'आख़िर यह बिचार कब होबे?' से शुरू हुआ लम्बा सफ़र

सुब्रतो बागची, अनीता बालचंद्रन का रेखांकन
Image caption सुब्रतो अपने पिता से गहराई से जुड़े हुए थे. रेखाचित्र- अनीता बालचंद्रन.

सुब्रतो बागची अंतर्राष्ट्रीय सॉफ्टवेयर सर्विस कंपनी माइंडट्री के प्रबंधक बोर्ड के चेयरमैन हैं.

वह एक मशहूर लेखक भी हैं और कई राष्ट्रीय अख़बारों और पत्रिकाओं में उनके लेख प्रकाशित होते रहे हैं.

सन 2011 में उनकी लिखी 'द हाई परफॉर्मेंस आंत्रप्रेन्योर', 'गो किस द वर्ल्ड' और 'द प्रोफेशनल' जैसी किताबों की धुआंधार बिक्री के बाद उन्हें भारत के सफलतम बिज़नेस लेखक के ख़िताब से भी नवाज़ा गया है.

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ज़िंदगी की क़िताब के पन्ने पलटते हुए सुब्रतो बीते दिनों में खो से गए. अपने भावनाएँ उन्होंने कुछ इन शब्दों में ज़ाहिर कीं.

"अपने पिता से जुड़ी मेरी सबसे पहली स्मृति उन्हें काम पर जाने के लिए तैयार होते हुए देखना है. वह इस तरह तैयार होते थे मानो उस काम से ज़्यादा कोई और ज़रूरी चीज़ इस दुनिया में हो ही न. मेरे पिता एक मजिस्ट्रेट थे और मुझे मालूम था कि उनका काम इंसाफ़ करना है. मैं भी उन्हें उन सब लोगों के ख़िलाफ़ शिकायतें सुनाया करता था जिन्होंने दिन भर में मुझे नाराज़ किया होता था. शिकायतों की फ़हरिस्त ख़त्म होते ही वह अपने बंगाली अंदाज़ में कहते, 'बिचार होबे'."

सवाल

"मैं एक होशियार बच्चा था. एक दिन मैं उनसे भिड़ गया और मैंने कहा, 'हर रोज़ आप मुझसे कहते रहते हैं बिचार होबे, बिचार होबे. आख़िर यह बिचार कब होबे?' मेरी बात सुन कर उन्होंने मुझे मेरी सारी शिकायतें एक कागज़ पर लिखने के लिए कहा. बस फिर क्या था, मेरी क़लम चल पड़ी. 'आज बुलबुल ने मुझे चूंटी काटी', 'आज नन्टू ने मेरी पेंसिल छीन ली'... वग़ैरह-वग़ैरह."

'स्कूलों में परखनली तक नहीं'

"एक दिन तो मैंने अपनी माँ की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठा दिया था. एक बारात को देखने के बाद मैंने माँ से सवाल किया, 'यह सब क्या हो रहा है?' माँ ने कहा, 'ये लोग शादी का जश्न मना रहे हैं.' मैंने पूछा, 'शादी क्या होती है?' मां ने जवाब दिया, 'सारे आदमी और औरतों की शादी होती है."

"अब मैंने एक और सवाल दाग़ा, 'क्या आपकी भी शादी हुई है?' माँ तुनककर बोलीं, 'बिलकुल, मेरी तुम्हारे बाबा से शादी हुई है."

"माँ के इस जवाब ने मुझे परेशान कर दिया. उस समय मेरा बाल मन इस बात की कल्पना भी नहीं कर पा रहा था कि मेरे पिता भी बारात के उस दूल्हे की तरह पूरे जोशो-ख़रोश से नाचे होंगे."

"उस दिन जैसे ही पिताजी काम से वापस लौटे मैंने उनसे कहा, 'मां ने आज मुझे आपके बारे में एक बहुत ही घटिया बात बताई है.' उन्होंने पूछा, 'माँ ने क्या बताया है?' 'उन्होंने कहा है कि आपने उनसे शादी की है!"

दिमाग़ के अँधेरे

Image caption रेखाचित्र- अनीता बालचंद्रन

"मेरे पिता बाइपोलर डिसॉर्डर से पीड़ित थे. दरअसल मैं यह नहीं जानता कि वो इस मानसिक बीमारी के शिकार थे भी या नहीं. बचपन में मैंने लोगों को पिताजी की बीमारी को स्किट्ज़ोफ़्रेनिया बताते हुए भी सुना था."

"उस समय इस तरह के विकारों को बहुत संकुचित तरीक़े से देखा जाता था. जैसे जैसे लोग मनोविज्ञान और इससे जुड़े विकारों के बारे में जानने समझने लगे वैसे वैसे यह कहा जाने लगा कि शायद मेरे पिताजी को बाइपोलर या स्किट्ज़ोफ़्रेनिया नहीं था. मैं सच में नहीं जानता कि पिताजी मानसिक विकृति, स्किट्जोफ्रेनिया या पागलपन के या इन सभी के शिकार थे."

