प्रेम विवाह ने खोली चुनाव की खिड़कियाँ

भाजपा ने इस बार श्रीगंगानगर जिले की अनूपगढ़ विधानसभा सुरक्षित सीट से प्रियंका बैलाण को उम्मीदवार बनाया.
Image caption भाजपा ने इस बार श्रीगंगानगर जिले की अनूपगढ़ विधानसभा सुरक्षित सीट से प्रियंका बैलाण को उम्मीदवार बनाया.

और जगहों की अपेक्षा राजस्थान में महिलाओं और दलितों के लिए परंपरा की चारदिवारें तोड़ना मुश्किल है लेकिन प्रेम विवाहों और चुनाव ने अचानक कुछ के लिए सब बदल दिया है.

प्रदेश में कई ऐसी दलित युवतियां इन दिनों राजनीति में सक्रिय होकर चुनावी सफ़र पर निकल पड़ी हैं, जिन्होंने अपने समाज की बाधाएं तोडक़र कथित तौर पर ऊंची मानी जाने वाली जातियों के युवाओं से शादियां कर रखी हैं.

कभी ऐसी बहुएं राजस्थानी समाज के लिए बेहद हिक़ारत से देखी जाती थीं, लेकिन आज उनका दलित होना पूरे परिवार के लिए एक ऐसी ताक़त हो गया है, जो उन्हें राजनीतिक तौर पर बहुत महत्वपूर्ण बना देता है.

जातिवाद ने ठेठ राजस्थानी समाज को अपनी कुंडली में ऐसा लपेट रखा है कि वह न तो दलित को पूरा सम्मान दे पाता है और न ही महिला को. और अगर वह दलित महिला हो तो उसके लिए परेशानियां और भी बढ़ जाती हैं.

अलग कहानियां

लेकिन अगर आप राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े एक युवा दंपती से मिलें तो आपको जातिवाद के भीतर से उम्मीद की नई कोंपलें फूटती दिखेंगी.

प्रदेश के भरतपुर ज़िले की बयाना सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है.

यहां से विधानसभा चुनाव के लिए निर्दलीय उम्मीदवार हैं ऋतु बनावत. वे ढोली जाति से हैं और उनके पति हैं भारतीय जनता युवा मोर्चा के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष ऋषि बंसल. बंसल वैश्य समाज से आते हैं.

बंसल यहां से कभी चुनाव नहीं लड़ सकते थे, क्योंकि वे अनुसूचित जाति में नहीं आते हैं, लेकिन अपनी पत्नी के कारण अब उनका पूरा परिवार और नाते-रिश्तेदार अब इस सीट पर अपनी जीत के लिए दमख़म लगा रहे हैं.

ऋतु बनावत बताती हैं कि उन्होंने यह सोचकर शादी नहीं की थी कि वे बयाना से चुनाव लड़ेंगी. वे तो उदयपुर मीरा गर्ल्स कॉलेज में पढ़ती थीं और वहां दो बार छात्रसंघ की अध्यक्ष बनीं.

उदयपुर विश्वविद्यालय से गोल्ड मेडलिस्ट ऋतु ने राजनीति विज्ञान में पीएचडी की है. वे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की छात्र संघ शाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की सदस्य रहीं हैं.

ऋषि उन दिनों इसी संगठन में प्रदेश के संगठन मंत्री का काम देखते थे. उन्हीं दिनों वे संपर्क में आए और अंतरजातीय प्रेम विवाह किया. वे एनसीसी में भी प्रशिक्षित हैं.

उनका कहना है कि भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दिया तो उन्होंने लोगों के आग्रह पर चुनाव में उतरना ठीक समझा.

संयोग की राजनीति

अब एक दूसरे मामले को लें. अलवर ज़िले की अलवर ग्रामीण सीट पर नेशनल पीपुल्स पार्टी की प्रत्याशी विमला उमर को ही लें. वे ख़ुद बैरवा जाति से हैं और उनके पति हैं मेव मुसलमान.

यहां नेशनल पीपुल्स पार्टी ने मेव, मीणा और बैरवा जातियों को साथ लाने की कोशिश की है. क्योंकि इस पार्टी के मुखिया डॉ.किरोड़ीलाल मीणा ख़ुद मीणा समाज से हैं.

तीसरा मामला और भी रोचक है. भाजपा ने इस बार श्रीगंगानगर ज़िले की अनूपगढ़ विधानसभा सुरक्षित सीट से प्रियंका बैलाण को उम्मीदवार बनाया. प्रियंका ख़ुद अनुसूचित जाति से हैं और उनकी शादी प्रिंस नागपाल से हुई है, जो एक अरोड़ा युवक हैं. इस क्षेत्र में अरोड़ा जाति के काफ़ी लोग हैं और यह सीट आरक्षित है.

Image caption ऋतु बनावत बताती हैं कि उन्होंने यह सोचकर शादी नहीं की थी कि वे बयाना से चुनाव लड़ेंगी

यह वही घड़साना इलाक़ा है, जहां वसुंधरा राजे के मुख्यमंत्री काल में सिंचाई पानी के आंदोलन को लेकर किसानों पर गोलियां चलाई गई थीं और सात किसान मारे गए थे. ऐसे चुनौतीपूर्ण इलाक़े के लिए इस बार भाजपा की प्रदेशाध्यक्ष वसुंधरा राजे ने प्रियंका बैलाण को ही उम्मीदवार चुना.

लेकिन उम्र कम होने के कारण उन्हें आख़िरी क्षणों में चुनाव मैदान से हटा लिया गया और एक अन्य महिला को टिकट दिया गया.

ये तो कुछ बानगिया हैं, लेकिन ऐसी और भी कई उम्मीदवार हैं, जो अंतरजातीय विवाह करके चुनावी समर में अपने आपको उतार चुकी हैं.

'अवसर सरंचना'

समाजशास्त्री राजीव गुप्ता इस तरह की शादियों और उनके चुनावी इस्तेमाल को अवसर सरंचना का नाम देते हैं.

उनका कहना है, "ये अब राजनीतिक दलों की प्रकृति और प्रवृत्ति हो गई है कि वे ऐसी शादियों को भी राजनीतिक अवसर के रूप में देखते हैं और इसके ज़रिए सफलता की तलाश करते हैं."

उन्हें लगता है कि प्रेम विवाह या अंतरजातीय विवाह को वोट बैंक में कनवर्ट करने में भी परेशानी नहीं आती. और ये मामले भी राजनीतिक दलों की इस सोच से अलग नहीं हैं, लेकिन इससे एक सीमा तक जातियों में अच्छा मेलजोल हो रहा है.

लेकिन प्रदेश के राजनीतिज्ञों के लिए मतदाताओं को रिझाने का यह एक आसान रास्ता है, जिसने ज्यादा नहीं तो कुछ ही सही अंतरजातीय विवाह करने वाले युगलों को एक नई राह तो दी है.

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