ख़ुद पर भरोसे ने बनाया तक़दीर का शहंशाह

  • 5 नवंबर 2013
सत्य नारायणन
Image caption सत्य नारायणन युवावस्था में क्रिकेटर बनने का सपना देखते थे. (रेखांकन - अनीता बालचंद्रन)

करियर लॉंचर के संस्थापक सत्य नारायणन ने कुछ इस तरह से बताई अपनी ज़िंदगी की कहानी- उन्हीं के शब्दों में.

हमें घर में हमेशा सिखाया गया कि हम जीवन में कुछ भी कर सकते हैं. इसके लिए ज़रूरत है तो सिर्फ़ अपने जीवन की कमान ख़ुद मज़बूती से संभालने की.

हम आंध्र प्रदेश के उत्तर-पूर्वी छोर पर बसे नगर श्रीकाकुलम में रहते थे. अप्पा (पिता) ने नौकरी की शुरुआत बिजली विभाग में बतौर अटेंडेंट की थी. बाद में उनकी नियुक्ति डाक तार विभाग में टेलीग्राफ़िस्ट के रूप में हो गई और तरक्की करके वो टेलीग्राफ़ मास्टर बन गए थे. अप्पा को पढ़ाना पसंद था. स्कूली लड़के हमारे घर गणित पढ़ने आते थे.

मेरे ताता (दादाजी) भी एक शिक्षक थे. हमारी दादी यानी पाटी अपने वक़्त और दौर से आगे की एक बिंदास महिला थीं. वे अक्सर कावेरी नदी में तैरा करती थीं. उनमें दिलचस्प कहानियां बनाने और सुनाने का हुनर बहुत ख़ूब था.

हमारे परिवार में एक हमारी मां ही थीं जिनमें एक कारोबारी का जज़्बा था. वो मज़बूत इरादों वाली जोशीली महिला थीं. सच कहूं तो मुझे हमेशा लगा कि अम्मा, अप्पा से कहीं ज्यादा योग्य थीं.

आज जब मैं पलट कर ज़िन्दगी को देखता हूँ तो महसूस होता है कि कि मेरे माता-पिता बहुत ही गज़ब के लोग थे. उनका बस एक ही लक्ष्य था और वो था अपने बच्चों के सामने आदर्श माता-पिता बनना.

घर से स्कूल

मैंने पढ़ाई की शुरुआत घर के नज़दीक मरथाम्मा नाम की टीचर की देखरेख में की थी. तीसरी कक्षा से मैंने नेहरु मेमोरियल हाई स्कूल जाना शुरू किया.

स्कूल आने जाने के लिए घंटा भर पैदल चलना पड़ता था. दोपहर में स्कूल से आने के बाद हम घंटों तेलुगु भाषा की कॉमिक 'अमर चित्र कथा' में डूबे रहते थे. हम लूडो, सांप सीढ़ी और व्यापार, कैरम, कंचे, गुल्ली-डंडा खेलते थे.

मैं साइकिल का पुराना टायर भी चलाता था. फिर एक समय आया जब क्रिकेट मेरा जुनून बन गया. एक दिन स्थानीय क्रिकेट क्लब के एक अधिकारी ने हमें खेलते देखा और हमें क्लब में भर्ती कर लिया. हमारी क्लब फ़ीस भी माफ़ कर दी.

मैं 13 साल का था जब हम मेरठ शिफ्ट हुए थे. वहां जाकर मेरा क्रिकेट प्रेम गंभीर रुचि में तब्दील होने लगा था. उसी समय स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया ने दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में एक ट्रायल कैम्प लगाया.

कैम्प में शामिल हुए 1500 बच्चों में से मात्र तीस को 45 दिन के प्रशिक्षण शिविर के लिए चुना गया. इस कैम्प के बाद मुझे बेस्ट ट्रेनी का ख़िताब मिला.

हमारे कोच और भारतीय टीम के पूर्व कप्तान बिशन सिंह बेदी ने मेरे अप्पा से कहा कि मेरे क्रिकेट के हुनर को देखते हुए हमारे परिवार को दिल्ली आकर बस जाना चाहिए.

बिशन सिंह ने मेरा दाखिला दिल्ली के एक ऐसे स्कूल में करवाया था जहां ज़्यादातर बच्चे अमीर घरानों से थे. यह इकलौता ऐसा स्कूल था जिसने मुझे 'घटिया' करार दिया था.

