जनता हो या नेता, मोहभंग होते-होते रह जाता है

  • 20 नवंबर 2013

मोहभंग घटना नहीं, प्रक्रिया है. होते होते होता है. ऐसा नहीं होता कि सुबह सो कर उठे और बीती रात की किसी घटना की वजह से मोहभंग हो गया.

व्यक्तिगत जीवन में ऐसा बिल्कुल नहीं होता. समाज में इसकी कोई मिसाल नहीं मिलती. जाहिर है, जो व्यक्ति और समाज में नहीं है, राजनीति में और मुश्किल से दिखता है. व्यवस्था लोकतांत्रिक हो तो इसे नामुमकिन समझिए.

जहां ज्यादातर विवाद बयानों के मार्फत होते हों, मोहभंग का भी बस बयाना आ कर रह जाता है. असल में ऐसा होता नहीं है.

ये मानना कि किसी रिपोर्ट या बयान से उपजे विवाद के माध्यम से मोहभंग हो जाएगा और लोग भरभराकर दूसरे खेमे में चले जाएंगे, ख्याली पुलाव अधिक लगता है. समाज अलग ही मिट्टी का बना है. कुछ इसी तरह प्रशिक्षित है. सदियों का अनुभव लेकर अपने विचार उसने बनाए हैं और उसे तरतीब दी है. उसे बेतरतीब करना आसान कभी नहीं रहा.

राजनीतिक दल ये बात अच्छी तरह समझते हैं पर एक निराधार उम्मीद में यह मुगालता भी पाले रखते हैं कि शायद कोई घटना या एक जुमला, मोहभंग की उस प्रक्रिया को पूरा कर दे, जो वर्षों से पूरा होने की कगार पर है. हालांकि भारत की चुनावी राजनीति में कोई ठोस उदाहरण उपलब्ध नहीं है कि ऐसा हुआ हो.

राष्ट्रीय स्तर की तो बात ही छोड़ दीजिए. राज्यों में भी एक झटके में मोहभंग की मिसाल नहीं है. उससे नीचे ज़िले के स्तर पर भी ऐसा नहीं होता है. गाँव-पंचायत के स्तर पर भी नहीं. चूंकि व्यवस्थित समाज वहीं से बनना शुरू होता है. किसी उदाहरण के अभाव में, यह मान लेना बेहतर होगा सिर्फ लफ्फाज़ी, आरोप-प्रत्यारोप, अफ़वाह या वक्तृत्व कला आपको कहीं नहीं पहुंचा सकती.

तीन चुनाव, तीन मुद्दे

गड़े मुर्दे उखाड़कर कुछ हासिल होता है, यह अति उत्साही कल्पना ही है. पर जब चुनाव करीब हों तो इनमें एक ना एक, बल्कि कुछ मामलों में एक से अधिक का इस्तेमाल सियासी जमातें हथियार की तरह करती हैं. असलियत चुनाव के बाद सामने आती है, जब मालूम होता कि सारे हथियार भोथरे थे.

दरअसल, आमलोगों के लिए चुनाव के वास्तविक मुद्दे वही होते हैं, जो चुनाव के पहले और उसके बाद भी वास्तविक बने रहते हैं. जो उन्हें छूते हैं और मुतास्सिर करते हैं. जिन पर उनकी जिंदगियां निर्भर करती हैं. इस नज़र से यह अवधारणा खोखली लगती है कि चुनावी मुद्दा जैसी कोई चीज़ होती भी है. सहानुभूति को यकीनन इसमें शामिल नहीं किया जा सकता.

इस लिहाज़ से देखा जाए तो भारत में पहले तीन आम चुनाव के दौरान मुद्दा एक ही था- सांप्रदायिक सद्भाव. सन 1947 के विभाजन की त्रासदी बहुत बड़ी थी. लाखों लोगों की जान चली गई थी और लोग उस पीड़ा की असल वजह भी देख पा रहे थे.

इसी के साथ अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति का जज़्बा भी था, जिसके सामने ज़िंदगी की आम फहम मुश्किलें गौण हो गई थीं. उम्मीद की किरणें हर तरफ से हिंदुस्तान पर नाज़िल हो रही थीं. इन पंद्रह वर्षों में कई सपने टूटे, जो टूटने ही थे. आम लोगों की मुश्किलें बढ़ीं तो कांग्रेस का विरोध भी बढ़ने लगा. पर कांग्रेस से, आंशिक तौर पर ही सही, मोहभंग होने में 20 बरस लग गए.

अब दो ही मुद्दे

आज भी स्थिति करीब-करीब वैसी ही बनी हुई है. सांप्रदायिक सद्भाव तब भी मुद्दा था और आज भी है. लेकिन महंगाई और गरीबी उसमें जुड़ गई हैं. यानी कि वही चिंताएं, जो 1952 में थीं, आज भी हैं. वही समस्याएं सामने हैं.

इस बात से बहुत फर्क नहीं पड़ता कि भारत अंतरिक्ष में चला गया या उसने परमाणु क्षमता हासिल कर ली. इसरो का मिशन फ़ेल हो जाए तो कोई बात नहीं लेकिन आलू-प्याज के दाम बढ़े तो चिंता होनी चाहिए.

एक तीसरा मुद्दा उसमें भ्रष्टाचार का जुड़ सकता था, पर वह अब भी देहरी से बाहर है, दस्तक देता हुआ. भ्रष्टाचार उसी तरह लोगों की ज़िंदगी में दखल देता है जैसे महंगाई. उसी तरह सालता है, दुख और क्षोभ को जन्म देता है. निश्चित तौर पर एक दिन वह भी मुद्दा होगा और शायद ऐसा जल्दी हो.

लेकिन अब तक मुद्दे दो ही हैं. सांप्रदायिक सद्भाव और महंगाई. बाक़ी जो कुछ है, आई-गई इबारत है. वो पहले कई बार लिखी और मिटाई जा चुकी है. लोगों ने देखा है कि उससे मोहभंग नहीं होता.

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