फ़ेसबुक पर लाइक का मतलब वोट की गारंटी?

भारत में अगले साल लोकसभा चुनाव होने हैं जिसमें करीब 1.76 करोड़ नए मतदाता चुनावी अखाड़े में नेताओं का भविष्य तय करेंगे.

पहली बार वोटिंग का हक़ पाने वाले इन युवा मतदाताओं को रिझाने के लिए लगभग सभी राजनीतिक दल एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रहे हैं.

युवाओं का इंटरनेट और मोबाइल की तरफ ख़ासा रुझान होता है.

पाँच राज्यों के चुनाव

लिहाज़ा इस मोर्चे पर नवीनतम तकनीक से लैस राजनीतिक पार्टियां वोटरों तक पहुंचने की जुगत लगा रही हैं.

चेन मैसेजिंग के लिए सोशल मैसेजिंग टूल 'व्हाट्ज़ऐप' का जमकर प्रयोग किया जा रहा है.

सोशल मीडिया से लेकर मोबाइल ऐप्स तक और ईमेल से लेकर एसएमएस तक, क्षेत्रवार तरह-तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं.

लेकिन क्या चुनाव के लिए इंटरनेट मार्केटिंग प्रभावी है और क्या फ़ेसबुक पर किसी पार्टी के पन्ने को यूज़र द्वारा लाइक करना, उसके वोट की गारंटी है?

लाइक्स बनाम वोट

ऑनलाइन यूज़र्स के व्यवहार का अध्ययन करने वाली कंपनी 'जक्स्ट कंसल्ट' के निर्देशक मृत्युंजय मिश्रा की मानें तो सीधे तौर पर ऐसा कहना गलत होगा कि लाइक्स वोटों में तब्दील होते हैं.

विधानसभा चुनावः आँकड़ों का आईना

मिश्रा बताते हैं, "इंटरनेट इंगेजमेंट का मीडियम है लेकिन ये इस बात की गारंटी नहीं देता की जो यूज़र सोशल मीडिया पर किसी पार्टी का समर्थन करता है वो वोट भी उसी को देता है. हो सकता है इनमें से कई लोग वोट भी न देने जाएं."

भारतीय जनता पार्टी के आधिकारिक फ़ेसबुक पन्ने से फिलहाल लगभग 18 लाख़ यूजर्स जुड़े हैं जबकि कांग्रेस से संबंधित पन्ने– युवा देश, इंडियन नेशनल कांग्रेस और यूथ कांग्रेस के संयुक्त लाइक्स करीब 17.6 लाख हैं.

इंटरनेट और मोबाइल की पकड़

भारत में 15 करोड़ इंटरनेट उपभोक्ता हैं और चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार क़रीब 78 करोड़ मतदाता. ऐसे में फिलहाल अधिकांश मतदाताओं तक पहुंचने के लिए इंटरनेट - टीवी, प्रिंट और रेडियो से पीछे है.

लोगों से दूर होता लोकतंत्र

लेकिन पहुंच के मामले में मोबाइल इन सभी माध्यमों से आगे है. ट्राई (भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण) के आंकड़ों के अनुसार देश में 90 करोड़ से अधिक मोबाइल उपभोक्ता हैं जो वोटरों तक पहुंचने के लिए प्रभावी हो सकते हैं.

मृत्युंजय मिश्रा बताते हैं, "हमारे जुटाए आंकड़ों के अनुसार भारत में लगभग 55 करोड़ सक्रिय मोबाइल यूज़र्स है जो चुनावी मार्केटिंग के लिए भविष्य में काफ़ी उपयोगी साबित हो सकते हैं."

मोबाइल और सोशल मीडिया पर पार्टियां काफ़ी तेज़ी से पकड़ भी बनाती जी रही हैं.

'आप' का कैंपेन

जन-आंदोलन से दिल्ली में अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत करने वाले दल 'आम आदमी पार्टी' की बढ़ती लोकप्रियता के लिए भी उनके इंटरनेट कैंपेन को बड़े तौर पर ज़िम्मेदार माना जाता है.

स्मार्टफ़ोन्स पर नरेंद्र मोदी छाए हुए हैं तो एसएमएस और कॉल्स के ज़रिए आम आदमी पार्टी अपने संभावित वोटरों तक पहुंचने का प्रयास कर रही है.

लोगों को फ़ोन पर अरविंद केजरीवाल के रिकॉर्डेड कॉल्स आए जिसमें वह दिल्ली जीतने के बाद जनलोकपाल बिल पास कराने का वादा करते सुने गए.

एंड्रॉएड गेम 'मोदी रन' में मोदी राज्यों को जीतने के लिए कांटों और खाइयों से बचने की कोशिश करते हैं तो 'न-मो पॉकेट बुक' में नरेंद्र मोदी के भाषणों का ऑडियो संकलन दिया गया है.

सोशल मीडिया पर पार्टियां

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी के नाम से भी कई ऐप गूगल प्ले पर उपलब्ध हैं जबकि राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का ऐप उनकी सभी गतिविधियों की जानकारी देता है.

कांग्रेस की संचार उप समिति के सदस्य संजय झा ने बीबीसी को बताया, "सोशल मीडिया पर एकपक्षीय हिंदुत्व दुष्प्रचार और कांग्रेस पार्टी के ख़िलाफ ग़लत, पक्षपातपूर्ण बयानबाज़ी के जवाब में हमने सोशल मीडिया पर अपनी उपस्थिति दर्ज की है."

कांग्रेस के लिए इंटरनेट कैंपेन पर काम कर चुकी न्यू मीडिया एजेंसियों में से एक के अधिकारी अचल पॉल कहते हैं कि नई तकनीक का इस्तेमाल युवाओं तक पहुंचने के लिए काफ़ी प्रभावशाली है और कांग्रेस इस पर विशेष ध्यान देती है.

उधर भारतीय जनता पार्टी के आईटी विभाग के संयोजक अरविंद गुप्ता का मानना है कि उनकी पार्टी तकनीक के क्षेत्र में हमेशा अगुवा रही है जिसका पार्टी को ख़ासा फ़ायदा पहुंचा है.

तकनीक का इस्तेमाल पुराना

उन्होंने बताया, "सोशल मीडिया के ज़रिए भारतीय जनता पार्टी ने दस हज़ार से ज़्यादा युवाओं को सक्रिय तौर पर पार्टी से जोड़ा और पार्टी को लाखों लोगों का समर्थन भी मिला."

मोबाइल के क्षेत्र में भी भारतीय जनता पार्टी काफ़ी सक्रिय दिखती है.

लेकिन मतदाताओं को रिझाने के लिए तकनीक का इस्तेमाल नया नहीं है. साल 2004 में अटल बिहारी बाजपेयी के राजनीतिक करियर के आख़िरी चुनाव में भी उनके नाम से वोटरों को कॉल और एसएमएस आए थे पर भाजपा वो चुनाव हार गई थी.

लोकसभा चुनाव आने वाले हैं और पार्टियां प्रचार में कोई कसर बाक़ी नहीं रखना चाहतीं, लिहाज़ा आगामी चुनाव में भी तकनीक पर ख़ासा ज़ोर रहेगा.

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