'मैं ग़रीबी हूँ, मैं तुम्हें प्यार करती हूँ'

विजय शेखर शर्मा, अनीता बारचंद्रन, वन97

विजय शेखर शर्मा भारत की सबसे तेज़ी से विकसित होने वाली मोबाइल इंटरनेट कंपनियों में से एक वन 97 कम्युनिकेशंस के संस्थापक और प्रबंध निदेशक हैं. आज पढ़िए उनकी कहानी उन्हीं की जुबानी.

मैं गरीबी हूँ... मैं तुम्हें प्यार करती हूँ... और मैं तुम्हें इसलिए नहीं छोड़ सकती... क्योंकि तुम मुझे उससे भी ज़्यादा प्यार करते हो...

यह कविता मैंने तब लिखी थी जब मैं बारह साल का था. मैंने वही लिखा था जो मैं महसूस कर रहा था.

मुझे लगा था कि लोग इसलिए गरीब हैं क्योंकि वो खुद को गरीब रहने देना चाहते हैं.

मेरी माँ बताती थी कि जब मैं दो साल का था तो दूसरे बच्चों को स्कूल जाता देख कर रोता था. तीन साल की उम्र में मेरा दाखिला नर्सरी कक्षा में हुआ.

जब मैं कक्षा तीन में पहुंचा तो मेरे अध्यापक ने तय किया कि मुझे उस कक्षा में न पढ़ कर अगली कक्षा में जाना चाहिए.

मैं एक किताबी कीड़ा था और मेरी माँ पढ़ाई के प्रति मेरे रवैए से बेहद खुश थीं.

मुझे शुरू से ही इस बात का एहसास करवा दिया गया था कि मैं दूसरों से थोड़ा अलग हूँ.

साइकिल

मेरे घर में हिटलर राज था. मेरे स्कूल टीचर पिता अवसाद से पीड़ित थे. कई बार वो बेहद अंतर्मुखी हो जाते थे और कई बार गुस्से में अपना आपा खो बैठते थे.

हमारे पालन-पोषण का सारा श्रेय मां को जाता है. हमारे रिश्तेदारों में हर कोई जानता था कि मेरी माँ घरेलू हिंसा की शिकार हैं लेकिन कभी किसी रिश्तेदार ने मेरी माँ के लिए कोई हस्तक्षेप नहीं किया.

10वीं कक्षा में मैंने माँ से साफ़ तौर पर यह समझौता कर लिया था कि यदि मैं यूपी बोर्ड की 10वीं की परीक्षा में पहले 20 सफल छात्रों में से एक हुआ तो मुझे हीरो रेंजर साइकिल मिलेगी.

जब परीक्षा परिणाम आया मैं बुरी तरह टूट गया. मेरा नाम प्रदेश के टॉप बीस छात्रों में शामिल नहीं था. मैं अपने ग्रेड्स जानने के लिए स्कूल भागा. मैंने उस साल स्कूल के साथ-साथ पूरे ज़िले में भी टॉप किया था. लेकिन टॉप टवेंटी में न आने के कारण मुझे हीरो रेंजर नहीं मिली.

मेरे पिता चाहते थे कि मैं एक डॉक्टर बनूँ. मैं जीव विज्ञान के बजाए गणित पढ़ना चाहता था. मैंने आखिरकार गणित विषय ही लिया. हालाँकि इसे लेकर घर में काफी नाटक हुआ था.

मेरी यथास्थिति को स्वीकार न करने की आदत की शुरुआत यहीं से हुई. मैंने अपने आसपास मौजूद चीज़ों को नकारना शुरू कर दिया और खुद को उन लोगों से अलग कर दिया जो परिस्थितियों को जैसे का तैसा स्वीकार कर लेते हैं.

कम्प्यूटर सेंटर

पंद्रह साल की उम्र में मैंने कॉलेज जाना शुरू किया था. मुझ पर घर के हालात बेहतर बनाने का दबाव था. हमारे पास पैसे नहीं थे क्योंकि बड़ी बहन की शादी के लिए हम बैंक से क़र्ज़ ले चुके थे.

मैं कॉलेज में था इसलिए मेरा घर जाना ज़्यादा नहीं होता था. एक बार जब मैं घर गया तो मैंने अपनी बहन को अपने चचेरे भाई से पचास रुपये माँगते देखा.

मैंने उससे पूछा, "यह रुपये तुम्हें क्यों चाहिए?' मेरा सवाल सुन कर मेरी बहन रो पड़ी और तब मुझे पता चला कि घर पर खाने के लिए भी पैसे नहीं है."

मैंने खुद को यकीन दिलवाया कि मेरे वर्तमान हालात स्थायी नहीं हैं. लेकिन मैंने तुरंत ही नौकरी करने की संभावना के ख़्याल को दिमाग से निकाल बाहर फेंक दिया.

एक नौकरी भला मुझे क्या दे सकती थी? मैंने तय किया कि मैं नौकरी नहीं करूँगा. मैं ऐसा आदमी बनूंगा जो दूसरों को नौकरी देता हो. उस वक़्त मैं 17 साल का था.

क़र्ज़ का बोझ मेरे मन पर बहुत बढ़ गया. मैं अक्सर सोचता रहता था कि कैसे मैं कॉलेज ख़त्म होने से पहले ही अपने पिता का सारा कर्ज उतार सकता हूँ.

मैंने फार्चून पत्रिका पढ़ना शुरू किया था. उसमें सिलिकॉन वैली में गैरेज बिजनेस पर एक आर्टिकल था.

मुझ जैसे सनकी को उस आर्टिकल में अपना भविष्य नज़र आने लगा. मैंने सोचा, "हे भगवान, जिस कम्प्यूटर सेंटर में मैं जाता हूँ वहाँ तो धन का अंबार है."

