जिसका वोट नहीं उसकी कोई पूछ नहीं

मुरिया और माड़िया आदिवासी

माडवी जोगा राव की उम्र 35 के आस-पास है. उन्होंने अपनी ज़िन्दगी में कभी भी वोट नहीं डाला है. जोगा ही नहीं उनके साथ आंध्र प्रदेश के खम्मम ज़िले में छत्तीसगढ़ से आकर बसने वाले ज़्यादातर आदिवासी ऐसे हैं जिन्होंने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन कभी देखी ही नहीं है.

खम्मम ज़िले के भद्राचलम से 35 किलोमीटर दूर पालवनचा के जंगलों में छत्तीसगढ़ से पलायन कर आए इन आदिवासियों से लोकतंत्र का दरवाज़ा आज भी काफी दूर है.

सुकमा ज़िले के सुदूर गाँवों से आए ये परिवार जब छत्तीसगढ़ में रहा करते थे तो माओवादियों के चुनाव बहिष्कार के आह्वान की वजह से वो अपना मत नहीं डालते थे.

फिर हालात बिगड़ने लगे और इन परिवारों ने खुद को नक्सलियों और सुरक्षा बलों के बीच चल रही झड़प में पिसता हुआ पाकर हमेशा के लिए छत्तीसगढ़ को अलविदा कह दिया.

अब ये परिवार भद्राचलम के कोईगुट्टू में आकर बस तो गए हैं, मगर इनके हालात जस के तस हैं. इनके लिए कुछ भी नहीं बदला है. मुश्किलभरी ज़िन्दगी और उपेक्षा इनकी नियति बन गई है.

कोई पूछनहार नहीं

गाँव के प्रधान पदम पेंटा कहते हैं कि जब वो लोग सुकमा के सुदूर इलाकों में रहा करते थे तो वहाँ कभी कोई सरकारी अधिकारी या नेता उनका हाल-चाल पूछने उनके गाँव कभी नहीं आता था.

अब आंध्र प्रदेश में आकर अपनी बस्ती बसाने की कोशिश इन लोगों ने की तो ज़रूर, मगर यहाँ भी इनका हालचाल पूछने कोई नहीं आता.

"हमारे लिए क्या बदला है? कुछ भी तो नहीं. वहाँ भी हमारा कोई नहीं था. यहाँ भी हमारा कोई नहीं है." पेंटा ने बीबीसी से बात करते हुए अपना दर्द कुछ इस तरह बयान किया.

खम्मम ज़िले में कोईगुट्टू की तरह ही छत्तीसगढ़ से पलायन कर आए मुरिया और माड़िया आदिवासियों की दो सौ से ज़्यादा बस्तियाँ हैं.

लगभग एक लाख से ज़्यादा आदिवासी छत्तीसगढ़ से आकर इन इलाकों में बस गए हैं.

ये आंकड़ा ज़्यादा भी हो सकता है क्योंकि अभी तक सरकार ने इस बारे में कोई सर्वे नहीं करावाया है.

रात का वक़्त है और कोईगुट्टू तक गाड़ी नहीं जाती है. लिहाज़ा यहाँ तक का सफ़र पैदल ही तय करना पड़ता है.

लालटेन की रोशनी

अपने हाथों में टॉर्च लेकर कोईगुट्टू के कई लोग मुझे लेने जंगल के बाहर आए थे. काफी दूर तक जंगल के बीच से होते हुए पैदल ही जब मैं कोईगुट्टू पहुँचा तो कुछ साफ़ नज़र नहीं आ रहा था.

फिर कच्चे मकानों से लालटेन की रोशनी नज़र आई. गाँव वाले मेरा इंतज़ार कर रहे थे. गाँव की महिलाओं ने पारंपरिक तरीके से मेरा स्वागत किया.

उनके लोक गीत में इनका दर्द साफ़ झलक रहा था.

एक-एक कर पचास से ज़्यादा घरों के लोग इकठ्ठा होने लगे.

इस भीड़ में शामिल वेंकटेश ने बताया कि कोईगुट्टू में बिजली आने के कोई आसार नहीं हैं क्योंकि ये सुरक्षित वन का इलाका है.

यही वजह है कि इन्हें आंध्र प्रदेश की सरकार की किसी कल्याणकारी योजना का लाभ नहीं मिल सकता है. उनका कहना है कि दूसरी जगहों से आने वाले ज़्यादातर आदिवासी सुरक्षित वन के इलाकों में ही आकर बसे हैं.

छत्तीसगढ़ में कोरवा, माड़िया और मुरिया प्रमुख जनजातियाँ हैं. मगर आंध्र प्रदेश में आकर बसने वालों को जनजाति का दर्जा भी हासिल नहीं है.

गाँव के बुज़ुर्गों का कहना है कि उनके बच्चों के लिए शिक्षा की भी कोई व्यवस्था नहीं की गई है. कुछ स्वयंसेवी संस्थानों ने आदिवासियों के बच्चों को पढ़ाने के लिए पहल की तो थी, मगर आंध्र प्रदेश सरकार के फ़रमान के बाद उन्हें ये काम बंद करना पड़ा.

सलवा जुडूम

माडवी जोगा ने बताया कि 'सलवा जुडूम' जब अपने परवान पर था तो सुकमा के सुदूर इलाकों में रहने वाले लोगों पर काफी ज़ुल्म हुए. आदिवासियों ने खुद को दो पाटों के बीच पिसता हुआ पाया.

वो कहते हैं: "आए दिन कभी माओवादियों के फरमान तो कभी सलवा जुडूम के लोगों का हमला. हमारी ज़िन्दगी तो नर्क बन गई थी. हम और हमारे बच्चे हमेशा डर के साए में जीने को मजबूर थे. इसलिए हमने अपने खेत-खलिहान और घरों को छोड़कर भाग जाने में ही भलाई समझी."

गाँव की रहने वाली महिलाएँ कहती हैं कि अब वो कभी छत्तीसगढ़ लौटकर नहीं जाना चाहती है. गाँव की एक महिला ने कहा,"वहाँ तो हम डर-डर कर जीते थे. यहाँ कम से कम हम सुरक्षित तो हैं. अब हमलों का तो डर नहीं है."

मगर इस इत्मीनान के बावजूद एक बात इन आदिवासियों को अभी भी कचोटती है और वो है छत्तीसगढ़ के अधिकारियों और नेताओं की बेरुखी. इतने सालों में आदिवासियों की इतनी बड़ी आबादी के पास न तो छत्तीसगढ़ का कोई अधिकारी ही आया न ही नेता.

किसी ने इनकी घर वापसी के लिए न कोई प्रयास किया और न ही इनका हालचाल पूछा.

नेताओं और अधिकारियों के लिए ये आदिवासी शायद इसलिए कोई मायने नहीं रखते क्योंकि इन्होंने कभी वोट नहीं डाला. इनके वोट की किसी को ज़रूरत भी नहीं.

बहरहाल, इन आदिवासियों की भागीदारी के बिना भी नेता चुने जाते रहेंगे और सरकारें भी बनती रहेंगी.

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