कहाँ जाकर रुकेगी भारत की महंगाई?

मशहूर अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन ने कहा था कि महंगाई हमेशा से और हर जगह एक मौद्रिक घटना रही है.

अभी हाल ही में दिग्गज अर्थशास्त्री पॉल क्रूगमैन ने महंगाई को 'मात्र' मौद्रिक घटना न बताते हुए इसे हमेशा से 'गंभीर राजनीतिक और सामाजिक विघटन' से जुड़ी घटना करार दिया.

यह कहना मुश्किल है कि लगातार महंगाई की मार झेल रहे भारत का ऐसे सामाजिक और राजनीतिक बाधाओं से कुछ लेना-देना है या नहीं.

इसके बावजूद कई लोग देश की कमज़ोर सरकार को इसके लिए ज़िम्मेदार मानते हैं जो कि भ्रष्टाचार, गलत नीतियां बनाने, धार्मिक हिंसा को रोकने और संसद में गतिरोध को तोड़ने में नाकाम रहने के आरोपों से घिरी हुई है.

आंकड़े

रुपयाः कैसे संभलेगा? संभलेगा क्या?

लगभग चार सालों से भारत में महंगाई लगातार बढ़ती ही जा रही है. इसके कारण चीज़ों की कीमतें बढ़ी हैं, लोगों की बचत घटी है. महंगाई की सबसे ज़्यादा मार ग़रीबों पर पड़ी है और मध्यम वर्ग का जीवन बहुत मुश्किल हो गया है.

अगस्त 2009 से अगस्त 2013 के बीच थोक मूल्य मुद्रास्फीति औसतन आठ प्रतिशत से ज़्यादा रही है.

Image caption उचित भण्डारण न होने के कारण भारत में हर साल बड़ा मात्रा में अनाज खराब हो जाता है.

वहीं बाज़ार और दुकान की कीमतों को दर्शाने वाली उपभोक्ता मुद्रास्फीति जनवरी 2012 से लेकर अब तक 7.65 फीसदी से 10.91 फीसदी के दायरे में रही है.

यद्यपि ईंधन और खनिजों के दाम भी बढ़े हैं, लेकिन अर्थशास्त्रियों का कहना है कि भारत में महंगाई की मुख्य वजह खाद्य पदार्थों की बढ़ती क़ीमतें हैं.

अर्थशास्त्री डॉक्टर स्थानु आर नायर ने भारत की लगातार बढ़ती महंगाई पर एक पेपर लिखा है. उनका कहना है, ''पिछले छः सालों के दौरान खाद्य पदार्थों में बढ़ी महंगाई पूरी तरह से अस्वीकार्य है. ऐसा तब है जबकि खाद्य कीमतों में वैश्विक स्तर पर कमी आई है.''

ग्रामीण हैं जिम्मेदार?

विशेष रूप से दिसम्बर 2009 से अगस्त 2013 के दौरान अंडे, मांस और मछली, फलों, दूध, सब्ज़ियों और दूध के दामों में दस प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी हुई है. मांस और मछली के दाम में तो 17 प्रतिशत से भी ज़्यादा वृद्धि दर्ज की गई है.

नायर का कहना है, ''देश में कुपोषण, गरीबी और खाद्य पदार्थों पर होने वाले खर्च को देखकर कहा जा सकता है कि महंगाई के रुझानों ने कल्याणकारी योजनाओं पर बहुत बुरा प्रभाव डाला है.''

खाद्य कीमतों की बढ़ती कीमतों के लिए ग्रामीणों की बढ़ती आय को ज़िम्मेदार ठहराया गया है. पिछले पाँच सालों में सालाना मज़दूरी 20 प्रतिशत तक बढ़ गई है जिसने ग्रामीणों में प्रोटीन युक्त आहार लेने को उत्साहित किया है.

इससे यह पता चलता है कि गांवो और शहरों दोनों जगह लोग अब दूध, दाल, अंडे औऱ मांस पर ज़्यादा ख़र्च कर रहे हैं.

भारत की इस बढ़ती महंगाई के और भी कई कारण हैं.

अपर्याप्त भंडारण व्यवस्था

भारत में बहुत सारा अनाज अपर्याप्त और कम गुणवत्ता वाली भंडारण सुविधाओं के चलते सड़ जाता है.

हाल ही में ब्रिटेन स्थित मैकेनिकल इंजीनियर्स इंस्टीट्यूशन द्वारा एक ताज़ा रिपोर्ट में बताया था कि भारत में हर साल खेत से ग्राहकों तक पहुँचने के दौरान अपर्याप्त कोल्ड स्टोरों के कारण 40 प्रतिशत फल औऱ सब्जियां ख़राब हो जाते हैं.

चारा, बिजली, डीज़ल और उर्वरकों की बढ़ती कीमतों के कारण अनाज का उत्पादन भी महंगा हो गया है. कम उत्पादन और कम जोत वाली किसानी ने स्थिति को और बदतर बना दिया है.

डॉक्टर नायर ने कहा, "इन रुझानों को देखते हुए इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि महंगाई बढ़ाने में इनकी भी भूमिका रही है."

बढ़ती मुद्रास्फीति एशिया की तीसरी सबसे अर्थव्यवस्था के लिए बहुत बुरी ख़बर है.

इससे भारत के विकास को गहरा धक्का लगा है. पिछली तिमाही में भारत की विकास दर पिछले तीन सालों में सबसे कम 4.4 प्रतिशत रही. इससे चिंतित भारतीय रिज़र्व बैंक ने मुद्रास्फीति से लड़ने के लिए इस सप्ताह लगातार दूसरे महीने ब्याज दरों में बढ़ोतरी की.

सरकार को उम्मीद है कि कृषि उत्पादन में बढ़ोतरी और रुपए की कीमत में आई गिरावट से निर्यात बढ़ने से साल के अंत तक आर्थिक वृद्धि दर बढ़ जाएगी. लेकिन बहुत से अर्थशास्त्री सरकार की इस बात से इत्तेफ़ाक नहीं रखते हैं.

उनका मानना है कि भारत कुछ और समय तक महंगाई औऱ गिरती वृद्धि दर के चक्र में फंसा रहेगा.

Image caption अंडे, मांस, मछली जैसे खाद्य पदार्थों की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं.

अर्थशास्त्रियों का तर्क

विश्व बैंक के प्रमुख अर्थशास्त्री कौशिक बसु का मानना है कि यदि उच्च वृद्धि दर समान रहती है तो भारत महंगाई की मार को झेल सकता है. वह 10 प्रतिशत महंगाई और 11 प्रतिशत वृद्धि दर का पक्ष लेते हैं.

वह दक्षिण कोरिया का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि 1970 के दशक के दौरान महंगाई के 20 प्रतिशत तक बढ़ जाने के बाद भी उसने अपनी अर्थव्यवस्था को बचा लिया था.

नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन और ज्यां द्रेज़ ने अपनी नई किताब 'एन अनसर्टेन ग्लोरी' में लिखा है कि भारत की तेज़ विकास की जरूरत अभी पूरी नहीं हुई है. उनका कहा है कि दो दशक के सतत विकास के बावजूद भारत अब भी दुनिया के सबसे गरीब देशों में से एक है.

वो कहते हैं कि भारत की अब प्रति व्यक्ति आय अब भी उप सहारा अफ्रीका से बाहर के अधिकांश देशों की तुलना में कम है. लेकिन भारत को सतत विकास के रथ पर सवार होने से पहले मुद्रास्फीति पर अंकुश लगाने की ज़रूरत है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार