जजों के ख़िलाफ़ यौन उत्पीड़न की शिकायत नहीं सुन सकती समितियां

महिलाएं यौन उत्पीड़न केस

अदालतों पर ज़िम्मेदारी है महिलाओं के यौन उत्पीड़न के मामलों से निपटने के लिए व्यवस्था करने की. सुप्रीम कोर्ट ने बाक़ायदा इसके लिए व्यवस्था दी है और समिति बनाने का आदेश दिया है.

मगर यह समिति किसी न्यायाधीश के ख़िलाफ़ यौन उत्पीड़न की शिकायत की सुनवाई नहीं कर सकती.

1997 में विशाखा बनाम राजस्थान सरकार केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि हर कार्यालय में यौन शोषण और दुर्व्यवहार की शिकायतों के लिए एक समिति होनी चाहिए.

इसकी अध्यक्ष एक महिला होनी चाहिए और समिति के सदस्यों में कम से आधा हिस्सा महिलाओं का होना चाहिए. इसके अलावा किसी बाहरी दबाव से बचाने के लिए इस समिति में किसी एनजीओ या ऐसे मामलों के जानकार को शामिल करना चाहिए.

न्यायिक क्षेत्र में ही इस आदेश का पालन दस साल बाद 2007 में हुआ. सुप्रीम कोर्ट में जो समिति बनी, वह सिर्फ़ सुप्रीम कोर्ट सर्विस कोड के तहत आने वाले कर्मचारियों के लिए है. महिला वकीलों की शिकायतें इस समिति के दायरे में नहीं आतीं.

इस बारे में सुप्रीम कोर्ट के जनसंपर्क अधिकारी राजेश शर्मा का कहना था, "वकीलों की मांग के बाद इसी साल अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि इस समिति के कोरम में बदलाव करके इसे जेंडर सेंसिटाइज़ेशन एंड इंटर्नल कंप्लेंट्स कमेटी बना दिया जाए, जिसमें वकील भी शिकायत कर सकें."

मगर तीन महीने बाद भी सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का पालन नहीं हुआ है.

जज समिति के दायरे से बाहर?

सवाल उठता है कि क्या जज भी इस समिति के दायरे से बाहर हैं?

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बनी इस आठ सदस्यीय समिति में एक भी जज नहीं हैं. एक एडिशनल रजिस्ट्रार इसकी अध्यक्ष हैं.

हाल ही में लॉ इंटर्न के कथित यौन शोषण मामले की दिल्ली के तिलकनगर थाने में शिकायत दर्ज कराने वाले दिल्ली विश्वविद्यालय के लॉ फ़ैकल्टी के पूर्व डीन डॉक्टर एसएन सिंह कहते हैं, "अगर इस समिति के सामने किसी जज के ख़िलाफ़ शिकायत आती है, तो यह कार्रवाई नहीं कर पाएगी."

बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष मनन मिश्र कहते हैं, ‘‘तकनीकी रूप से यह समिति किसी भी सरकारी या ग़ैरसरकारी संस्थान के नियोक्ता और कर्मचारियों में से ही चुनकर बनाई जाती है और वह केवल उन्हीं से संबंधित शिकायत सुनती है. जज सुप्रीम कोर्ट के कर्मचारी नहीं हैं, न वो नियोक्ता हैं. वह एक संवैधानिक पद है. इसलिए यह समिति किसी जज के ख़िलाफ़ न कोई शिकायत स्वीकार कर सकती है और न कोई कार्रवाई कर सकती है. सुप्रीम कोर्ट के किसी भी जज के ख़िलाफ़ किसी को कोई शिकायत हो, तो उसे सीधे सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के पास जाना होगा.’’

तीन साल में कोई शिकायत नहीं

सुप्रीम कोर्ट सर्विस कोड के तहत आने वाले कर्मचारियों के लिए बनी समिति को तीन साल हो चुके हैं.

इसकी अध्यक्ष प्रोमिला शर्मा ने बताया, "आज तक मेरे पास कोई शिकायत नहीं आई है. समिति के पुनर्गठन की प्रक्रिया चल रही है."

