'राजनेता बोलने से पहले इतिहास समझें'

  • 4 नवंबर 2013
नरेंद्र मोदी

राजनेता इतिहास का इस्तेमाल अपने हितों के लिए करते हैं. राजनेता ऐसी बातें कह देते हैं जिनका कोई ऐतिहासिक आधार नहीं होता. हमारे पास जो ऐतिहासिक साक्ष्य हैं उनसे वो बातें कभी नहीं सिद्ध हो सकतीं.

जैसे मोदी ने पटना में अपने भाषण में इतिहास का जो जिक्र किया उसमें सारी की सारी बातें ग़लत हैं. उनकी बातों की गंभीर इतिहास में कोई जगह नहीं है.

मोदी ने कहा कि चाणक्य का युग स्वर्ण युग था.

पढ़िए: किस 'सवर्ण युग' की खोज कर रहे हैं मोदी

चाणक्य चंद्रगुप्त मौर्य का बौद्धिक अभिभावक और गुरू ज़रूर था, उसने देश के बड़े हिस्से का एकीकरण किया लेकिन देश का असली एकीकरण अशोक के समय में हुआ. हालांकि अशोक के राज्य में भी सुदूर दक्षिण के राज्य शामिल नहीं थे.

एक राष्ट्र के रूप में भारत की परिकल्पना पहले जमाने में थी ही नहीं, न ही मौर्य काल में न ही गुप्त काल में.

मुगल काल के बाद ब्रिटिश काल में इस तरह की भावना आई. खासतौर पर साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई शुरू होने के बाद यह भावना प्रबल होती गई.

'स्वर्णकाल'

यह कहना ग़लत है कि चंद्रगुप्त का समय स्वर्णकाल था. उनके समय में कृषि उत्पादों का एक बटा चार हिस्सा कृषि कर के रूप में देना होता था यानी वह एक शोषणकारी राज्य था.

अकाट्य तथ्य है कि अशोक जब लुंबिनी गए तो उन्होंने स्थानीय लोगों को राहत देने के लिए कर की दर घटा कर एक बटा छह की थी.

इससे पता चलता है कि उसके पहले कर की दर इससे ज़्यादा थी.

चाणक्य ने अपने अर्थशास्त्र में जिक्र किया है कि राजस्व एकत्रित करने के लिए अंधविश्वास वाली चीजों का प्रयोग किया जा सकता है.

जैसे कि कहीं कोई मूर्ति लगा दी और वहाँ जो चढ़ावा आए, उसे लेकर राजकोष में डाल दिया जाए.

पतंजलि के योगसूत्र से भी इस बात की पुष्टि होती है कि मौर्यों ने ऐसा किया था.

चाणक्य के समय को स्वर्ण काल कहना इसलिए भी गलत है क्योंकि उस समय सामाजिक एकीकरण नहीं हुआ था. उसके समय तक जाति प्रथा काफी मजबूत हो चुकी थी.

अपने अर्थशास्त्र में नए गाँव बसाने के संदर्भ में चाणक्य ने लिखा है कि किसी गाँव में शूद्रों की आबादी ज़्यादा होना अच्छी बात है क्योंकि उनका शोषण करना आसान है.

तो ऐसे में चाणक्य का समय मोदी के लिए स्वर्ण काल हो सकता है लेकिन दूसरे लोगों के लिए नहीं हो सकता है.

सिकंदर कभी बिहार नहीं गया

मोदी ने कहा कि बिहार के लोगों ने सिकंदर को मार भगाया जबकि सिकंदर कभी बिहार गया ही नहीं.

अगर इतिहास को गांधी मैदान में बैठकर गढ़ा जाए तभी ऐसी बातें निकल सकती हैं. नशे में इतिहास लिखा जाए तभी ऐसी बातें लिखी जा सकती हैं.

जहाँ तक साक्ष्यों की बात है तो सिकंदर ने सबसे प्रमुख लड़ाई पंजाब में झेलम के किनारे पोरस से लड़ी थी. उसके बाद उसकी सेना वापस चली गई. पूरब की तरफ तो वो कभी बढ़ा ही नहीं.

पर्दा प्रथा

इसी तरह एक बार प्रतिभा पाटिल ने कह दिया था कि मुसलमानों के इस देश में आने के बाद उनकी सेनाओं से हिन्दू औरतों को बचाने के लिए पर्दा प्रथा शुरू हुई.

हमारे यहाँ जो संस्कृति या प्राकृत साहित्य है उसमें कई जगह ऐसी चर्चा है जिसमें औरतें पर्दा कर रही हैं.

संस्कृत में एक शब्द है अवगुंठन, जिसका अर्थ ही है घूंघट.

संस्कृत नाटकों और ऐतिहासिक उपन्यासों में अंतःपुर का ज़िक्र है. अंतःपुर का मतलब है कि आइसोलेशन या आंतरिक स्थान है यानी एक तरह का पर्दा पहले भी था.

इसलिए पर्दा प्रथा को मुसलमानों से नहीं जोड़ना चाहिए था. इससे लोगों का दृष्टिकोण सांप्रदायिक हो गया.

नेताओं को यदि इतिहास के तथ्यों का प्रयोग करना भी है तो उन्हें गंभीर इतिहासकारों की सलाह लेकर ऐसा करना चाहिए, नहीं तो वो लाखों लोगों को ग़लत इतिहास बताते रहेंगे.

ग़रीबी बढ़ती जा रही है. पैसे वालों का धन बढ़ता जा रहा है. साफ है कि देश बहुत सुखी या अच्छे रास्ते पर नहीं जा रहा है.

मुझे उम्मीद नहीं है कि आने वाले समय में कोई इतिहासकार इस समय को अच्छा युग कहेगा. कम से कम फिलहाल तो यही लगता है.

(इतिहासकार डीएन झा प्राचीन भारत के इतिहास के जानकार हैं. यह लेख बातचीत बीबीसी संवाददाता राजेश जोशी से की गई बातचीत पर आधारित है.)

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