हर्षवर्धन: बीजेपी ने लगाया डॉक्टर पर दांव

हर्षवर्धन

प्रधानमंत्री पद के लिए भाजपा के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी दिल्ली में अपनी पहली रैली कर रहे थे.

इस रैली में उन्होंने कहा था कि दिल्ली भाजपा में विजय ही विजय मौजूद हैं.

विजय कुमार मल्होत्रा, विजय गोयल, विजेंद्र गुप्ता और विजय शर्मा. कइयों ने इसे संकेत माना कि मोदी की दिल्ली की राजनीतिक बिसात में कोई ना कोई विजय फिर से सामने आएगा. विजय गोयल पूरी तरह से दिल्ली विधानसभा चुनाव में पार्टी की कमान संभालने के लिए तैयार थे.

पाँच राज्यों के चुनाव

गोयल के उत्साह से तो यही लग रहा था कि वे मुख्यमंत्री पद के सशक्त दावेदार हैं. भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह का पूरा समर्थन भी विजय गोयल को मिला हुआ था. लेकिन मोदी अपने राष्ट्रीय विज़न पर किसी और तरीके से अमल कर रहे थे.

इसका उदाहरण तब मिला जब उन्होंने दिल्ली में पार्टी की कमान डॉ. हर्षवर्धन को देने का फ़ैसला कर लिया.

अपने एक फ़ैसले से उन्होंने विजय गोयल की महत्वाकांक्षा पर ब्रेक लगाया और राजनाथ सिंह को भी संकेत दे दिया कि अब पार्टी के अंदर सब कुछ मोदी की योजना के मुताबिक ही होगा.

भीतरघात का खतरा

साफ़ सुथरी छवि वाले हर्षवर्धन दिल्ली में पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच डॉक्टर साहब के नाम से मशहूर हैं.

हालांकि संगठन के स्तर पर पिछले कुछ सालों से वे नेपथ्य में चल रहे थे. इस बार भी मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित होने से पहले तक कृष्णानगर विधानसभा सीट से उनका दावा कमज़ोर नज़र आ रहा था.

आँकड़ों का आईना

लेकिन अब डॉक्टर साहब दमदार उम्मीदवार के तौर पर चुनाव ज़रूर लड़ेंगे. उनके सामने चुनौती पूरी दिल्ली में पार्टी को जीत दिलाने की है.

58 साल के हर्षवर्धन के लिए एक चुनौती यह भी है कि दिल्ली प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी का संगठन विजय गोयल का बनाया हुआ.

गोयल का खेमा हर्षवर्धन के नेतृत्व को स्वीकार करने में हिचकिचा रहा है. हर्षवर्धन के सामने आने से कांग्रेस और अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को भी रणनीति बदलनी पड़ रही है. लेकिन विरोधी दलों के साथ ही भारतीय जनता पार्टी को भी अपनी रणनीति में बदलाव लाना पड़ रहा है.

दिल्ली में पार्टी का नेतृत्व डॉक्टर हर्षवर्धन के हाथ में आने के बाद पार्टी को भीतरघात का सामना करना पड़ सकता है.

सरल व्यक्तित्व

इसके अलावा पार्टी के कार्यकर्ताओं का भरोसा जीतने के लिए हर्षवर्धन के पास वक्त बेहद कम बचा है.

हर्षवर्धन का पूरा नाम हर्षवर्धन गोयल है यानी भाजपा के परंपरागत वैश्य मतदाताओं को जोड़े रखने में उन्हें जातिगत मुश्किल भी नहीं होगी.

बावजूद इसके हर्षवर्धन पार्टी कार्यकर्ताओं को कितना उत्साहित कर पाएंगे, इसमें संदेह बना हुआ है.

हर्षवर्धन के व्यक्तित्व की अपनी ख़ासियतें हैं. उनकी छवि साफ सुथरी रही है.

वे खुद तालीमशुदा पेशेवर डॉक्टर हैं. ऐसे में शहरी जनता और ख़ास तौर पर पढ़े लिखे लोगों के बीच उनकी स्वीकार्यता है. इतना ही नहीं हर्षवर्धन में अभी भी नेताओं वाला तामझाम नहीं दिखता.

महज दो सप्ताह पहले तक वे अपने घर का लैंडलाइन फोन तक खुद उठाते रहे हैं. आम कार्यकर्ताओं के बीच भी वे काफी घुलमिल जाते हैं.

लेकिन उनकी सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि वे एक बेहतरीन प्रशासक की भूमिका में अब तक कामयाब नहीं हो पाए हैं.

पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान वे पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष थे और चुनाव में मिली हार के बाद उसकी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए हर्षवर्धन ने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था.

इसके बाद अगले छह सालों तक वे पार्टी के अंदर किसी भी मुद्दे पर प्रखरता से अपनी बात रखते नहीं दिखे.

पहचान

हालांकि लोग उनके स्वास्थ्य मंत्रालय के काल को याद करते हैं. वर्ष1993 से 1998 के बीच वो दिल्ली सरकार में स्वास्थ्य, क़ानून और शिक्षा मामलों के मंत्री रहे. डॉ. हर्षवर्धन कभी भी विधानसभा चुनाव नहीं हारे हैं. उनकी देखरेख में ही नेशनल पोलियो सर्विलेंस प्रोजेक्ट शुरू किया गया था.

भाजपा का हर्षवर्द्धन पर दांव

वर्ष 1997 में शुरू हुए इस अभियान के जरिए भारत में पोलियो 'टाइप-2' का उन्मूलन संभव हो पाया.

इसके अलावा देश में तंबाकू निषेध कानून बनाने में उनका अहम योगदान रहा.

लेकिन एक हक़ीक़त यह भी रही है कि वे स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों के प्रति गंभीर होते हुए भी अपने पांच साल के शासन काल में दिल्ली में एक नया सरकारी अस्पताल नहीं बनवा पाए.

इतना ही नहीं उनकी पहचान मुद्दों को लेकर लड़ने-भिड़ने वाले नेता के तौर पर नहीं रही है.

उनकी आलोचना करने वालों कि निगाह में हर्षवर्धन पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ता ज़्यादा हैं, नेता कम. उन्हें निष्ठा का फल तो मिल गया है लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने के लिए नेता भी बन कर दिखाना होगा.

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