समिति का तीसरा पक्ष

विशाखा केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यौन शोषण से जुड़ी शिकायतों की सुनवाई करने वाली समिति में तीसरा पक्ष एनजीओ या वह शख़्स होना चाहिए, जिसे ऐसे मामलों में काम करने का अनुभव हो.

सुप्रीम कोर्ट की इस समिति में तीसरे पक्ष के तौर पर राष्ट्रीय बाल अधिकार आयोग की सदस्य नीना पी. नायक को रखा गया है.

इस पर भी सवाल खड़े हुए हैं. राष्ट्रीय महिला अधिकार आयोग की सदस्य निर्मला सामंत कहती हैं, "मुझे लगता है कि इस समिति के पास जो भी महिला शिकायत के लिए जाएगी, उसकी उम्र 18 साल से ऊपर होगी जबकि बाल अधिकार आयोग उन मामलों में काम करता है जहाँ पीड़ित की उम्र 18 साल से कम हो."

राज्य बार काउंसिलों में समिति नहीं

सुप्रीम कोर्ट के आदेश को 10 साल बीत चुके हैं. मगर भारत के कई राज्यों की बार काउंसिलों ने अभी तक इस समिति का गठन नहीं किया है.

दिल्ली बार काउंसिल के अध्यक्ष सूर्य प्रकाश खत्री कहते हैं, "हमारे यहां ऐसी कोई समिति नहीं है. बार काउंसिल में अभी इस बारे में चर्चा ही नहीं हुई."

बॉम्बे हाईकोर्ट में वकील सिद्धार्थ मुरारका के मुताबिक़, "मैंने बॉम्बे हाईकोर्ट और महाराष्ट्र एवं गोवा बार काउंसिल से पूछा था कि आपके यहाँ विशाखा आदेश लागू है या नहीं, तो बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपनी तरफ से कोई जवाब न देकर बार काउंसिल को पत्र लिखा. बार काउंसिल में भी ऐसी कोई शिकायत समिति नहीं है. मजिस्ट्रेट कोर्ट से मुझे जवाब आया कि उन्होंने एक समिति बनाई है जिसमें एक महिला और एक पुरुष हैं, लेकिन उसमें कोई तीसरा पक्ष नहीं है."

बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्र ने कहा, "क़रीब एक साल पहले हमें विशाखा आदेश लागू करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय से पत्र मिला था. उसके बाद हमने एक समिति बना ली है. वह पत्र हमने राज्य बार काउंसिलों को भी भेजा था, लेकिन अभी यह नहीं बता सकते कि कहाँ यौन शोषण शिकायत समिति हैं और कहां नहीं."

लॉ इंटर्न ने लगाए थे आरोप

न्यायिक क्षेत्र में यौन उत्पीड़न का मुद्दा हाल ही में एक लॉ इंटर्न की शिकायत के बाद उठा है. इस लॉ इंटर्न ने अपने ब्लॉग में एक रिटायर्ड जज पर आरोप लगाए थे कि उन्होंने इंटर्नशिप के दौरान उनका यौन शोषण किया था.

इस मामले की तीन सदस्यीय समिति जांच कर रही है. सोमवार को बंद कमरे में इसकी सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के बाहर महिला वकीलों ने प्रदर्शन किया था.

इस केस की पुलिस में शिकायत दर्ज कराने वाले दिल्ली विश्वविद्यालय की लॉ फ़ैकल्टी के पूर्व डीन डॉक्टर एसएन सिंह अभी तक एफ़आईआर दर्ज न होने से ख़फ़ा हैं.

वकील सिद्धार्थ मुरारका कहते हैं, "अभी तक पूर्व जज का नाम सामने नहीं आया है. इससे अफ़वाहों का बाज़ार गर्म हो रहा है और सभी सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को शक से देखा जा रहा है. इससे न्यायालय की छवि को नुकसान पहुँचता है."

सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जज अशोक कुमार गांगुली का अपनी तरफ से इस मामले में लिप्त न होने का स्पष्टीकरण देना इन्हीं अफ़वाहों से जुड़ा लगता है.

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