धौलपुर की 'रानी' बनेगी राजस्थान की मुख्यमंत्री?

वसुंधरा राजे

वसुंधरा राजे सिंधिया ग्वालियर राजघराने की बेटी हैं और धौलपुर के राजघराने की बहू. वो बेशक चांदी का चम्मच मुंह में लेकर पैदा हुई हों लेकिन उन्होंने अपनी मेहनत से इस चांदी के चम्मच को सोने की प्याली में बदल दिया.

जब उन्हें साल 2003 में राजस्थान में मुख्यमंत्री पद की प्रत्याशी बनाकर भेजा गया, तो उस समय राजस्थान में भाजपा का मतलब सिर्फ़ भैरों सिंह शेखावत था.

साल 1998 में पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में राज्य मंत्री बनने से पहले वो राजस्थान से कई लोकसभा चुनाव जीत चुकी थीं लेकिन लोग भैरों सिंह शेखावत को राजस्थान का सबसे बड़े नेता मानते थे.

वसुंधरा राजे की पहली पहचान केवल उनकी माँ विजया राजे सिंधिया की वजह से ही थी. विजया राजे भारतीय जनसंघ की संस्थापक सदस्यों में एक थीं. उनका रुतबा और संसाधन जनसंघ को शुरुआती दिनों में प्राण वायु देते थे.

महारानी कहलाना पसंद

इसे उनकी खूबी ही कहेंगे कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस की तरफ से मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी माने जा रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया और वसुंधरा राजे के भतीजे अपने महाराज वाली छवि बदलने के लिए परेशान हैं.

वो आम सभाओं में समर्थकों से और पत्रकारों से कहते घूम रहे हैं कि वो भारत के आम आदमी हैं. उनके समर्थक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज चौहान की घोर आम आदमी वाली छवि की तुलना से घबराते हैं.

वहीं, वसुंधरा के समर्थक जब महारानी कहकर जयकारे लगाते हैं तो उन्हें कदाचित सुहाता भी है लेकिन उन्होंने अपने शाही परिवेश के बावजूद अवाम से खुद को जोड़ने का कौशल भी सीख लिया है.

वो राजस्थान से नहीं बल्कि मध्य प्रदेश के ग्वालियर राजघराने से हैं इसलिए जब जनता में निकलती हैं तो कहती हैं कि 'मैं राजपूत की बेटी हूँ'. वो एक जाट राजघराने में ब्याही हैं इसलिए कहती हैं कि 'मैं जाटों की बहू हूँ.'

उनके बेटे और झालावाड़ से सांसद दुष्यंत सिंह गुर्जर राजघराने में ब्याहे हैं इसलिए वो कहती हैं कि 'मैं गुर्जरों की समधन हूँ.'

किसी को 'जैसा देस वैसा भेस' की कहावत को समझना हो, तो वसुंधरा के साथ एक दिन गुज़ार ले.

विरोधियों से बेपरवाह

अपनी सुराज संकल्प यात्रा में वे हनुमानगढ़-गंगानगर जिलों में सरदारनी वसुंधरा राजे बन गईं तो नोहर-भादरा में चौधरी वसुंधरा राजे. राजपूत बेल्ट में वे महारानी कहलाईं तो आदिवासियों में वे ठेठ आदिवासी नजर आईं.

वसुंधरा राजे न आसानी से झुकती हैं, न समझौता करती हैं. सत्ता से हटने के बाद जब उनकी अपनी पार्टी के विरोधी उन पर पिल पड़े और उनकी तानाशाही और हठधर्मिता की मिसाल देने लगे तो उन्होंने करीब चार साल तक अपने आपको राज्य की राजनीति से दूर कर लिया.

वसुंधरा राजे के बारे में उनके नज़दीकी लोगों को अक्सर यह कहते सुना जाता है कि वे किसी की परवाह नहीं करतीं और अपने विरोधियों को धूल चटाकर दम लेती हैं.

भले उन पर चार साल तक प्रदेश से बाहर रहने के आरोप लगे, लेकिन उन्होंने बखूबी साबित किया कि इतना मौक़ा मिलने के बावजूद भाजपा में एक भी ऐसा नेता नहीं था, जो उनकी जगह ले सके.

गहलोत सरकार के उस समय के खराब शासन के खिलाफ भाजपा के तत्कालीन नेताओं ने कभी भी कोई बड़ा आंदोलन खड़ा नहीं किया. उन्होंने यह साबित किया है कि उनके अलावा भाजपा के पास कोई और सक्षम नेता नहीं है.

'अक्खड़'

राजनाथ सिंह ने भाजपा के पहली बार राष्ट्रीय अध्यक्ष रहते मुख्यमंत्री वसुंधरा के खिलाफ काफी कड़ा रुख़ दिखाया, लेकिन अपने दूसरे कार्यकाल में वही राजनाथ सिंह उनको भावी मुख्यमंत्री घोषित करने पर विवश हुए.

पार्टी के प्रमुख नेता कैलाश मेघवाल ने उन पर पिछले कार्यकाल में 'ये महारानी पांच हज़ार करोड़ रुपए खा गई' जैसा बयान दिया, लेकिन आज वही मेघवाल उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे हैं.

वसुंधरा राजे ने न तो भाजपा के प्रमुख नेता गुलाबचंद कटारिया को और न ही देवी सिंह भाटी जैसे प्रमुख नेता को यात्रा निकालने दी. ये नेता उनसे नाराज़ भी हुए, लेकिन आखिर में वसुंधरा राजे ने अपने सभी विरोधियों को साध लिया.

आज सिर्फ घनश्याम तिवाड़ी, ओम माथुर और रामदास अग्रवाल जैसे नेता ही वसुंधरा राजे को लेकर अलग रुख़ अख्तियार किए हुए हैं.

उनके अक्खड़पन को उनके समर्थक उनकी दृढ़ता करार देते हैं और प्रशासन पर उनकी पकड़ पर कोई विवाद नहीं है. किसी अधिकारी की मजाल नहीं कि वसुंधरा के मुख्यमंत्री रहते उनकी किसी योजना या आदेश में ढिलाई बरती जाए.

वे पिछली बार मुख्यमंत्री थीं और कलेक्टर-एसपी की कांफ्रेंस हो रही थी तो ज़िले की प्रगति के एक सवाल पर एक कलेक्टर को ऐसा फटकारा कि उन अफ़सर का बीपी वहीं बढ़ गया और उन्हें अस्पताल भेजना पड़ा.

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