अमीर इंडिया के गरीब भारतीय

"दस साल की उम्र तक मुझे अंदाज़ा भी नहीं था कि मेरे पिता को कोई तकलीफ है. शुरूआती समय में यह तकलीफ पिताजी के उग्र व्यवहार के तौर पर सामने आती थी, हम बच्चों के प्रति नहीं बल्कि अजनबी लोगों के साथ."

"हालत बिगड़ने पर पिताजी को रांची के मानसिक चिकित्सालय में ले जाया जाता था. वहाँ ले जाने के लिए उन्हें नीम बेहोश करना पड़ता था क्योंकि अपनी मर्ज़ी से वो वहाँ जाने को कभी तैयार नहीं होते थे."

माँ को मोतियाबिंद

"वहां उन्हें बिजली के झटके दिए जाते थे. शुरू में तो उन्हें उस अस्पताल में दस साल में एक बार भेजा जाता था फिर पांच सालों में एक बार भेजा जाने लगा. धीरे-धीरे यह समय और भी कम होता गया."

"पिताजी रांची में दो-दो महीनो तक रहते लेकिन अपने इस प्रवास के दौरान वो हमें चिठ्ठी ज़रूर लिखते. मेरी माँ उस चिठ्ठी का जवाब भेजती. मेरी माँ को मोतियाबिंद था इसलिए वो चिठ्ठी मुझसे लिखवाती थीं."

"एक दिन मैं वहाँ उस अस्पताल में फिर से जाना चाहता हूँ. उस जगह को, वहाँ मौजूद मेरे पिता की बीमारी के रिकॉर्ड्स को एक वयस्क की नज़र से देखना चाहता हूँ."

"मेरे पिता हमेशा कहते थे, 'किसी भी चीज़ की अहमियत कम मत समझो. हर मुद्दे को बारीक़ी से देखो समझो.' वो एक सच्चे और ईमानदार व्यक्ति थे. उन्होंने कभी किसी को दुःख नहीं पहुँचाया. तकलीफ नहीं दी सिवाय उस समय के जब वो मानसिक रूप से तकलीफ में थे. पिताजी ने कभी शराब नहीं पी थी, कभी कोई नशा नहीं किया था."

"समय के साथ साथ मेरे पिता का आत्मबोध भी बढ़ता गया. धीरे-धीरे उनकी विशेष भावनात्मक कामनाएं ख़त्म होती चली गयीं और वो दूसरों और खुद अपने साथ ज्यादा धैर्यवान होते चले गए."

प्रतिबिंब

Image caption सुब्रतो कहते हैं कि कुछ नया करने के लिए आशावाद जरूरी है. रेखाचित्र-अनीता बालचंद्रन.

"आशावाद और ख़ुद पर स्वामित्व बहुत भारी भरकम शब्द हैं. लेकिन क्या इन शब्दों में कोई सच्चाई है? मतलब क्या ये शब्द कारगर हैं? क्या इनका वाकई में कोई अर्थ है? मुझे लगता है कि यह शब्द कुछ हद तक सच है. क्योंकि इतने गहरे भाव वाले शब्द गलत ना हों तो बेहतर है."

"हमें कुछ नया रचने के लिए आशावादी होना ज़रूरी है और इस आशावाद पर स्वनियंत्रण या स्व-स्वामित्व होना और भी ज़रूरी है."

"यह विश्वास बहुत महत्वपूर्ण है कि आप वही हैं जो आपके भीतर की आग आपको बनने के लिए कहती है. जो भीतर की आग कहे वही मन की इच्छाशक्ति है, जो इच्छाशक्ति है वही कर्म है, जो कर्म है वही भाग्य है."

"यह विश्वास हमें अपने आप पर तरस खाने से बचाता है. हम अपनी परिस्थितियों को अपनी सोच और अपने कर्म से बदल सकते हैं."

"स्नायुविज्ञान ने यह साबित कर दिया है कि मस्तिष्क प्लास्टिक की तरह है. मस्तिष्क को साधा जा सकता है. उसे आप जिस रास्ते ले जाना चाहते हैं, उस रास्ते ले जा सकते हैं और मस्तिष्क को ही नहीं बल्कि आपकी इच्छाशक्ति और कर्म को भी."

"वे लोग जो चेतन और अवचेतन मन के अवरोधों को पार कर पाते हैं उनमें एक अलग तरह की ख़ासियत होती है."

"दिमाग़ी बीमारी से जुड़े मानवीय व्यवहार को सबसे कम समझा गया है और ये सबसे कलंकित माना गया पहलू है."

"मैंने दिमाग के ये दांव-पेंच अब समझने शुरू किए हैं. मैं अपने पिता की संतान हूँ और मैं आज जो भी हूँ जैसा भी हूँ उसके लिए अपने पिता का शुक्रगुज़ार हूँ."

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