‏शाह और 'साहेब' की नींद उड़ानेवाले सिंघल कौन हैं?

नरेंद्र मोदी, अमित शाह, गोपीनाथ मुंडे

गिरीश सिंघल का नाम वर्ष 2002 में तब सुर्खियों में आया जब गांधीनगर के अक्षरधाम मंदिर पर चरमपंथी हमला हुआ. लोग उन्हें हमलावरों से सबसे पहले टक्कर लेने वाले पुलिस अधिकारी के तौर पर जानने लगे.

एक ही साल पहले भारतीय पुलिस सेवा में आए सिंघल इसके बाद गुजरात पुलिस के चहेते बन गए और फिर एक के बाद एक कई अहम पदों पर रहे. आज वही गिरीश सिंघल गुजरात के पूर्व गृह मंत्री अमित शाह और उनके 'साहेब' की नींद उड़ा चुके हैं.

क्या बोझ बनते जा रहे हैं शाह?

मुठभेड़ की रणनीति बनाने में माहिर और मोदी सरकार के भरोसेमंद और चहेते अफ़सरों में से एक, सिंघल सत्तासीन लोगों की नींद उड़ाने का ज़रिया कैसे बन गए? सिंघल को फ़रवरी 2013 में इशरत जहां फ़र्जी मुठभेड़ मामले में गिरफ्तार किया गया. फिलहाल वो ज़मानत पर जेल से बाहर हैं. उनके खिलाफ़ और भी कई आरोप हैं.

गुजरात में 2002 के मुसलमान विरोधी दंगों की जांच के लिए गठित विशेष टीम ने आरोप लगाया कि अहमदाबाद अपराध शाखा में काम करते समय सिंघल ने महत्वपूर्ण सबूत मिटाए. उन पर ये भी आरोप लगा कि मिटाए गए सबूतों में आईपीएस अधिकारी राहुल शर्मा की दंगों के दौरान के कॉल रिकॉर्ड पर तैयार की गई सीडी शामिल थी.

उन पर 'इशरत जहां फ़र्ज़ी मुठभेड़' मामले में सच्चाई छिपाने का आरोप भी लगा था. इशरत जहां एक 19 वर्षीय कॉलेज छात्रा थीं जिन्हें पुलिस ने तीन अन्य लोगों के साथ एक कथित पुलिस मुठभेड़ में 15 जून 2004 को अहमदाबाद के पास मार दिया था. उनके परिवार का दावा है कि वे सामान्य छात्रा थीं और निर्दोष थीं.

न्यायिक जाँच

Image caption आरोप है कि गुजरात का गृह मंत्री रहते हुए अमित शाह ने एक महिला की जासूसी करने का आदेश दिया था.

हालाँकि गुजरात पुलिस का दावा था कि मारे गए चारों लोग मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाना बनाने के मक़सद से अहमदाबाद आए थे. इशरत जहां मुठभेड़ मामले में मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट एसपी तमंग की न्यायिक जाँच रिपोर्ट में कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगे.

क्राइम ब्रांच प्रमुख पीपी पांडे, डीआईजी डीजी वंज़ारा, उस समय पुलिस अधीक्षक रहे गिरीश सिंघल समेत 21 पुलिस अधिकारियों पर इस मुठभेड़ की साज़िश रचने का आरोप है. फिर उच्च न्यायालय के आदेश पर इस मामले की जाँच कर रही सीबीआई ने दिसंबर 2011 में इन 21 पुलिस अधिकारियों के खिलाफ़ मामला दर्ज किया.

वंजारा का असली निशाना मोदी नहीं शाह

ये मामला अब भी सीबीआई की अदालत के विचाराधीन है. जब अभियुक्त गिरीश सिंघल ने सीबीआई जाँच दल को दो ऑडियो रिकॉर्डिंग वाली पेन ड्राइव सौंपी तो इस मामले में अहम मोड़ आया.

सीबीआई की कोर्ट में दाखिल चार्जशीट के मुताबिक सिंघल ने ये रिकॉर्डिंग देते समय आरोप लगाया कि ये गुजरात के वरिष्ठ अधिकारियों की इशरत जहां मुठभेड़ मामले की जांच में कथित तौर पर बाधा पहुंचाने पर बुलाई गई एक बैठक की गुप्त रिकॉर्डिंग है.

चार्जशीट के मुताबिक सीबीआई को सौंपी गई दूसरी ऑडियो रिकॉर्डिंग सिंघल और गुजरात के पूर्व गृह राज्यमंत्री अमित शाह के बीच हुई टेलीफ़ोन बातचीत की रिकॉर्डिंग है. आरोप लगाया गया है कि रिकॉर्डिड बातचीत में शाह अवैध गतिविधियों के लिए पुलिस के इस्तेमाल की बात कह रहे हैं.

कथित जासूसी

शुक्रवार को राजनीतिक हलकों में खलबली तब मची जब वेब पोर्टल कोबरापोस्ट और गुलेल ने 'द स्टॉकर्स' नाम का वीडियो जारी किया. कोबरापोस्ट और गुलेल का दावा है कि वीडियो में जो रिकॉर्डिंग है वो पुलिस अधिकारी गिरीश सिंघल और अमित शाह की है जिसे सीबीआई को सौंपा गया है.

इस वीडियो में आरोप लगाए गए हैं कि अमित शाह ने गुजरात के गृह राज्यमंत्री रहते हुए एक महिला की जासूसी करने का आदेश दिया. इसमें महिला के फ़ोन टैपिंग से लेकर उसका पीछा करने जैसी बातचीत है. इसी बातचीत में अमित शाह नाम लिए बिना किसी 'साहेब' और उनकी पूरे मामले में ख़ास दिलचस्पी का भी जिक्र करते सुने जा सकते हैं.

