बस्तर: लोगों से दूर होता लोकतंत्र

छत्तीसगढ़ में चुनाव

बस्तर के आदिवासियों से लोकतंत्र हमेशा ही दूर रहा है और अब तो वो इसे और भी ज़्यादा दूर खिसकता हुआ महसूस कर रहे हैं. इस संभाग का एक बड़ा हिस्सा ऐसा है जहाँ आज़ादी के बाद से सरकारें नहीं पहुँच पाई हैं.

इतने साल बाद भी हालात कुछ बेहतर नहीं हुए हैं.

छत्तीसगढ़ में होने वाले विधानसभा चुनाव के पहले चरण के लिए 11 नवंबर को वोट डाले जाएंगे और बस्तर संभाग में सुरक्षा के दृष्टिकोण से लगभग 169 मतदान केंद्रों को बदल दिया गया है.

ये केंद्र पहले गाँव और पंचायतों में ही हुआ करते थे. मगर अब इन्हें ये कहकर हटा दिया गया है कि यहाँ मतदान कर्मियों और सुरक्षा बलों के जवानों को भेजना नामुमकिन है.

इस फेरबदल में सबसे ज्यादा बीजापुर ज़िले के 59 मतदान केंद्र प्रभावित हुए हैं जबकि सुकमा ज़िले के 42. उसी तरह दंतेवाडा के 24 और नारायणपुर के 16 मतदान केंद्रों को बदला गया है.

प्रशासनिक अधिकारियों की दलील है कि कई गाँव ऐसे हैं जहाँ मतदान कर्मियों को पैदल जाने में भी कई दिन का समय लगेगा.

लोकतंत्र का मज़ाक़

माओवादियों के बहिष्कार और ख़ुफ़िया एजेंसियों की रिपोर्ट के बाद प्रशासनिक अधिकारियों ने चुनाव आयोग से इन बूथों को बदलने की सिफ़ारिश की थी. दलील यह थी कि इनमें से ज़्यादातर बूथों पर एक भी वोट नहीं पड़ा था.

ऐसे में सवाल उठता है कि जब मतदान केंद्र गावों में स्थित हुआ करते थे और वहां मतदान नहीं होता था तो क्या फिर इन्हें बदले जाने के बाद मत पड़ पाएंगे?

कई ऐसे बूथ है जिन्हें गाँव से 40 से 60 किलोमीटर दूर ले जाया गया है और इन इलाक़ों में आवाजाही के साधन नहीं हैं.

दंतेवाड़ा से भारत की कम्युनिस्ट पार्टी यानी सीपीआई के बोमड़ाराम कोवासी का आरोप है कि बूथों को 40 से 60 किलोमीटर दूर कर दरअसल लोकतंत्र को ही लोगों से दूर कर दिया गया है.

वे कहते हैं, "सरकार के पास संसाधन हैं और वो तब भी वहां नहीं पहुँच पा रही है. तो क्या जो ग़रीब आदिवासी, जिनके पास कोई संसाधन नहीं है, मत डालने के लिए 60 किलोमीटर का सफ़र तय कर सकते हैं? ये लोकतंत्र का मज़ाक़ है और इसमें चुनाव आयोग की भी भागेदारी है."

सुरक्षा की चुनौती

बस्तर में तैनात पुलिस के अधिकारी विनय सिंह बघेल कहते हैं कि बूथों को इसलिए बदला गया है क्योंकि पूरे इलाक़े में माओवादियों ने बारूदी सुरंगों का जाल बिछा दिया है. वो कहते हैं कि चुनाव के दौरान माओवादियों द्वारा बड़े पैमाने पर हिंसा फैलाने की योजना है.

Image caption माओवादियों ने चुनाव का बहिष्कार किया है

बघेल के अनुसार, "ये देखा गया है कि माओवादी मतदान संपन्न कराकर लौट रहे कर्मचारियों और सुरक्षा बलों के जवानों पर हमला करते हैं. कई इलाक़े बहुत सुदूर हैं और वहां जाने का रास्ता नहीं है. ऐसे में मतदान के लिए जाने वाले कर्मचारियों और जवानों के लिए यह जोखिम भरा काम होगा."

वो कहते हैं कि बूथों को बदलकर जान के नुक़सान को कम किया जा सकता है.

मगर दंतेवाडा से प्रकाशित 'बस्तर इम्पेक्ट' अख़बार के संपादक सुरेश महापात्र कहते हैं कि प्रशासन की यह दलील खोखली है. उनका कहना है कि वैसे तो अधिकारी और नेता पांच सालों में कभी इन सुदूर इलाक़ों में नहीं जाते हैं. कम से कम चुनाव के वक़्त इन इलाक़ों में इनके दर्शन हुआ करते थे. अब वह भी नहीं होगा.

वो कहते हैं, "सरकार ख़ुद इन आदिवासियों से दूर जा रही है."

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