेल में विज्ञान

गांवों तथा कस्बों के स्कूलों में हाल ये है कि विज्ञान की पढ़ाई से जुड़ी प्रयोगशाला तो क्या एक परखनली तक नहीं होती है. दूरबीन तो बहुत दूर की बात है.

ऐसे में उनके आसपास मौजूद चीजों से प्रयोग करने लिए जुगाड़ बनाकर विज्ञान को खेल-खेल में सिखाने के प्रयास किए गए. इसमें अरविंद गुप्ता के कबाड़ से बनाए गए विज्ञान खिलौने अद्भुत हैं.

एस्ट्रोनॉमी यानी खगोल विज्ञान को सारे विज्ञानों की जड़ कहा जाता है और विज्ञान की सारी शाखाएं इसमें आकर समा जाती हैं.

झारखंड में बाल पंचायत

गेलीलियो द्वारा दूरबीन से आकाश की एक झलक ने सदियों से चले आ रहे दर्शन तथा धर्मशास्त्रों की धुंध को चीर कर आधुनिक विज्ञान को जन्म दिया. आज भी दूरबीन से दिखने वाला चांद अपने हज़ारों केटरों और पहाड़ों के बावजूद आंख से दिखने वाले चांद से ज़्यादा सुंदर दिखता है.

दिल्ली में एक संगठन है 'एमेच्योर एस्ट्रोनॉमर एसोसिएशन ऑफ दिल्ली.' इसके सदस्य हर तारामंडल में शाम को या दिल्ली के बाहरी इलाकों में रात को दूरबीन लेकर आकाश दर्शन के लिए जाते थे.

इस संगठन को स्कूल अपने छात्रों के लिए बुलाने लगे. धीरे-धीरे स्कूलों से जब बुलावे बढ़ने लगे तो एक फुलटाइम काम करने वाले संगठन की ज़रूरत महसूस हुई और इसी ज़रूरत के चलते 'स्पेस' का जन्म हुआ.

'स्पेस' एक मिशन

दिल्ली के स्कूलों में नियमित तौर पर एस्ट्रानॉमी क्लब चलाने के लिए एक पाठ्यक्रम बनाया गया तथा उसको अमल में लाने के लिए युवा प्रशिक्षकों की एक टीम बनाई गई. यह टीम स्कूलों में जाकर वहां खगोल विज्ञान की गतिविधियां संचालित करती हैं.

शहर की तेज़ रोशनियों से दूर तारों की रोशनी में बच्चे जाकर जब आकाश गंगा देखते हैं तो उनकी रुचि बढ़ जाती है.

'स्पेस' का उद्देश्य वैज्ञानिक तथ्यों की रटी रटाई जानकारी देना नहीं बल्कि एक वैज्ञानिक सोच पैदा करना है. इसका असर काफी सुखद हुआ है. अब छात्र ना सिर्फ विज्ञान पढ़ रहे हैं बल्कि स्कूल में रहते हुए ही वैज्ञानिक खोज भी कर रहे हैं.

एस्ट्रोनॉमी क्लबों से जुड़े हुए विद्यार्थी अब तक आधा दर्जन नए एस्ट्राइड की खोज कर प्रोफेशनल वैज्ञानिकों का मुकाबला कर रहे हैं. खुद एक गैरपेशवर खगोलशास्त्री होने के नाते मुझे लगता है बच्चों में विज्ञान की रूची पैदा करने के लिए साइकिल पर टेलिस्कोप लेकर सड़कों पर निकलने का समय आ गया है. एक 'तारा आवारा' बनकर !

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