ग्वालियर के मजदूरों की सुध लेने वाला कोई नहीं

मध्यप्रदेश सरकार के मुखिया शिवराज सिंह भले ही विकास के नाम पर चुनाव लड़ रहे हों, लेकिन ग्वालियर के रहने वाले रणबीर सिंह से मिलने के बाद प्रदेश में विकास के दावों की कलई खुल जाती है.

पचास की उम्र पार कर चुके रणबीर सिंह किसी ज़माने में ग्वालियर की जेसी कॉटन मिल्स में गार्ड की नौकरी करते थे. उन्होंने 1985 से 1992 तक वहां नौकरी की.

28 मई 1992 को कंपनी बंद कर दी गई. कंपनी बंद होने के साथ ही उसमें काम कर रहे लगभग 9,000 मज़दूर बेकार हो गए. लेकिन ये कहानी सिर्फ़ रणबीर सिंह की नहीं है.

80 के दशक में ग्वालियर की पहचान जीवाजीराव कॉटन मिल (जेसी मिल्स) के कारण हुआ करती थी. उद्योगपति घनश्याम दास बिड़ला की इस मिल की पहचान का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसमें लगभग 20 से 30 हजार कर्मचारी और मज़दूर काम करते थे.

जेसी मिल्स का था जलवा

ग्वालियर शहर का पूरा एक क्षेत्र बिरला नगर के नाम से बसा हुआ था. इस मिल ने केवल ग्वालियर के लोगों को ही आश्रय नहीं दिया बल्कि आसपास के ज़िलों से भी सैकड़ों लोगों को रोज़गार दिया बल्कि उन्हें हमेशा के लिए ग्वालियर का निवासी बना दिया.

इस मिल में मुख्यत: यूपी, राजस्थान, बिहार, तथा आसपास के अंचल के हजारों मजदूर कार्यरत थे. इसके साथ ही छोटे-बड़े अन्य कई उद्योगों को ग्वालियर में पनपने का मौक़ा मिला जिसमें ग्रैसिम, सिमको, स्टील फाउंड्री तथा अन्य छोटे-छोटे लघु उद्योग भी इस क्षेत्र में सुचारू रूप से चल रहे थे.

लेकिन वक्त के साथ इन मिलों के मालिकों ने घाटे के सौदे के चलते इन मिलों को बंद करना शुरू कर दिया. कारण आधुनिक मशीनें और पहले की तुलना में मशीनों के लिए कम मज़दूरों की ज़रूरत. लगभग 1992 के आते-आते यहां मिलें बंद होना शुरु हो गईं. बेरोज़गारी से हताश कई मज़दूरों ने आत्महत्या कर ली. आज भी इन मिलों के मामले कोर्ट में विचारधीन हैं.

नहीं मिली है तनख्वाह

रणबीर सिंह कहते हैं कि मज़दूर अदालत गए और अदालत ने उनको थोड़ी राहत देते हुए 1998 तक कंपनी को चालू माना, जिसके आधार पर मजदूरों को 1992 से लेकर 1998 तक की तनख्वाह देने के आदेश दिए, लेकिन रणबीर सिंह के मुताबिक़ प्रत्येक मजदूर को केवल 43 हज़ार रुपए मिले और वो भी किस्तों में.

रणबीर कहते हैं, "2005 तक मजदूरों ने बहुत अच्छी लड़ाई लड़ी. लेकिन 2005 के बाद सब सरेंडर हो गए. मजदूर रोज़ी रोटी कमाए, बच्चों को पाले कि केस अदालत करता रहे."

मध्य प्रदेश में विधान सभा चुनाव हो रहे हैं और ज़ाहिर है ऐसे में सवाल उठता है कि क्या राजनेताओं ने मजदूरों के लिए कुछ नहीं किया. इसका जवाब देते हुए रणबीर सिंह कहते हैं, "सबसे बात होती है. केवल चुनाव तक बात होती है. चुनाव के बाद कोई नेता दिखाई नहीं देता, न पलट के आता है. पहले सब कह जाते हैं कि हम आपका काम निपटा देंगे, मज़दूरों की जितनी देनदारी है वो पूरा दिलवा देंगे, लेकिन बाद में कोई नहीं आता."

रणबीर जैसे हज़ारों लोगों की परवाह किसी भी राजनीतिक पार्टी को नहीं है. लेकिन कोई भी पार्टी विकास की बात करने से नहीं चूकती.

सुध लेने वाला कोई नहीं

चुनाव प्रचार में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान न केवल ग्वालियर बल्कि पूरे प्रदेश में औद्योगिकीरण की बात करते हैं.

बीते मंगलवार को ग्वालियर में चुनाव प्रचार के दौरान शिवराज सिंह चौहान ने कहा, "ग्वालियर विकास की दौड़ में कहीं पीछे नहीं छूट पाएगा. ग्वालियर को हम उद्योग की नगरी बना देगें. सरकार वो है जो केवल आज की बात न सोचे, आज से 50 साल के बाद की सोचे. जिस मध्यप्रदेश का हमने ब्लूप्रिंट बनाया है उस मध्यप्रदेश को बदलने के लिए लघु और कुटीर उद्योगों का जाल पूरे मध्यप्रदेश की धरती पर बिछाना चाहते हैं."

लेकिन मौजूदा सरकार और विपक्षी पार्टियों के विकास के दावों की पोल खोलते हुए ग्वालियर चैंबर ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के पूर्व अध्यक्ष डॉ. वीरेंद्र गंगवाल कहते हैं, "मध्य प्रदेश में उद्योग के हिसाब से जिस विकास की हम उम्मीद करते हैं वो बहुत कम हुआ है. ग्वालियर में तो औद्योगिक विकास उल्टी दिशा में हुआ है. ग्वालियर में जेसी मिल्स बंद हुई, ग्रासिम बंद हुई, सिमको बंद हुई. यहां पर एक ऐसे व्यक्ति की ज़रूरत है जो कि यहां के औद्योगिक विकास को आगे बढ़ाकर यहां के लोगों को रोज़गार दे सके.’’

बंद हुई मिलों के मज़दूरों की हालत के बारे में गंगवाल कहते हैं, "जो पुनर्वास होना चाहिए था वो तभी होता जब नई इंडस्ट्री आती उस बारे में कुछ भी काम नहीं हुआ चाहे कोई भी सरकार हो.’’

चुनावों के इस मौसम में हर पार्टी नए उद्योगों को प्रदेश में लाने का वादा तो कर रही है, लेकिन रणबीर सिंह जैसे हज़ारों मज़दूरों की सुध लेने वाला कोई नहीं.

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