राजस्थानः जाति के बाद अब गोत्र की राजनीति

  • 22 नवंबर 2013
राजस्थान चुनाव

राजस्थान की चुनावी राजनीति में जाति एक ऐसी लोहे-महफ़ूज़ या ऐसी तख़्ती है जिस पर लिखा कभी मिटाया नहीं जा सकता. राजस्थान की सियासत पर बात बिना जातिगत समीकरणों के पूरी नहीं होती है.

लेकिन प्रदेश की चुनावी राजनीति में जातियों के भीतर टिकट हासिल करने के ट्रेंड ने जातिगत दबाव को इतना ज़्यादा बढ़ा दिया है कि अब उसमें गोत्र की भूमिका भी बढ़ गई है.

अब एक ही जाति के भीतर एक गोत्र से दूसरे गोत्र की प्रतिस्पर्धा बढ़ गई है. मीणा, गुर्जर, जाट, ब्राह्मण और राजपूत इत्यादि मतदाताओं के बीच यह चलन साफ देखा जा सकता है.

राजस्थानः कांग्रेस के घोषणापत्र

अल्पसंख्यक मुस्लिमों में भी यह ट्रेंड सामने आ रहा है. अब अनुसूचित जातियों के भीतर भी ऐसी होड़ बढ़ी है. प्रदेश के समाजशास्त्री इसे एक खतरनाक विभाजनकारी रुझान के रूप में देखते हैं.

पूर्वी राजस्थान के करौली जिले की अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों टोडाभीम और सपोटरा को ही लें तो इस बार मीणा समुदाय के अलग-अलग गोत्र के लोगों के बीच वर्चस्व के लिए संघर्ष की स्थिति दिख रही है.

पहले पूर्वी राजस्थान में सिर्फ मीणा समुदाय की ही चलती थी लेकिन अब हालात बदल गए हैं.

मीणा जनजाति के भीतर प्रभावशाली गोत्र के लोगों ने अपनी दावेदारी तेज कर दी है.

सपोटरा में इस बार कांग्रेस और भाजपा की उम्मीदवारी चाहने वालों में टाटू गोत्र के मीणाओं ने कहा कि जब इस क्षेत्र में इसी गोत्र का वर्चस्व है तो फिर किसी अन्य गोत्र के व्यक्ति को टिकट क्यों दिया जाए?

उम्मीदवारी

Image caption अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी कृष्णा पूनिया चूरू की सादुलपुर सीट से चुनाव लड़ रही हैं.

कांग्रेस ने इस बार यहां चरणावत गोत्र के रमेण मीणा को बदलने से इनकार किया तो टाटू गोत्र के ऋषिकेश मीणा को भाजपा ने प्राथमिकता दी और उन्हें उम्मीदवार बना दिया.

जानकारों का कहना है कि कांग्रेस ने गोत्रवाद के बजाय क्षेत्रवाद पर दांव खेला है.

दरअसल रमेश मीणा उस डांग क्षेत्र से आते हैं जहां के ज्यादा मतदाता इस सीट पर हैं. करौली जिले की दूसरी सीट टोडाभीम है जो मीणा बहुल है.

यहां महर गोत्र के मीणा सबसे ज्यादा हैं. कांग्रेस ने यहां से इस गोत्र के घनश्याम महर को उम्मीदवार बनाया है जबकि भाजपा ने रामराज मीणा को.

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रामराज लोधवाड़ मीणा हैं. पीए संगमा की नेशनल्स पीपुल्स पार्टी ने यहां से पीआर मीणा को उम्मीदवार बनाया है जो कि जोरवाल गोत्र से हैं और इस गोत्र के लोग भी यहां राजनीतिक रूप से ज्यादा प्रभावशाली माने जाते हैं. पूर्वी राजस्थान की सीटों पर इस बार पाकड़ गोत्र के मीणा भी दावेदार थे.

राजस्थान आदिवासी मीणा महासभा के प्रदेश अध्यक्ष श्रीनारायण केमला कहते हैं, "हां, ये सही है कि अब गोत्रवाद की भूमिका बढ़ रही है. जिन सीटों पर जिस गोत्र का वर्चस्व ज्यादा है, वे अब अपनी-अपनी दावेदारी जता रहे हैं. प्रदेश की राजनीति और मीणा समाज में भी यह एक नया ट्रेंड उभरता दिखाई दे रहा है. इससे जाति के भीतर विभाजन का खतरा भी दिख रहा है."

प्रदेश के चुरू जिले में सादुलपुर ऐसी सीट है जहां से अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी कृष्णा पूनिया चुनाव लड़ रही हैं.

कांग्रेस ने उन्हें नए चेहरे के तौर पर उतारा है. चुनावी पंडितों का कहना है कि कृष्णा को उम्मीदवार बनाने के पीछे की ज़मीनी हक़ीक़त ये है कि इस सीट को जाटों के पूनिया गोत्र की सीट माना जाता है.

ख़तरनाक ट्रेंड

भाजपा ने यहां से मौजूदा विधायक कमला कस्वां को उम्मीदवार बनाया है लेकिन उसने इस सीट के पूनिया वोटों को अपनी तरफ़ करने के लिए पड़ोस की सीट तारानगर में कांग्रेस पृष्ठभूमि वाले पूनिया जाट जयनारायण सिंह को टिकट दिया है.

बागी बिगाड़ेंगे किसका खेल?

जयपुर की आमेर सीट जाट, मीणा और ब्राह्मण बहुल है. इसमें भाजपा और राजपा ने जाट उम्मीदवार उतारे हैं जबकि कांग्रेस ने हरियाणा ब्राह्मण या हरियाणा गौड़ ब्राह्मण गंगा सहाय शर्मा को उम्मीदवार बनाया है. सहाय पहले भी विधायक रह चुके हैं.

चूरू सीट पर पिछली बार के विधायक मकबूल मंडेलिया को कांग्रेस ने फिर से टिकट दिया है लेकिन भाजपा यहां मुस्लिमों में प्रचार कर रही है कि इस क्षेत्र में कयामखानी मुस्लिमों की उपेक्षा हुई है. मंडेलिया कुरैशी मुसलमान हैं.

समाजशास्त्री प्रोफ़ेसर राजीव गुप्ता कहते हैं, "गोत्रवाद के रूप में यह नवसामंतवाद का विभाजनकारी स्वरूप है जिसे दोनों राजनीतिक पार्टियाँ अपना रही हैं. यह विभाजनमूलक इंजीनियरिंग है. ये इस बात का संकेत है कि वोटबैंक की राजनीति अब जाति के अंदर भी अपने लिए भूमिका तलाश रही है और यह खतरनाक किस्म का ट्रेंड है."

बहरहाल, जाति के भीतर गोत्र की राजनीति जमीनी स्तर पर क्या असर दिखाएगी यह तो आगामी चुनाव परिणामों के बाद ही स्पष्ट होगा.

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