एमपी कांग्रेसः दिक़्क़त नेताओं की अधिकता से है

दिग्विजय सिंह बेटे जयवर्द्धन सिंह के साथ

मध्य प्रदेश चुनावों के बारे में कहा जाता है कि यहां कांग्रेस पार्टी अपने प्रमुख प्रतिद्वंद्वी भारतीय जनता पार्टी से कम और आपस में ज़्यादा लड़ती है.

प्रदेश कांग्रेस में गुटबाज़ी का ये आलम है कि मौजूदा मुख्यमंत्री भाजपा के शिवराज सिंह चौहान चुनावी सभाओं में अपने कार्यकाल में हुए विकास के दावों के अलावा अगर कोई दूसरी बात करते हैं तो वो है प्रदेश के कांग्रेसी नेताओं की आपसी गुटबाज़ी.

ज़्यादातर चुनावी सभाओं में शिवराज कहते हैं, "दिल्ली में बैठक बुलाई मैडम (सोनिया गांधी) ने और कहा मध्य प्रदेश के कांग्रेसियों इकट्ठे हो जाओ, अगर तिबारा ये शिवराज मुख्यमंत्री बन गया तो तुम सब बूढ़े हो जाओगे, कभी सरकार नहीं बना पाओगे."

शिवराज के ये बयान भले ही राजनीतिक फ़ायदे के लिए दिए जा रहे हों लेकिन मध्य प्रदेश कांग्रेस की सच्चाई इससे बहुत अलग भी नहीं है.

मध्य प्रदेश से निकलने वाले सांध्य दैनिक 'प्रदेश टुडे' के संपादक राकेश पाठक मध्य प्रदेश कांग्रेस की गुटबाज़ी को बहुत ही सुंदरता और कटाक्ष के मिले-जुले भाव के साथ बयान करते हैं.

वह कहते हैं, "कांग्रेस की जो सबसे बड़ी बाधा है, वो ये है कि मध्य प्रदेश उन गिने-चुने राज्यों में से हैं जहां पर बराबर के राष्ट्रीय स्तर के सात-आठ नेता हैं, जो प्रदेश के नेता भले न हों पर कांग्रेस के संगठन में भी राष्ट्रीय स्तर के नेता हैं."

लड़ाई में आई कांग्रेस

राकेश पाठक जिन सात-आठ नेताओं का ज़िक्र करते हैं उनमें दिग्विजय सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सुरेश पचौरी, कांतिलाल भूरिया, राहुल अजय सिंह, कमलनाथ, सत्यव्रत चतुर्वेदी शामिल हैं.

लेकिन ये सभी नेता अपने-अपने इलाक़ों के क्षत्रप हैं. इनमें कोई ऐसा नहीं जिसकी अपील पूरे प्रदेश में हो.

ऐसा माना जाता है कि दिग्विजय सिंह मध्य प्रदेश कांग्रेस के आख़िरी ऐसा नेता हैं जिनकी अपील पूरे प्रदेश में है.

इसका कारण बताते हुए राकेश पाठक कहते हैं, "1993 में पहली बार चुनाव जीतने से पहले दिग्विजय सिंह ने प्रदेश अध्यक्ष के रूप में रोडवेज़ बसों में, ट्रेनों में घूम-घूम कर एक-एक ज़िले, एक-एक क़स्बे में जाकर कांग्रेस संगठन को खड़ा किया था. संगठन के लिए वैसा काम किसी ने नहीं किया जब दिग्विजय सिंह का राज था."

राकेश पाठक कहते हैं कि दिग्विजय सिंह की सत्ता जाने के बाद पिछले दस वर्षों में भाजपा शासन के दौरान कांग्रेस संगठन में प्रदेश अध्यक्ष चाहे पचौरी जी रहे हों या अब कांतिलाल भूरिया हों, संगठन को खड़ा करने, उन्हें संजीवनी देने का काम ये लोग नहीं कर पाए. इसलिए पूरे प्रदेश का नेता इनमें से कोई नहीं है.

लेकिन इस बार कम से कम सभी कांग्रेसी नेताओं में ऊपर से एकता दिखाई दे रही है.

जीवाजी विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के अध्यापक प्रोफ़ेसर एपीएस चौहान कहते हैं कि इस बार कांग्रेस के सभी बड़े नेता एक दूसरे के इलाक़ों में जाकर चुनाव प्रचार कर रहे हैं, एक साथ मंच पर दिखाई दे रहे हैं.

इसकी वजह तलाशते हुए राकेश पाठक कहते हैं, "इन नेताओं के मन-मुटाव दूर करने में राहुल गांधी की जो कड़ाई है, वो भी काम आई. प्रदेश के प्रभारी मोहन प्रकाश की पहल ने भी कुछ सफलता दिलाई है."

तो क्या इस बार मध्य प्रदेश में कांग्रेस कुछ अच्छे परिणाम की उम्मीद कर सकती है?

इस सवाल के जवाब में राकेश पाठक कहते हैं कि "कांग्रेस के बड़े नेताओं की एकता वोटों मे कितनी बदल पाएगी, ये कहना अभी मुश्किल है लेकिन कांग्रेस ख़ुद को लड़ाई में ले आई है, यही कांग्रेस की जीत है."

लेकिन साथ ही साथ वह कहते हैं कि पार्टी ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाकर उन्हें एक मौक़ा दिया है. अगर आठ दिसंबर को कांग्रेस के लिए बहुत अच्छे परिणाम आ जाते हैं तो ज्योतिरादित्य सिंधिया शायद उस प्रादेशिक नेतृत्व की परिभाषा में ख़ुद को ढाल सकते हैं.

फिर उभरेगी गुटबाज़ी

दिग्विजय सिंह के पुत्र और राघौगढ़ से चुनावों में क़दम रखने वाले जयवर्द्धन सिंह भी इस बात को मानते हैं कि मध्य प्रदेश में नेताओं की नहीं, उनमें एकता की

कमी है. वह कहते हैं कि अब सब कुछ ठीक है और सारे नेता मिलकर काम कर रहे हैं.

तो क्या ऐसा माना जाए कि कथित तौर पर कांग्रेस हाईकमान के ज़रिए प्रदेश के नेताओं पर थोपी गई एकता आगे भी बरक़रार रहेगी?

मध्य प्रदेश की राजनीति पर ऩजर रखने वाले ऐसा बिलकुल भी नहीं मानते हैं.

राकेश पाठक कहते हैं, "ये गुटबाज़ी कांग्रेस में आसानी से ख़त्म होने वाली है नहीं. फ़िलहाल इस पर लगाम लगा दी गई है. जिस दिन परिणाम घोषित होंगे, ये गुटबाज़ी फिर सतह पर आ जाएगी."

क्या मध्य प्रदेश कांग्रेस की गुटबाज़ी ख़त्म होगी, मध्य प्रदेश कांग्रेस को एक ऐसा नेता फिर मिलेगा जिसकी अपील अटेर से लेकर झाबुआ के आख़िरी छोर तक सारे प्रदेश में होगी?

इन सारे सवालों के जवाब के लिए हमें इंतज़ार करना होगा आठ दिसंबर तक जब चुनावों के नतीजे आएंगे.

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