पीपी पांडेय का सरेंडर

जब कांग्रेस और मीडिया इन आरोपों को लेकर अमित शाह से स्पष्टीकरण की बात करने लगे तो भाजपा मैदान में उतरी और बार-बार महिला के पिता के एक पत्र का ज़िक्र करती नज़र आई. इस पत्र में पिता ने लिखा कि सुरक्षा कारणों से उनकी बेटी की निगरानी की जा रही थी.

उनका कहना है कि उनकी पत्नी का इलाज चल रहा था और बेटी अहमदाबाद के एक होटल में ठहरी हुई थी, इसलिए वो अपनी बेटी के लिए फिक्रमंद थे. पिता के अनुसार इसी वजह से उन्होंने अपने पारिवारिक मित्र और गुजरात के मुख्यमंत्री से अपनी बच्ची की देखरेख की गुज़ारिश की थी.

उधर, कांग्रेस और महिला आधिकारों के कई कार्यकर्ता मांग कर रहे हैं कि ये स्पष्ट किया जाए कि क्या मोदी सरकार ने इस 'निगरानी' कार्रवाई से पहले काग़ज़ी कार्रवाई और वैध प्रक्रिया पूरी की थी या नहीं.

इशरत पर एफ़आईआर?

Image caption 15 जून 2004 को कथित पुलिस मुठभेड़ में इशरत जहां को अहमदाबाद के पास मार दिया गया था.

जहाँ तक इशरत जहां मुठभेड़ का सवाल है, सीबीआई के आरोप पत्र के अनुसार गिरीश सिंघल इशरत जहां को मार दिए जाने के खिलाफ थे. सीबीआई के समक्ष पूर्व पुलिस अधिकारियों के दिए बयानों के मुताबिक सिंघल और वंज़ारा में 'इशरत की हत्या' को लेकर मतभेद था.

चार्जशीट के मुताबिक रिटायर्ड डिप्टी एसपी डीएच गोस्वामी ने सीबीआई को बताया कि मुठभेड़ के बाद दर्ज होने वाली एफ़आईआर का मसौदा पहले से ही तैयार कर लिया गया था और इस पर चर्चा भी की गई थी.

गोस्वामी ने सीबीआई से कहा, "वंज़ारा ने मुठभेड़ से एक दिन पहले ये मसौदा सिंघल को दिखाया जिसमें कुछ लश्कर चरमपंथियों को मारे जाने की बात थी. लेकिन सिंघल इशरत जहां को मारने और मसौदे में बताए गए इन लोगों के गुजरात आने के मकसद पर सहमत नहीं थे. वंजारा ने सिंघल से कहा कि राज्य के मुख्यमंत्री और गृह मंत्री ने इसकी मंजूरी दी है."

भारतीय जनता पार्टी बार-बार ये कहती आई है कि मोदी सरकार और अमित शाह पर लगाए जा रहे आरोप निराधार और राजनीति से प्रेरित हैं.

क्या सिंघल 'व्हिसल ब्लोअर' हैं?

Image caption पुलिस अधिकारियों के दिए बयानों के मुताबिक सिंघल और डीजी वंज़ारा में 'इशरत की हत्या' को लेकर मतभेद था.

उनके परिवार के करीबी लोग दावा करते हैं कि गंभीर आरोपों से घिरे सिंघल के 'व्हिसल ब्लोअर' (यानी जनता के हित में गुप्त मुद्दे सार्वजनिक करने वाला) बनने का एक अहम कारण है. सिंघल के जवान बेटे ने 17 वर्ष की उम्र में जुलाई 2012 में आत्महत्या कर ली थी.

उन दिनों सिंघल पुलिस अधीक्षक के रूप में खेड़ा जिले में तैनात थे. उनके बेटे ने अहमदाबाद में अपने कमरे में छत से खुद को लटका लिया और सिंघल के दोस्तों का मानना है कि इस घटना ने सिंघल को झकझोर कर रख दिया. सिंघल ने अहमदाबाद में अपना बंगला खाली कर दिया.

बाटला हाउस एनकाउंटर

और शहर के बाहरी इलाके में एक नए घर में पत्नी और बेटी के साथ रहने लगे. इससे पहले सिंघल अक्षरधाम हमले के बाद सरकार द्वारा सम्मानित होकर और अहम पदों पर रहने के कारण गुजरात में खासे 'सफल' पुलिस अधिकारी माने जाते थे.

हालाँकि अक्षरधाम हमला, जिसमें 34 लोग मारे गए और 81 घायल हुए, सिघल के गांधीनगर के उप पुलिस अधीक्षक रहते हुए घटा था. हमले के दौरान हमलावरों का सामना करते समय कार्रवाई की कमान संभालने के लिए उनकी सराहना हुई थी.

जब एक साल तक मामले के दोषियों को पकड़ा न जा सका तो इसकी जाँच का काम सिघल को सौंपा गया था. वर्ष 2003 में अहमदाबाद अपराध शाखा को मामला सौंपे जाने के अगले ही दिन पाँच लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया.

पोटा अदालत में जब ये मामला गया तो अदालत ने जाँच पर सवाल उठाया और पूछा कि जब अन्य पुलिस एजेंसियाँ 12 महीने तक किसी को नहीं पकड़ पाईं तो अब 24 घंटे के भीतर सिंघल ने ये कैसे कर दिया?

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