मैं क्लासेस में नहीं जा सकता था क्योंकि मैं अंग्रेजी नहीं समझता था. मैंने कंप्यूटर सेंटर में रहना शुरू कर दिया. मन के भीतर की कोई चाह थी जो दिशा दिखा रही थी. प्रोग्रामिंग, वेबसाइट्स का निर्माण, इंटरनेट मेरा भविष्य था.

साझीदार

फरीदाबाद का रहने वाला मेरा एक दोस्त था. हम दोनों के रास्ते एक दूसरे से मिलते थे क्योंकि हम दोनों ही एक कंपनी बनाना चाहते थे.

कॉलेज छोड़ने तक एक बात तो मेरे ज़हन में साफ हो गई थी कि इस दुनिया में व्यापार नाम की कोई चीज़ होती है और मैं उसके ज़रिये रुपये कमा सकता हूँ.

मैंने साल 1998 में स्नातक की परीक्षा पास की. उसके बाद मैंने अनुभव लेने के लिए नौकरी की.

लेकिन मैं जानता था कि मैं इंटरनेट का जानकार हूँ और मुझे लोगों को अपने यहाँ काम पर रख कर अपनी एक कंपनी शुरू करनी है. कुछ समय बाद मैंने अपनी नौकरी छोड़ी दी.

नौकरी छोड़ मैंने अपने कॉलेज के दोस्त के साथ मिलकर अपनी इंटरनेट कंपनी बनाई. एक जानकार के माध्यम से मेरी कंपनी ने इंडिया टुडे के साथ काम करना भी शुरू कर दिया.

अचानक से हमारे पास न्यू जर्सी की एक कंपनी से हमारी कंपनी को ख़रीदने का प्रस्ताव आया.

मैंने अपनी इंटरनेट कंपनी अगस्त 2000 में बेची थी. मेरी दूसरी बहन की शादी अप्रैल 2001 में हुई. पिताजी का पुराना लोन मैंने पहले ही चुका दिया था.

अनुभवों की पाठशाला

मैंने वन97 बिज़नेस की शुरुआत की जिसमें ज्योतिषी मेरे दफ्तर में बैठते थे और अपना भविष्य जानने के इच्छुक लोग 901 नंबर डायल करके उनसे बात कर सकते थे.

फ़ोन करने वाले को ज्योतिषी की फीस देनी पड़ती थी और मुझे उसमें से मेरा हिस्सा मिलता.

यह एक सीधा सा बिज़नेस मॉडल था लेकिन समस्या यह थी कि इसमें कोई बड़ी राशि एक साथ हाथ में नहीं आती थी. सो अक्सर मेरे पास महीनों पैसे नहीं हुआ करते थे.

बिज़नेस के खर्चों के चलते मेरे बैंक से रुपये मानो उड़ जाते थे. जल्द ही ऐसा वक़्त भी आ गया जब मैं अपने दोस्तों से क़र्ज़ लेने लगा.

मैंने अपनी बहन के ससुराल वालों से भी क़र्ज़ उठाया.

मेरे पास बहुत बार खाने तक के पैसे नहीं होते थे. ऐसे में कोक पीकर गुज़ारा चलता था.

मैं अक्सर देर रात को घर लौटता था ताकि मकान मालिक मुझे देखकर किराया न मांग ले.

तभी एक घाटे में चल रही इंटरनेट कंपनी ने मुझे पार्ट टाइम काम दिया.

मैंने उनके सिस्टम की इंजीनियरिंग और सोर्सिंग प्रैक्टिस में बदलाव लाकर कंपनी को 20,000 डॉलर का मुनाफा करवाया.

पैसे की कीमत

जैसी उम्मीद थी कंपनी ने मुझे पैसे नहीं दिए. मैंने उस कंपनी के मालिक को समझाया कि, 'मैं यहाँ काम कर रहा हूँ क्योंकि मुझे पैसों की ज़रुरत है'.

उन्होंने पूछा, 'कितने पैसों की ज़रूरत है ?' मैंने कहा, 'असल में मुझे अपनी बहन से लिया गया आठ लाख रुपए का कर्ज चुकाना है '

उस कंपनी के मालिक ने मेरी कंपनी वन 97 के 40% मालिकाना हक़ के बदले में मेरी कंपनी में आठ लाख का निवेश कर दिया.

उन्होंने महज़ आठ लाख के बदले में वन 97 के 40% मालिकाना हक़ खरीद लिए थे.

उनके दिए आठ लाख की बदौलत मैंने अपने जीवन के एक और पड़ाव को पार किया और अपने जीजा का कर्ज उतार दिया.

हाल ही में हुए मूल्यांकन में वन 97 की कीमत 300 मिलियन डॉलर आंकी गई.

मुझे मालूम है कि मैंने अपने लिए कुछ ऐसा बना लिया है जिसकी कीमत बहुत ज़्यादा है लेकिन मैं अभी भी अपने उस लक्ष्य से दूर हूँ जो मैंने अपने लिए तय किया था.

वन97 अब लोगों पर पैसा लगाता है कंपनियों पर नहीं. मैं ऐसे लोगों को ढूंढ़ता हूँ जिनके दिल में कहीं चोट लगी हो, जो कुछ साबित करना चाहते हों.

और जो शख्स जीवन में अंधकारमय दौर से न गुज़रा हो, जिसने तकलीफें न उठाई हो उसमें यह ऊर्जा नहीं हो सकती.

मैं कामना करता हूँ कि सभी को जीवन का वह दौर मिले, सिर्फ़ उतना ही जितना उसमें वो ऊर्जा भरने के लिए काफी हो.

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