स्कूल के कई शिक्षक किसी भी बच्चे को कमतर महसूस कराने में माहिर थे. मैं ऐसे स्कूल में पढ़ रहा था जहाँ बच्चों के संग उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि के हिसाब से बरताव किया जाता था.

आखिरकार मैंने वो स्कूल छोड़ दिया और दिल्ली के एक खालिस क्रिकेटपरस्त दयानंद एंग्लो वैदिक (डीएवी) स्कूल में दाखिला ले लिया.

मेरा वहाँ दिल खोल कर स्वागत हुआ. हमारे प्रिंसिपल सर हर मैच देखने आते थे. मुझे आज तक उनकी वो शाबाशी याद है जो हमें साल 1986 में सरदार पटेल विद्यालय को हराने पर मिली थी. हमने गगन खोड़ा, अजय जडेजा, विवेक राजदान जैसे स्टेट लेवल के खिलाड़ियों की टीम को हराया था.

स्कूल से कॉलेज और करियर लॉन्चर

स्कूल में पढ़ाई के दौरान ही अचानक मेरी दिलचस्पी इम्तिहान में अच्छे नंबर लाकर सेंट स्टीफन्स कॉलेज में दाखिला लेने में हो गई.

मैंने अपने आप से वादा किया कि मैं सेंट स्टीफन्स कालेज में स्पोर्ट्स कोटा के ज़रिए नहीं जाऊँगा.

मुझे स्टीफ़न्स में दाखिल मिल भी गया और मैंने वहाँ तीन साल क्रिकेट खेला. लेकिन अब तक यह बात मेरे ज़ेहन में साफ़ हो गई थी कि मैं इंडियन टीम में नहीं खेल पाऊंगा.

Image caption रेखांकन - अनीता बालचंद्रन

मैंने अपने आप को समझाया कि तुममे वो बात नहीं है. ऐसे में मेरे लिए एक सख़्त फैसला लेना ज़रूरी था.

सेंट स्टीफन्स, करियर लॉन्चर और आईआईएम स्पष्ट तौर से मेरे लिए दूसरा जीवन जीने जैसा था.

मैं अपने पहले जीवन यानी क्रिकेट में असफल रहा था. असफल तो कोई भी हो सकता है, यह उतनी भी बुरी बात नहीं है. लेकिन असफल होने के बाद आप किन विकल्पों को चुनते हैं ये आपके हाथ में है.

खेल का सबक

खेल ऐसा अनुभव है जो मैदान पर उतरते ही सबको एक बराबर ज़मीन पर ला कर खड़ा कर देता है.

Image caption पिता के ट्रांसफर से पहले तक सत्य नारायणन अपने भाई के साथ एक साल तक दिल्ली में रहे. (रेखांकन - अनीता बालचंद्रन)

खेल शायद दुनिया का इकलौता ऐसा पेशा है जिसे आप अपने बच्चों को विरासत में नहीं दे सकते.

आज जब मैं पलट कर पीछे देखता हूँ तो मुझे अपने जीवन में खेल की भूमिका एक अध्यापक की भूमिका की तरह लगती है.

मैं हमेशा से ही ऐसे लोगों की इज्ज़त करता रहा हूँ जो अपनी काबलियत, अपने हुनर को आखिरी हद तक भुनाने की कोशिश में लगे रहते हैं. दूसरे क्या कर रहे हैं यह ज़्यादा मायने नहीं रखता. असल बात यह है कि आपने अपने जीवन से क्या सीखा, आपने जीवन में किन विकल्पों का चुनाव किया.

नौजवान लोग हर जगह एक से ही होते है. दुनिया पर असर डालने का सबसे सटीक तरीका है दुनिया के नौजवानों पर ध्यान केन्द्रित करना, उन पर असर डालना, बड़े बुजुर्गों पर नहीं.

इसके लिए ज़रूरी है कि बड़े लोग नौजवानों के रास्ते में न आएँ. हम अक्सर अपनी रूढ़िवादी सोच और नज़रिया बच्चों पर थोपने की कोशिश करते हैं.

यदि मुझे बच्चों को कोई संदेश देना हो तो मैं तो यही कहूँगा कि बच्चों तुम अपने आप पर भरोसा रखो.

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