लंदन रिटर्न राजा का सिक्का चलेगा छत्तीसगढ़ चुनाव में?

  • 10 नवंबर 2013

छत्तीसगढ़ में बस्तर के राजा कमलचंद भंजदेव का दावा है कि उनकी प्रवीर सेना में 27 लाख आदिवासी हैं. गांवों में कई आदिवासी उन्हें ‘धरती पर ईश्वर का अवतार’ कहते हैं.

29 साल के कमल मुस्कुराते हुए कहते हैं, “आदिवासी मेरे पैर धो कर उसका पानी पीते हैं. वे मुझे अपना पिता मानते हैं लेकिन मैं अपने को सेवक कहता हूं.”

छत्तीसगढ़ के सर्वाधिक नक्सल प्रभावित बस्तर के बहुचर्चित राजा प्रवीरचंद भंजदेव के वंशज कमलचंद अब कमल यानी भाजपा के साथ हैं. कुछ महीने पहले ही उन्होंने भाजपा की सदस्यता ग्रहण की. लेकिन उनका दावा है कि वे राजनीति के लिए भाजपा में नहीं आए हैं.

चर्चा तो यह थी कि वे विधानसभा चुनाव लड़ेंगे, लेकिन कमलचंद केवल चुनाव प्रचार तक सीमित हैं. कमल कहते हैं, “मैं विधायक जैसे छोटे पद के लिए चुनाव लड़ूंगा, जिसे लाखों लोग भगवान मानते हैं ? कभी नहीं.”

'राजाओं के दिन गए'

हालांकि दक्षिण बस्तर के सुकमा इलाके में सीपीआई के नेता रामासोरी कमलचंद भंजदेव की बातों से सहमत नहीं है. वे कहते हैं, “अब राजाओं के दिन लद गए. कम से कम दक्षिण बस्तर में राजा का कोई असर नहीं है.”

इसी तरह दंतेवाड़ा के पत्रकार हेमंत कश्यप का भी कहना है कि इस इलाक़े में कमलचंद भंजदेव को पहचानने वाले लोग भी कम ही होंगे और जो प्रतिष्ठा प्रवीरचंद भंदजेव की थी अब नई पीढ़ी तो उसे भी भूल रही है.

वैसे देश के कई राज्यों से बड़े बस्तर की रियासत के राजा प्रवीरचंद भंजदेव आदिवासियों के बीच बेहद लोकप्रिय रहे हैं. रियासत में आदिवासियों के हित से जुड़े मुद्दे को लेकर प्रवीरचंद और मध्यप्रदेश सरकार की तनातनी भले इतिहास का मुद्दा रहा हो, लेकिन 25 मई 1966 को पुलिस की गोली से मारे गए प्रवीरचंद भंजदेव की लोकप्रियता अब भी बरकरार है.

बस्तर के घरों में प्रवीरचंद भंजदेव की तस्वीर रखने और उसकी पूजा करने वालों की संख्या कम नहीं है. आम जनता में किसी भी राजनेता से कहीं अधिक लोग राजा प्रवीर को जानते हैं.

राजा-रजवाड़ों के दिन लदने और प्रवीरचंद भंजदेव की मौत के बाद उनके महल की ताकत भले कम हुई हो, लेकिन उसका राजनीतिक महत्व अब भी बरकरार है.

यही कारण है कि जगदलपुर आने वाले अलग-अलग किस्म के बाबा और राजनेता अपना रुख महल की ओर करना नहीं भूलते. जिनमें श्रीश्री रविशंकर और बाबा रामदेव से लेकर नरेंद्र मोदी तक शामिल हैं.

लंदन से इंटरनेशनल बिजनेस की पढ़ाई और लंदन स्कूल ऑफ इकॉनामिक्स से राजनीतिशास्त्र के पोस्ट-ग्रेजुयेट कमलचंद 2010 में जब बस्तर लौटे तो उनके सामने बस्तर के देवपुरुष कहे जाने वाले प्रवीरचंद भंजदेव की पूरी विरासत थी.

'माओवादियों के मुद्दे पर चुप्पी'

प्रवीर सेना कमलचंद कहते हैं, “मुझे लगा कि राजा प्रवीरचंद आदिवासियों के जिन मुद्दों पर सरकार के साथ लड़ते हुए शहीद हुए थे, वे मुद्दे आज भी जस के तस हैं. इसके बाद मैंने उसी साल प्रवीर सेना का गठन किया और 27 लाख से अधिक आदिवासी इस सेना से जुड़ गए.”

अत्याधुनिक सेलफोन और लैपटॉप में उलझे कमलचंद भंजदेव बताते हैं कि प्रवीर सेना के गठन के बाद कांग्रेस, बसपा और भाकपा समेत तमाम राजनीतिक दलों ने उनसे संपर्क किया. लेकिन अंततः वे अपने समर्थकों समेत भाजपा में शामिल हो गए.

आज़ादी से पहले प्रवीरचंद भंजदेव ने बस्तर की 9 में से 8 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए थे और उन्हें विधानसभा में भेजा था. कमलचंद का मानना है कि वे उत्तर और मध्य बस्तर की जिन 6-7 सीटों पर चुनाव प्रचार कर रहे हैं, उनसे भाजपा के उम्मीदवार ही विधानसभा में पहुंचेंगे.

कमलचंद भंजदेव माओवादियों के मुद्दे पर कुछ भी नहीं बोलते लेकिन वे यह स्वीकार करते हैं कि अगर बस्तर में विकास होगा तो अपने आप शांति आ जाएगी. उनका मानना है कि आदिवासियों को गुणवत्तायुक्त नेतृत्व नहीं मिला.

केरल, दिल्ली जैसे राज्य और स्विटजरलैंड से भी बड़े बस्तर संभाग को अलग राज्य बनाये जाने के मुद्दे पर कमल कहते हैं- “ये सवाल बस्तर वासियों का है और आदिवासी ही इसका जवाब देंगे. जनता जो चाहेगी, हम वो करेंगे.”

लेकिन राजा से राजनेता बने कमलचंद भंजदेव की लोकप्रियता और उनके दावे इस चुनाव में दांव पर हैं. सोमवार को होने वाले मतदान में जनता का फैसला भारतीय जनता पार्टी के कमल के साथ-साथ राजा कमलचंद भंजदेव के भविष्य का भी फैसला साबित होगा.

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