वकील ही नहीं कर सकते यौन शोषण की शिकायत

सर्वोच्च न्यायालय

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जजों पर लॉ इंटर्नों यानी प्रशिक्षु वकीलों के लगाए गए यौन शोषण के आरोपों ने न्यायपालिका को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है.

सुप्रीम कोर्ट में इंटर्न रही एक वकील ने एक ब्लॉग में आरोप लगाया था कि इंटर्नशिप के दौरान उनका यौन शोषण किया गया.

इस मामले की जाँच के लिए तीन सदस्यीय समिति बनाई गई है. सोमवार को जब इस मामले की बंद कमरे में सुनवाई हो रही थी तब सुप्रीम कोर्ट के बाहर महिला वकीलों ने हाथों में तख्तियां लेकर प्रदर्शन किया.

साल 1997 में विशाखा बनाम राजस्थान सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के अनुसार हर कार्यालय में एक ऐसी समिति होनी चाहिए जहाँ यौन शोषण और दुर्व्यवहार की शिकायत की जा सके.

सुप्रीम कोर्ट ने लगभग 10 साल बाद साल 2007 में अपने कर्मचारियों के लिए यौन शोषण शिकायत समिति बनाई थी लेकिन अब तक ऐसी कोई समिति नहीं है जहाँ कोई महिला वकील जाकर यौन शोषण की शिकायत कर सके.

सुप्रीम कोर्ट के कर्मचारी सुप्रीम कोर्ट सर्विस कोड के तहत आते हैं जबकि वकील इसके तहत नहीं आते.

Image caption डॉक्टर एसएन सिंह का कहना है कि यौन शोषण के मामलों को बहुत संजीदगी से लिया जाना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने कर्मचारियों के लिए जो आठ सदस्यीय समिति बनाई है उसमें एक भी जज नहीं है. एक एडिशनल रजिस्ट्रार इसकी अध्यक्ष हैं.

'एफआईआर दर्ज नहीं'

लॉ इंटर्न यौन शोषण मामले में दिल्ली के तिलक नगर थाने में शिकायत दर्ज कराने वाले दिल्ली विश्वविद्यालय की लॉ फैकल्टी के पूर्व डीन डॉक्टर एसएन सिंह अभी तक इस मामले की एफ़आईआर दर्ज न होने से ख़फा हैं.

साथ ही उन्होंने कहा, "अगर इस समिति के सामने किसी जज के ख़िलाफ़ शिकायत आती है तो यह समिति कार्रवाई करने में सक्षम नहीं होगी."

विशाखा मामले में फ़ैसले के अनुसार इस समिति में तीसरा पक्ष कोई एनजीओ होना चाहिए या कोई ऐसा व्यक्ति जिसे यौन शोषण के मामले में काम करने का अनुभव हो. तीसरे पक्ष के तौर पर समिति में नीना पी. नायक हैं जो राष्ट्रीय बाल अधिकार आयोग की सदस्य हैं.

राष्ट्रीय महिला अधिकार आयोग की सदस्य निर्मला सामंत का कहना है, "मुझे लगता है कि इस समिति के पास जो भी महिला शिकायत के लिए जाएगी उसकी उम्र 18 साल से ऊपर होगी जबकि बाल अधिकार आयोग उन मामलों में काम करता है जहाँ पीड़ित की उम्र 18 साल से कम हो."

उन्होंने यह भी कहा, "अगर लड़की हमारे पास आकर शिकायत दर्ज करती है तो हम एफ़आईआर दर्ज करवाने में मदद कर सकते हैं."

Image caption सिद्धार्थ मुरारका कहते हैं कि पूर्व जज का नाम सामने न आने से कई कयास लग रहे हैं.

सुप्रीम कोर्ट के जनसंपर्क अधिकारी राजेश शर्मा ने बताया, "महिला वकील माँग कर रही थीं कि उनके साथ भी यौन शोषण के मामले हो सकते हैं. इसके बाद इसी साल अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि इस समिति के कोरम में बदलाव करके इसे जेंडर सेंसिटाइज़ेशन एंड इंटरनल कंप्लेंट्स कमिटी बना दिया जाए जिसमें वकील भी शिकायत कर सकें."

'प्रक्रिया चल रही है'

इस आदेश के करीब तीन महीने बाद भी अब तक यह समिति नहीं बन पाई है.

सुप्रीम कोर्ट कर्मचारियों के लिए बनी यौन शोषण शिकायत समिति की अध्यक्ष प्रोमिला शर्मा ने बताया, "आज तक मेरे पास कोई शिकायत नहीं आई है. समिति के पुनर्गठन की प्रक्रिया चल रही है."

देश की कई बार काउंसिल सर्वोच्च न्यायालय के विशाखा मामले के आदेश की पूरी तरह से अवहेलना कर रही हैं.

दिल्ली बार काउंसिल के अध्यक्ष सूर्य प्रकाश खत्री ने बताया, "हमारे यहाँ ऐसी कोई समिति नहीं है. बार काउंसिल में अभी इस बारे में चर्चा ही नहीं हुई."

बॉम्बे हाई कोर्ट में वकील सिद्धार्थ मुरारका ने बताया, "मैंने बॉम्बे हाईकोर्ट और महाराष्ट्र एवं गोवा बार काउंसिल से पूछा था कि आपके यहाँ विशाखा आदेश लागू है या नहीं तो बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपनी तरफ से कोई जवाब नहीं दिया बल्कि काउंसिल को इस बारे में पत्र लिखा. बार काउंसिल में भी ऐसी कोई शिकायत समिति नहीं है. मजिस्ट्रेट कोर्ट से मुझे जवाब आया कि उन्होंने एक समिति बनाई है जिसमें एक महिला और एक पुरुष हैं. लेकिन उसमें कोई तीसरा पक्ष नहीं है."

बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्र बताते हैं, "क़रीब एक साल पहले हमें विशाखा आदेश को लागू करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय से एक पत्र मिला था. उसके बाद हमने एक समिति बना ली है. वह पत्र हमने राज्य बार काउंसिलों को भी भेजा था लेकिन अभी यह नहीं बता सकते कि कहाँ यौन शोषण शिकायत समिति हैं और कहाँ नहीं."

'अफ़वाहों का बाज़ार गर्म'

सिद्धार्थ मुरारका ने कहा, "अभी तक लॉ इंटर्न मामले में पूर्व जज का नाम सामने नहीं आया है. इससे अफ़वाहों का बाज़ार गर्म हो रहा है. सभी सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को शक से देखा जा रहा है. इससे न्यायालय की छवि को नुकसान पहुँचता है."

सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जज अशोक कुमार गांगुली का अपनी तरफ से इस मामले में लिप्त न होने का स्पष्टीकरण देना इन्हीं अफ़वाहों से जुड़ा लगता है.

डॉक्टर एसएन सिंह कहते हैं, "यौन शोषण के मामलों को तुरंत बहुत संजीदगी से लेना चाहिए. तुरंत अगर कार्रवाई होगी तो अच्छा होगा और इससे दूसरे लोगों में भी क़ानून का डर होगा."

ब्लॉग पर अपनी शिकायत लिखने वाली लॉ इंटर्न रही वकील ने अपने फ़ेसबुक पेज पर लिखा है, "पूर्व जज ने मुझसे कहा है कि वो आगे से किसी भी महिला के साथ ऐसा नहीं करेंगे."

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