मध्यप्रदेश चुनाव में क्या है दिग्विजय की भूमिका?

दिग्विजय सिंह

मध्य प्रदेश विधानसभा चुनावों में कांग्रेस महासचिव और दो बार प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह की क्या भूमिका है? यहाँ इस सवाल पर भी उतनी ही चर्चाएं हो रही हैं, जितनी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की संभावित तीसरी पारी और भाजपा के पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की सभाओं को लेकर हो रही हैं.

चुनावों में दिग्विजय सिंह की भूमिका को लेकर लोगों की अलग-अलग राय है. पिछले कुछ दिनों में प्रदेश के अलग-अलग इलाक़ों में जितने लोगों से मैंने बात की, उनमें से ज़्यादातर की राय दिग्विजय सिंह के बारे में अच्छी नहीं थी.

शिवपुरी से राघौगढ़ के रास्ते में एक ढाबे पर बातचीत के दौरान राज्य सरकार के एक कर्मचारी ने तो दिग्विजय सिंह को राज्य में पार्टी तबाह करने का ज़िम्मेदार ठहरा दिया. यह राय अकेले उस कर्मचारी की ही नहीं थी. मैं जिन लोगों से मिला, उनमें से ज़्यादातर दिग्विजय के बारे में नकारात्मक ही सोचते हैं.

और शायद यही कारण है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी अपने चुनावी भाषणों में लोगों को इस बात से डरा रहे हैं कि अगर भाजपा हारी, तो दिग्विजय सिंह फिर से सत्ता में आ जाएंगे.

बैकबेंचर की भूमिका

मध्यप्रदेश के सांध्य दैनिक 'प्रदेश टुडे' के संपादक राकेश पाठक इन चुनावों में दिग्विजय सिंह की भूमिका के बारे में कहते हैं, "वो एक बैकबेंचर की भूमिका में हैं क्योंकि शायद पार्टी हाईकमान को लगता है कि दिग्विजय सिंह के प्रति लोगों का आक्रोश अभी बचा हुआ है."

चुनावी सभाओं में दिग्विजय सिंह अगली पंक्ति के बजाए दूसरी पंक्ति में बैठे देखे जाते हैं और ज़्यादातर जगह तो उन्होंने भाषण देने से भी इनकार कर दिया है.

Image caption दो बार मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह अब केंद्रीय राजनीति में ज़्यादा सक्रिय हैं.

जीवाजी विश्वविद्यालय के अध्यापक प्रोफ़ेसर एपीएस चौहान कहते हैं कि दिग्विजय सिंह ने आम लोगों के लिए काम किया और ख़ासकर दलितों के लिए उनके ज़रिए बनवाया गया डॉक्यूमेंट बहुत क्रांतिकारी था.

प्रोफ़ेसर चौहान के अनुसार आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण के कारण नौकरियों में कमी और भारत में दूसरे दौर के आर्थिक सुधार के चलते कर्मचारी वर्ग में उन्हें लेकर काफ़ी संशय है.

दिल्ली में मज़बूत

मध्य प्रदेश में समाजवादी आंदोलन से जुड़े सागर के रघु ठाकुर कहते हैं कि दिग्विजय सिंह ने अपने दूसरे कार्यकाल (1998-2003) में बिहार के मुख्यमंत्री रह चुके लालू प्रसाद की भाषा बोलनी शुरू कर दी थी.

रघु ठाकुर के अनुसार वह कहने लगे थे कि विकास से चुनाव नहीं जीते जाते वग़ैरह-वग़ैरह और उनकी इस छवि में फ़िलहाल कोई सुधार भी नहीं दिख रहा है.

तो क्या इसका अर्थ यह लगाया जाए कि दिग्विजय सिंह मध्यप्रदेश की राजनीति में पिछड़ गए हैं.

राकेश पाठक इससे बिल्कुल सहमत नहीं हैं और इन सब चीज़ों को राजनीतिक पैंतरेबाज़ी क़रार देते हैं.

Image caption शिवराज सिंह चौहान जनता को दिग्विजय के वापस लौटने का डर दिखा रहे हैं.

उनके अनुसार, "दिग्विजय सिंह 10 जनपथ और रक़ाबगंज रोड में उतने ही मज़बूत हैं, जितने वह पहले थे. सिर्फ़ तात्कालिक ज़रूरतों के मुताबिक़ मतदान के दिन और चुनाव परिणाम के दिन तक उन्होंने अपने ख़ुद को बैकबेंचर बना रखा है."

राकेश पाठक कहते हैं कि दिग्विजय सिंह पार्टी की सारी निर्णायक गतिविधियों में शामिल हैं.

उनके अनुसार दिग्विजय सिंह ने अपने समर्थकों से कहा कि टिकट बंटवारे में उनकी कोई भूमिका नहीं है लेकिन सच्चाई यह है कि वह जिसे टिकट दिलाना चाहते थे, उन्हें टिकट दिलवाया.

यहां तक कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के प्रभाव वाले ग्वालियर-चंबल संभाग में भी उन्होंने अपने पसंदीदा लोगों को टिकट दिलवाने में सफलता प्राप्त की.

दिग्विजय सिंह के पुत्र जयवर्द्धन सिंह ने बीबीसी से कहा कि उनके पिता अब राष्ट्रीय राजनीति में ही सक्रिय रहेंगे और प्रदेश की राजनीति में वापस नहीं लौटेंगे.

निर्णायक भूमिका

मगर राकेश पाठक राकेश कहते हैं, "चुनाव परिणाम अगर कांग्रेस के लिए सकारात्मक रहे और वह सरकार बनाने की स्थिति में हुई तो इसमें निर्णायक भूमिका दिग्विजय सिंह की ही रहेगी."

प्रोफ़ेसर चौहान मानते हैं कि मध्यप्रदेश के हर चुनाव क्षेत्र में कुछ न कुछ लोगों पर दिग्विजय सिंह का प्रभाव है. उनके अनुसार मध्यप्रदेश में लोगों को दिग्विजय सिंह की ज़रूरत है.

प्रोफ़ेसर चौहान कहते हैं कि दिग्विजय सिंह देश में हो रहे सामाजिक परिवर्तन को गहराई से समझते हैं और सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ पुरज़ोर तरीक़े से लड़ाई लड़ रहे हैं.

इन चुनावों में दिग्विजय सिंह की भूमिका को लेकर चाहे जो भी राय हों लेकिन इतना ज़रूर है कि दिग्विजय सिंह के बग़ैर मध्यप्रदेश कांग्रेस की राजनीति की कल्पना करना अभी थोड़ी जल्दबाज़ी होगी.

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